मंगलवार, 4 अगस्त 2015

गोविन्द राम निर्मलकर

गोविन्द राम निर्मलकर
विश्व रंगमंच पर छत्तीसगढ़ की पताका फहराने वाले...
छत्तीसगढ़ की धरा के सच्चे प्रतिनिधि...
नाचा रग-रग में नदी सा बहा...

जन्म    10 अक्टूबर 1935, राजनांदगांव
मृत्यु    27 जुलाई    2014, रायपुर

गोविन्द राम निर्मलकर छत्तीसगढ़ के लोक नाट्य कला ‘नाचा’ की दूसरी पीढ़ी के शीर्षस्थ कलाकार थे। छत्तीसगढ में बहती शिवनाथ नदी के तट पर बसे ग्राम मोहरा, राजनांदगांव में 10 अक्टूबर 1935 को पिता गैंदलाल व माता बूंदा बाई के घर में जन्मे गोविन्दराम के मन में नाचा देखकर ऐसी लगन जागी कि युवा होते ही मात्र बीसवें साल में ‘नाचा’ के ख्यातिनाम कलाकार बन गये। नाचा के वरिष्ठ कलासाधकों के उत्साहवर्धन और मार्गदर्षन के प्रेरित होकर गोविन्दराम ने अपनी प्रतिभा, लगन और निष्ठा के सहारे नाचा में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया।

गोविन्द राम निर्मलकर के जीवन का संयोग था कि नाचा के कलाकार मदन निशाद उनके ग्राम में  आ बसे। अब गांव में नाचा का आयोजन प्रायः रोज ही होता और गोविन्द राम का मन, नाचा में बस गया। ग्राम्यांचल की की इस नाट्य परम्परा का इतना सम्मान होता उनके मन में गाने-बजाने के भाव प्रस्फुटित होने लगे। वे नाचा के आयोजनों में एक महत्वपूर्ण कला अनुरागी के रूप में अपनी छवि उपस्थिति दिखाने लगे।

अद्भुत पारखी मदन काका की निगाह से गोविन्द की आन्तरिक लगन छिप न पाई और उन्होंने गोविन्द के माता-पिता से गायन-वादन के लिए, मदन निषाद ने अनुमति ले ली। गोविन्द के कला मन को जैसे बहुत बड़ा आकाश मिल गया जिसमें वे अपनी उड़ान भर सकते थे। बहरहाल वे मदन काका की पार्टी में मंजीरिहा हो गये फिर ढोलक और फिर तबला बजाने लगे, साथ-साथ गाने भी लगे। बीच-बीच में कभी किसी कलाकार के न आ पाने जो समस्या होती थी गोविन्द उसकी भूमिका निभाने के लिए मंडली में विशेष हो गये। अब आकस्मिक भूमिकाओं के लिए भी मदन काका, गोविन्द को मंच पर बुला लेते। ऐसी अप्रत्याशित आई भूमिकाओं में निरंतर रच-बस गये और गम्मत के पारंगत अभिनेता बन गये। उन्होंने पूरी शिदद्त के साथ मदन, लालू, ठाकुर राम और भुलवा जैसे कलाकारों की भूमिकाएं निबाही। अब वे गम्मत के सीधे कुशल अभिनेता स्वीकार कर लिए गए, तब से गोविन्दराम की कला यात्रा ने अनेक शिखरों को छुआ और यों कहें तो कुछ नये रंग अर्थों में बहुत आगे तक निकल आयेे।
  
नाचा मंडलियों के ग्राम्य प्रदर्षन और नया थियेटर के बीच भी पारिवारिक कारणों से आते-जाते रहे। इस तरह वे ग्राम्य संवेदना से पूरित नाचा और विकसित हो रहे आधुनिक रंगमंच से लगातार जुडे़ रहने की निरंतरता उन्हें सम्पूर्ण कलाकार के रूप में निखारती ही रही।

हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ की कला प्रतिभा और कलाकारों के सौश्ठव को जाना-पहचाना, उनके चयन से गोविन्दराम निर्मलकर जी 1960 से ‘नया थियेटर’ में काम करने लगे। उस दौरान निर्देषक हबीब तनवीर के नाटक ‘चरणदास चोर’ ने पूरे देश में अभिनय के नये प्रतिमान स्थापित करना आरंभ किया ही था कि अभिनय को अपना धर्म-कर्म मानने वाले गोविन्दराम निर्मलकर ने ‘नया थियेटर’ में नायक की भूमिकाएं की। मदनलाल और द्वारका के बाद आप ऐसे कलाकार थे जिन्होंने इस प्रसिद्ध नाटक के नायक की भूमिका कर अपनी कला का लोहा मनवाया। छत्तीसगढ़ की धरा की जीवन शैली षैली में रंगमंचीय उत्स के दर्शन से कला जगत अभिभूत हुआ और छत्तीसगढ़ी बोली की लयात्मकता और भावों को व्यक्त करने की शक्ति से वैष्विक रंगमंच का भी मान बढ़ा।
दिल्ली थियेटर की पहली प्रस्तुति आगरा बाजार (1954) में सषक्त अभिनय किया। अब आप नाटकों के स्थायी कलाकार बन गये थे। लोकतत्वों से भरपूर मिर्जा शोहरत बेग (1960), बहादुर कलारिन (1978), चारूदत्त और गणिका वसंतसेना की प्रेम गाथा मृच्छकटिकम मिट्टी की गाडी (1978), पोंगा पंडित, ब्रेख्त के नाटक गुड वूमेन आफ शेत्जुवान पर आधारित शाजापुर की शांतिबाई (1978), गांव के नाम ससुरार मोर नाव दमाद (1973), छत्तीसगढ के पारंपरिक प्रेम गाथा ‘लोरिक चंदा’ पर आधारित ‘सोन सरार’ (1983), असगर वजाहत के नाटक ‘जिन लाहौर नई देख्या वो जन्मई नई’ (1990), शेक्सपियर के नाटक ‘मिड समर्स नाइट ड्रीम’ पर आधारित ‘कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना’ (1994) में गोविन्दराम के अभिनय को सराहा गया।
गोविन्दराम जी के अभिनय से नाटकों के पात्र अब अविस्मरणीयता को प्राप्त होने लगे। इस तरह चरणदास चोर के अभिनय की भूमिका के साथ ही खासकर आगरा बाजार में ककडी वाला, बहादुर कलारिन में गांव का गौंटिया, मिट्टी की गाडी में मैतरेय, हास्य नाटकों के लिए प्रसिद्ध मोलियर के नाटक बुर्जुआ जेन्टलमेन का छत्तीसगढी अनुवाद लाला शोहरत बेग (1960) में शोहरत बेग जैसी केन्द्रीय व महत्वपूर्ण भूमिकायें यादगार रही। इन्होंने बावन कोठी के रूप में सोन सागर में सर्वाधिक विस्मयकारी और प्रभावशाली अभिनय किया था।
आप अब रससिद्ध कलाकार होना सिद्ध करने लगे थे। आंखों में उतर जाने वाले यम रूपी क्रोध को, वहशीपन को अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय देने लगे साथ ही शुद्ध उच्चारण और मंच के लिये अपेक्षित लोचदार आवाज से वे पात्रगुण से एकाकार होने और संवेदनाओं को सहज उकेरने की कला में निश्णात् दीखने लगे।
मृच्छकटिकम मिट्टी की गाडी (1978) में नटी और मैत्रेय की भूमिका में चुटीले संवादों से हास्य व्यंग को एक नई ऊंचाई दी और पोंगा पंडित में व्यंग्य की दृष्य कला विधा से प्रदर्षनकारी कला तत्व को नये आयाम दिए।
‘मुद्राराक्षस’: जीव सिद्धि, स्टीफन ज्वाईग की कहानी ‘देख रहे हैं नैन’: दीवान, ‘कामदेव का सपना’ : वसंत ऋतु में परियों से संवाद करने वाला बाटम, ‘गांव के नाम ससुरार मोर नाव दामाद’ (1973) में दामाद की भूमिका, ‘जिन लाहौर नई देख्या वो जन्मई नई’ (1990) में अलीमा चायवाला, ‘वेणीसंघारम’ में युधिष्ठिर, ‘पोंगवा पंडित’ में पंडित की जोरदार भूमिका गोविन्दराम निर्मलकर की कला साधना की सार्थकता की कहानी है।
अंतर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह, एडिनबरा लंदन में ‘चरणदास चोर’ का प्रदर्शन विश्व के बावन देशों से आमंत्रित थियेटर समूहों के बीच हुआ और ‘चरणदास चोर’ नाटक को विश्व रंगमंच का सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया। इस सफलता के बाद इसी नाटक का मंचन विश्व के अन्य सत्रह देशों में हुआ। श्याम बेनेगल ने फिल्म ‘चरणदास चोर’ बनायी जिसमें गोविन्दराम जी ने अभिनय किया।
श्री गोविन्दराम ने रंगकर्मी हबीब तनवीर के निर्देशन में कई सफल नाटकों में मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं। उनमें रूस्तम सोहराब, लाला सोहरतराय, चरणदास 
  
