शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

अमरदास मानिकपुरी


 

छत्तीसगढ़ के वादक अमरदास मानिकपुरी को संगीत नाटक अकादेमी की फैलोशिप  तथा अकादेमी सम्मान से 23 अक्टूबर 2015 को दरबार हाल, राष्ट्रपति भवन में सम्मानित किया जायेगा।


छत्तीसगढ़ के ग्राम्य परिवेश में बीत गये समय का नाचा जो आंखों में झूल-झूल जाता है। 'दर्शकों के बीच आंचलिक रसानुभूति से सराबोर ‘नाट्य कला’ अपने पात्रों के माध्यम से अपनी कहानी के दृष्यों का आकाश  बटोर जैसे गांव के चैराहे, खलिहान में उतार लाती... ऐसे समय का नाचा सोनहा बिहान की तस्वीर झलकाता सा अब भी याद आता है। बहुत से बीत गये किस्सों, कहानियों और नाचा कला के अनेक उतार-चढ़ावों को देखने-सुनने-समझने वाले अमरदास मानिकपुरी अब एक तरह से नाचा कला के द्रष्ट्रा है जिनके कहे शब्दों से हम अपने छत्तीसगढ़ की उन स्मृतियों को महसूस कर सकते हैं।
अमरदास मानिकपुरी को इस वर्ष का संगीत नाट्क अकादेमी, दिल्ली से सम्मान देने की घोषणा हुई है। मेरी  दृश्टि में ऐसे समय इस सम्मान का छत्तीसगढ़ आना अत्यन्त महत्वपूर्ण बन गया है। अमरदास मानिकपुरी ने एक ऐसा भी समय देखा है जब दूरांचल के क्षितिज पर उनके कला कद्रदान इस जमीन के बहुत सारे हिस्से के लोग बने। और अब जब पूरी पृथ्वी सूचना के नाम पर बहुत छोटी सी पढ़ गयी है तब अमरदास अपने दर्शकों से बहुत-दूर, बहुत दूर से हो गये हैं। यह उनको सालता है। दुनिया की दुनियादारी अब शायद उनके काम की न रही है। समय बीत गया, मन में जीवन की सार्थकता लगभग पूरी हो गयी है। पर कही समाज, संस्कृति और सरकार से उनको अपेक्षा है। और क्यों न होनी चाहिए। पूरा अंचल उनके कला कर्म का ऋणी जो है।
रायपुर के महंत घासीदास संग्रहालय, में जब वे आये तो लगा कि कुछ देने आये हैं। शान्त मुखमुद्रा और अपेक्षाहीन, क्या कलाकार के चहरे की यह शान्त और सौम्य शाति उसकी कला और उनके की सार्थकता का प्रमाण है। षायद हां। वे आये और मैं उनसे बात करने लगता हूं। कुछ कैमरे से फोटो लेता  हूं और बात आगे की मुलाकात को टल जाती है।

भौरमदेव की प्रतिकृति के मंदिर के नीचे बैठा संस्कृति विभाग के कार्यालय को देख उसे मंदिर की कथाओं से ओढ़ाना चाहता हूं। चाहता हूं यहां कला की साधना और कलाकार का सम्मान कैसे भी करके जीवन्त रख सकूं। कोशिश  भी नही कर सकता पर सोच तो सकता ही हूं।
वे हाथ में थैला लटकाये सधे कदमों की जैसे ताल पर वादित चले आते हों। धैर्य के साथ... वे भी पास आते हैं और मैं उनका स्वागत कर पूछ बैठता हूं क्या बात है? वे कहते हैं दिल्ली जाना है सो उसकी तैयारी के लिए पांडे जी ने बुलाया है पत्र अंग्रेजी में है सो वे ही बतायेंगे कि करना क्या है। कैसे दिल्ली जाऊंगा। वे बैठ जाते हैं।
वे सहज ही थैले को सम्हालने-उलटने-पलटने लग जाते हैं तो मैं पूछ बैठता हूं? तो कहने लगते कि पूरे जीवन की जमापूंजी है। मैंने कहा तो बताईये मैं कैमरा निकाल कर उनके पत्रों की फोटो लेता हूं और लेख लिखने की सामग्री इकटठी करने लगता हूं।
उनके पन्ने-पन्ने अपनी कहानी कहने लगते हैं।