एक समय श्री गोविन्दराम ने अपनी नाचा पार्टी बनाकर चरणामृत, इंग्लैंड वाला और इंग्लैंड वाली गम्मतों की सर्जना की और उनका मंचन भी किया। बीच-बीच में जब रवेली-रिंगली पार्टी सक्रिय थी, तब गोविन्दराम ने उसमें काम किया, फिर मटेवा साज जैसी उभरती नाचा मंडली में भी गोविन्दराम ने काम किया। गोविन्दराम के गंभीर प्रयासों से भी वे छत्तीसगढ़ में अपनी नाचा मंडली नहीं बना पाये और न किसी नाचा पार्टी में अपने आपको अन्तर्निहित कर पाये। इसका कारण वे अपने उच्च स्तरीय अभिनय क्षमता को देते हैं। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ की नाचा मंडलियों में काम करने से मेरा अभिनय सबसे अलग-थलग दिखाई देता है, स्थानीय कलाकार इतनी कसावट के  सामने टिक नहीं पाते हैं अथवा जिस तरह का काम चाहते हैं, उस तरह नये नाचा कलाकार खरे नहीं उतरते हैं। इसलिए गोविन्दराम फिर एक बार हबीब तनवीर के नया थियेटर में शामिल हो गये।

श्री गोविन्दराम निर्मलकर जी छत्तीसगढ़ की नाट्य कला ‘नाचा’ के सशक्त अभिनेता थे। नाचा में विभिन्न चरित्रों को निभाने के कारण गोविन्दराम के अभिनय में कला तत्व से भरपूर आत्मविश्वास सदैव मौजूद होता था। वे नाचा विधा के उन्मुक्त रंग तत्वों को सन्तुलित रूप से प्रदर्षित करते थे। साफ दीखता भी था कि उनके अभिनय का मूलाधार नाचा ही था। नाचा के मूल में अपने परिवेष के ही हास्य और व्यंग की जमीन होती है। इस गुण की साधना से वे कभी विलग नहीं हुए।  गोविन्दराम ने अपने मार्गदर्षक श्री मदन निषाद की रचनाशीलता, श्री लालू की अभिनेयता और श्री ठाकुर राम से चपलता के गुण सीखे और अपनी मौलिक पहचान बनाई। वे पात्र के गुण-धर्म को इस तरह व्यक्त करते कि कलाकार और पात्र का व्यक्त्वि एक दूसरे में घुल-मिल एक हो जाते। राजा- रंक, किसान-नेता, साधु-चोर, सिपाही-सेठ, ग्राहक-नौकर, साहब, गुरू-चेला, उनका अभिनय पात्र को प्रमाणिक हो जी लेता था। वे अपनी शारीरिक भाशा का इस तरह इस्तेमाल में महारत हासिल कर चुके थी कि षरीर-मन-भाव लगभग एक समय में नियंत्रित कर सकते थे। वे हाथ, आँख और चेहरे की स्वाभाविक भंगिमाआंे का भरपूर प्रभावकारी उपयोग करते और उनकी भरावदार आवाज का उतार-चढ़ाव दर्शक श्रोताओं पर अभूतपूर्व असर करता। प्रायः आंगिक चेष्टाएँ और चेहरे की विकृतियाँ, गूढ़ भावों का विस्तर कर, हास्य और विद्रूपता पैदा करती हंै।
  