दिल्ली में छपी-बढ़ी ‘नुक्कड़’ हबीब तनवीर के बारे में विशेषांक के माध्यम से उनकी योरोप की यात्रा की घटनायें बताती, पारसी थियेटर के नाटक की चर्चा करती हैं इसमें पत्रिका अपने पेज उलटते 158 पर ठिठक जाती है यहां अमरदास मानिकपुरी का नाम जो है। राजनांदगांव से 26 किमी की दूरी पर कोलिहापुरी ग्राम है ।
कोलिहापुरी गांव की अपनी नाचा पार्टी में पिता ही उसके जनक और संचालक थे। उन्होंने अपना कला कर्म मुझे सिखाना बचपन से आरंभ कर दिया था। वे तबला बजाते तो मैं भी सीखता, वे हरमोनियम बजाते तो मैं भी कोशिश करते हुए सीखता। ऐसे समय गांव में दाऊ मंदराजी का नाचा के लिए गांव में आना हुआ। मेरी लगन देखकर दाऊ ने मेरे पिता से नाचा के लिए मुझे मांग लिया और पिता ने भी आज्ञा दे दी पश्चात् मदन और ठाकुरराम मेरे संगी-साथी बन गये।



यहां रहने वाले अमरदास गांव की नाचा मंडली में तबला बजाते और कभी कभार छोटे-छोटे अभिनय भी करते सन इक्क्हत्तर के नवम्बर माह में हबीब तनवीर ने उनको बुलावा भेज अपने पास बुला लिया।
प्रसि़द्ध नाचा कलाकार देवीलाल को उन्होंने अपने तबले पर नचाया है देवीलाल जी नृत्य करते थे और स्त्री पात्र बनकर फिल्मी गाना भी गाते थे उस दौरान मदनलाल चुटकुले सुनाने में सिद्ध हो चले और और अनेकार्थी चुटीले संवादों से दर्शकों का मनोरजन करते थे। मालाबाई के गाने का तरीका सबसे खास था।
नया थियेटर में पहिले-पहल दिल्ली में गांधी दर्शन  के भवन में निवास-रहना होता था। फिर आगरा बाजार नाट्क के आरंभ में हबीब जी के माध्यम से तीन मूर्ति में रहना हुआ। नया थियेटर ने छत्तीसगढ़ के कलाकारों के माध्यम से संगीत की एक विरासत देश-और दुनिया के सामने पेश  की है। अमरदास ने ‘गांव का नाव ससुराल में’ बाजा बजाया है। ‘सडक’ नाटक के आरंभ में आपका अभिनय था।
आंचलिकता से सराबोर संगीत छत्तीसगढ़ की रिद्म और परिवेश को दिखाता संगीत की बेहद बारीक कारीगरी का नमूना बन गया है। मतलब कहरवा के बाद दादरा भी बजाते हुए रिद्म को पकड़े रखना होता था। इसका मुख्य जिम्मा मानिकपुरी जी ने सदैव निबाहे रखा।
नवभारत अखबार की एक कतरन कहने लगती है। ‘ कि जीवन के इतने साल कलाओं के लिए दिये पर उच्च या सर्वोच्च से कभी कोई ठीक-ठाक आसरा नहीं मिला। घर छोड़कर चले थे और अब जब हबीब साहब से छुट्टी मांगी तो उन्होंने हंसकर दे दी मुझे क्या मालूम कि वे भी हंसकर यूं चले जायेंगे...
वे याद करने लगते हैं कि भोपाल की वर्कशाप में श्री हबीब जी के निर्देशन में नये युवाओं के साथ काम किया था और फिर रायपुर में आ कर वर्तमान परिप्रेक्ष्य और समकालीन घटनाओं के आधार पर नाटक तैयार किया गया इस तरह अलग-अलग ढंग से वर्कशाप का अनुभव रहा है। नाचा का एक वर्कशाप खैरागढ़ में हुआ था उसमें प्रतिभाशाली लोगों का चयन करके  'चंदन वन के बाघ'  नाम से तैयार किया गया।
संतोष दुबे, अखबार की कतरन से कहते दीखते हैं कि पीपली लाईव के गीत में अमर की छाप है। चोला माटी के गीत में कोलिहापुरी के नाचा कलाकार ने बजाया मांदर फोटो में अमीर खान दीख रहे हैं। अमरदास कहते हैं कि 'मैं अमिरखान से मिला था वे बहुत अच्छे आदमी हैं।'
पृथ्वी थियेटर का लेटर पेड कहने लगता है कि माननीय अमरदास थियेटर में आपके बहुमूल्य और अभूतपूर्व योगदान के लिए आपके आभारी हैं। और आपका धन्यवाद करते हैं। इतने वर्शों के अभूतपूर्व थियेटर के लिए हम आपके मुमनून हैं। शुक्रगुजार हैं आभारी है। हस्ताक्षर शशिकपूर हैं।

हबीब उत्सव के ब्रोशर में रंगमंच का सूरज शयद उग रहा है क्योंकि हबीब जी ऊपर की ओर देख रहे अभी भी प्रतीक्षारत हैं। इसमें हबीब की जीवंत दीख रहे हैं। अंदर।। हबीज जी नाटक की अपनी दुनिया में व्यस्त और मस्त हैं। वे दीख रहे हैं। दिखा रहे हैं। समय पर अपने हस्ताक्षर कर रहे हैं।
मई 2010 का पृथ्वी थियेटर का मई माह का कैलेन्डर अमरदास को हारमोनियम बजाते दिखाता है पास ही हबीब जी खड़े हैं भुलवाराम तथा अन्य कलाकार भी दीख रहे हैं।
2001 का राश्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली एवं मध्यप्रदेश कला परिषद् भोपाल के नाट्य लेखन शिविर का प्रमाण अंकित करता है।
1990 का कार्य समिति आयुध निमाणी रायपुर, देहरादून के भव्य सांस्कृतिक समारोह में भागीदारी व्यक्त करता है।
मोतीपुर सामुदायिक विकास समिति शहरी गरीबों के उत्थान के लिए आयोजित कार्यशाला में अमरदास की निष्ठा को सम्मानित करती है।
 2005 को जिला राजनांदगांव के कलेक्टर को लिखते हैं कि मैं अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर काम कर चुका कलाकार हूं कृपया मुझे वित्तीय सहयोग के तहत पेंशन  प्रदान करने का कश्ट करें। 31 दिसम्बर को संचालनालय संस्कृति एंव पुरातत्व रायपुर, छत्तीसगढ़ से उन्हें वित्तीय सहायता का नवीन प्रस्ताव भेजने को कहता है।
हल्का सा मैला हो चला पन्ना परिशिष्ट  एक, नियम 10, साहित्य कला के क्षेत्र में प्रतिश्ठित ऐसे व्यक्ति को जो कि अर्थाभावग्रस्त हों, या उनके आश्रितों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता के लिए आवेदन पत्र का निर्धारित प्रारूप ...कहता है कि अमरदास मानिकपुरी ग्राम कोलिहापुरी, पोस्ट व्हाया, चिचोला, जिला राजनांदगांव जन्म तारीख 5-8-1937 गरीब, खेतिहर, अनियमित आश्रित में श्रीमती राखीबाई, आनिक पुरी, आय-आश्रित संबंध-पत्नी व्यवसाय-आश्रित, आय और आय के साधन-कुछ नहीं 2.5 एकड़ खेती गांव में एक छोटा सा मकान, अनियमित आय भगवान भरोसे, आठ हजार से नौ हजार गरीबी रेखा के नीचे बीपीएल। दर्षकों श्रोताओं का अपार स्नेह, पृथवी थियेटर से सम्मान/ लेकिन शासन से अभी तक सौभाग्य नहीं मिल पाया विवरण संलग्न, अमरदास मानिकपुरी के हस्ताक्षर