श्री गोविन्द राम ने निष्चित ही अपनी कला साधना से छत्तीसगढ़ की कला परम्परा के आकाश को वृहत किया है। नाचा-गम्मत के अभिनय संसार को व्यापकता के साथ नई अर्थवत्ता दी है। उन्होंने नाचा के प्रत्येक अंग को स्वमेधा से सौश्ठव प्रदान किया है। वे नई पीढ़ी के कलाकारों में सबसे प्रतिभावान माने जाते गये। उनमें नाचा को नये सिरे से संगठित करने और लोक नाट्य की वर्तमान अवधारणाओं के अनुरूप उसे प्रतिष्ठित करने की क्षमता निर्विवाद रूप से रही।

श्री गोविन्दराम निर्मलकर की उत्कृश्ट कला साधना के लिए अविभाजित मध्यप्रदेश राज्य में अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किया गया है। जिसमें मध्यप्रदेश शासन का लोक कलाओं का सबसे बड़ा तुलसी सम्मान भी शामिल है। नाचा परम्परा के अनुरक्षण और उसे आगे बढ़ाने के लिए श्री गोविन्दराम निर्मलकर ने जो अथक प्रयास किये। उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। छत्तीसगढ़ के नये राज्य के रूप में उदित होने के बाद दाऊ मंदराजी सम्मान से भी विभूशित किया गया। इसके अलावा अनेक सम्मानों से उन्हें नवाजा गया। 2005 से लकवाग्रस्त गोविन्दराम जी को विगत दिनों बहुमत सम्मान मिला तब...

आप प्रतिभा के धनी महान कलाकार थे कि उनका सम्मान करना जैसे खुद को सम्मानित करने जैसा लगता था। छत्तीसगढ़ के कला संसार को समृद्ध करने वाले इस सच्चे छत्तीसगढि़या कलाकार के रूप में तो उन्हें कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने पूरे विश्व में छत्तीसगढ़ की धरती की जीवन संवेदनाओं की, लोक के हृदय स्पंदन की और अपनी लोक परम्पराओं की षक्ति से ग्राम्य जीवन और उसके परिवेश की सहजता को अपनी उच्च अभिनय क्षमता से प्रदर्षित किया साथ ही विश्व को भी परिचित कराया ऐसी इस धरती की सेवा करने वाला अनन्य नहीं दीखता। धरा के सच्चे प्रतिनिधि थे।

वे नाचा का भविश्य थे और उनके मन में नाचा के भविश्य की चिन्ता भी रही पर जैसा वे सुदूर  देशों में कला और कलाकार को दिये जाने वाले परिवेश शा का अवलोकन करते रहे। वैसे ही अपनी धरती के कलाकारों को उपलब्ध कराने की चेश्ठा का मनन करते ही उनका समय बीता। एक कलाकार मन को जिम्मेदारों ने सदा निराश ही किया।

जब जीवन के अंतिम साल को बीतते देख रहे थे तब दर्षकों के बीच तालियां बजाते खुद बच्चे से अधेड़ होते दीखते जाते, संस्कृति के गौरव की थांती सज़ाने वाले लोगों के पास एक मौका था कि इस कलाकार के प्रति कुछ तो अपनी जिम्मेदारी निबाह लें। गोविन्दराम जी का शरीर जवाब दे रहा था। परिवार का बोझ और धनाभाव की पीड़ा भी कम न थी ऐसे कमजोर क्षणों में उन्होंने मानवीय संवेदनाओं की आकांक्षा भी की थी पर जीवन के अंतिम माह में राज्य शक्ति धारित किया हुआ अल्पावधि का पात्र उनसे ही आंखों चुरा रहा था या आखें दिखा गुर्रा रहा था। वे समय को पढ़ पा रहे थे। समय का खर्च होना देख रहे थेे। वह तो हो ही रहा था... ऐसे में वे लोग जो उनके कामों को सहेजने की बात करते रहे वे ही उन्हें व्यर्थ हाथ पसारने विवश करते रहे।
वे जाते-जाते दुखी थे शायद बहुत ही दुखी थे...
उनकी अपनी मृत्यु की खबर अखबार इस तरह देगा उन्हें पता ही नही चला...
पर कला आंसू भर-भर रोई होगी...

इस आलेख में श्री संजीव तिवारी जी के लेख से भी मदद ली गई है। उनका आभार है।