संलग्न विवरण घोशणा करता है कि लिख दिया है कि सनद रहे और वक्त पर काम आवे..
1. 12 वर्श की उम्र से नाचा मंडली में वादक के रूप में प्रवेष संगीत की शिक्षा अपने पिता कला गुरू परम पूज्य श्री बरसनदास मानिकपुरी से प्राप्त की।
2. कोलिहापुरी नाचा पार्टी, तिलई खार नाचा पार्टी, कल्याण नाचा पार्टी, राजिम कोरा्र नाचा पार्टी, नवागांव नाचा पार्टी, खेली लखोली पाटी्र में काम करते हुए दाउ दुलार सिंह, साहू दाउ मंदराजी की खेली नाचा पाटी में प्रमुख तबला वादक के रूप में छत्तीसगढ़, महाराश्ट्र में ख्याति अर्जित की।
3. ताल वाद्य के तहत तबला, ढोलक, मांदर, मृदंग, लाला, नंगाड़ा वादन में निपुण, लोक ताल की गहरी समझ एवं पुस्तुति के कारण तबला वादक के रूप में अत्यधिक सराहना मिली और अंचल के स्थापित कलाकार के रूप में पहचान मिली।
4. वादन की विशिष्ठ शैली से प्रभावित होकर अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त रंग निर्देशक पद्मभूशण हबीब तनवीर ने अपने नया नियेटर में संगीत पक्ष की जिम्मेदारी सम्हालने के लिए आमंत्रित किया।
5. सन् 1971 से सुप्रसिद्ध रंग संस्थान नया थियेटर में प्रवेश किया नया थियेटर के सभी नाटकों के संगीत संयोजन में भागीदारी निभाते हुए मैं थियेटर में प्रमुख वादक के रूप में स्थापित हो गया।
6. विष्व प्रसिद्ध नाटक ‘ चरणदास चोर’ ‘ मिट्टी की गाड़ी ’ ‘ मोर नाव दमांद गांव के नाव ससुराल ’ बहादुर कलारिन, मिड समर नाइट्स आॅफ ड्रीम, बुजर्व जन्टलमेन, मुद्रा राक्षस, सोन सागर, वेणी संहारम, जिस लाहौर नई देख्या, सड़क, उत्तर रामचरित, शाजापुर की शाति बाई, आगरा बाजार, आदि नाटकों में संगीत संयोजन एवं प्रमुख वादक के रूप में छत्तीसगढ़ी, संस्कृत एवं विदेषी नाटकों में वादन
7. इंग्लेंड स्काॅटलैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, एथेन्स, रूस, स्वीडन, बंगलादेश, यूगोस्लाविया, इटली, ग्रीस, यूनान, आदि देशो की अनेक बार यात्रा करते हुए अन्तरराष्ट्रीय मंचों में अपने कला कौशल का प्रदर्षन
8. अन्तरराष्ट्रीय मंचों के अलावा भारत महोत्सव, भारत रंग महोत्सव, पृथ्वी थियेटर फेस्टीवल-मुंबई, नान्दीकर फेस्टीवल कलकत्ता, रंग शकरा, बंगलोर, जय सुन्दरी नाट्य समारोह-गुजरात, हरियाणा महोत्सव, राज्य उत्सव-रायपुर, नेहरू सेन्टर-मुम्बई, स्पीक मैके चेन्नई, भारत रंगकर्मी उत्सव, भारत भवन वर्शिकी भोपाल, दक्षिण मध्य सांस्कृतिक केन्द्र महोत्वस-नागपुर, इलाहाबाद उत्तर पूर्वी जोन, ताज उत्सव, आगरा आदि अनेक प्रतिश्ठापूर्ण आयोजन में शिरकत

9. अन्तरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय  कार्यशालाओं के तहत् ग्लासगो स्काॅटलैण्ड नाट्य कार्यशाला, हरियाणा संस्कृति विभाग नाट्य कार्यशाला, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंग कार्यशाला, रंगकर्मी कोलकाता, खैरागढ़ नाचा कार्यशाला, संगीत अकादमी द्वारा आयोजित इम्फाल मणिपुर नाट्य कार्यशाला, रीवा, बिलासपुर नाट्य कार्यशालाओं में भागीदारी
10. टेलीविजन धारावाहिक में आगरा बाजार, फिल्मों में दी आॅन स्टिंग इनडोकैनेडियन फिल्म, दी बर्निग सीजन में काम करने का अनुभव

क्रमांक 10 का विवरण
वर्तमान में असहाय होने के कारण आर्थिक स्थिति कमजोर है। घर का गुजारा चलाना बहुत मुश्किल है।


अंतिम लिफाफा सफेद रंग का अंग्रेजी से लिखा अमरदास मानिकपुरी के लिए बूझ-अबूझ है। 31 अगस्त 2015 का यह पत्र कहने लगता है कि मैं संगीत नाटक अकादेमी दिल्ली से आया हूं। प्रिय श्री अमरदास मानिकपुरी, आपको भारत के महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी आपको संगीत नाट्क अकादेमी की रत्न सदस्यता तथा अकादेमी सम्मान से विभूशित करेंगे। आपको विशेष रूप से आपको 23 अक्टूबर 2015 को शाम 6 बजे दरबार हाल, राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली  में आमंत्रित किया जाता है। आप 23 अक्टूबर 2015 को अकादेमी के अध्यक्ष के दिए सम्मान भोज में आमंत्रित किया जाता है। आपको इकोनामी क्लास के हवाईजहाज में आने की पात्रता होगी। आपको 27 अक्टूबर 2015 को मेघदूत थियेटर, रविन्द्रभवन नई दिल्ली में एक घन्टे की प्रस्तुति के लिए आमंत्रित करते हैं। आप अपने बैंक का नाम और पता बता दें।















मंगलवार, 4 अगस्त 2015

गोविन्द राम निर्मलकर

गोविन्द राम निर्मलकर
विश्व रंगमंच पर छत्तीसगढ़ की पताका फहराने वाले...
छत्तीसगढ़ की धरा के सच्चे प्रतिनिधि...
नाचा रग-रग में नदी सा बहा...

जन्म    10 अक्टूबर 1935, राजनांदगांव
मृत्यु    27 जुलाई    2014, रायपुर

गोविन्द राम निर्मलकर छत्तीसगढ़ के लोक नाट्य कला ‘नाचा’ की दूसरी पीढ़ी के शीर्षस्थ कलाकार थे। छत्तीसगढ में बहती शिवनाथ नदी के तट पर बसे ग्राम मोहरा, राजनांदगांव में 10 अक्टूबर 1935 को पिता गैंदलाल व माता बूंदा बाई के घर में जन्मे गोविन्दराम के मन में नाचा देखकर ऐसी लगन जागी कि युवा होते ही मात्र बीसवें साल में ‘नाचा’ के ख्यातिनाम कलाकार बन गये। नाचा के वरिष्ठ कलासाधकों के उत्साहवर्धन और मार्गदर्षन के प्रेरित होकर गोविन्दराम ने अपनी प्रतिभा, लगन और निष्ठा के सहारे नाचा में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया।

गोविन्द राम निर्मलकर के जीवन का संयोग था कि नाचा के कलाकार मदन निशाद उनके ग्राम में  आ बसे। अब गांव में नाचा का आयोजन प्रायः रोज ही होता और गोविन्द राम का मन, नाचा में बस गया। ग्राम्यांचल की की इस नाट्य परम्परा का इतना सम्मान होता उनके मन में गाने-बजाने के भाव प्रस्फुटित होने लगे। वे नाचा के आयोजनों में एक महत्वपूर्ण कला अनुरागी के रूप में अपनी छवि उपस्थिति दिखाने लगे।

अद्भुत पारखी मदन काका की निगाह से गोविन्द की आन्तरिक लगन छिप न पाई और उन्होंने गोविन्द के माता-पिता से गायन-वादन के लिए, मदन निषाद ने अनुमति ले ली। गोविन्द के कला मन को जैसे बहुत बड़ा आकाश मिल गया जिसमें वे अपनी उड़ान भर सकते थे। बहरहाल वे मदन काका की पार्टी में मंजीरिहा हो गये फिर ढोलक और फिर तबला बजाने लगे, साथ-साथ गाने भी लगे। बीच-बीच में कभी किसी कलाकार के न आ पाने जो समस्या होती थी गोविन्द उसकी भूमिका निभाने के लिए मंडली में विशेष हो गये। अब आकस्मिक भूमिकाओं के लिए भी मदन काका, गोविन्द को मंच पर बुला लेते। ऐसी अप्रत्याशित आई भूमिकाओं में निरंतर रच-बस गये और गम्मत के पारंगत अभिनेता बन गये। उन्होंने पूरी शिदद्त के साथ मदन, लालू, ठाकुर राम और भुलवा जैसे कलाकारों की भूमिकाएं निबाही। अब वे गम्मत के सीधे कुशल अभिनेता स्वीकार कर लिए गए, तब से गोविन्दराम की कला यात्रा ने अनेक शिखरों को छुआ और यों कहें तो कुछ नये रंग अर्थों में बहुत आगे तक निकल आयेे।
  
नाचा मंडलियों के ग्राम्य प्रदर्षन और नया थियेटर के बीच भी पारिवारिक कारणों से आते-जाते रहे। इस तरह वे ग्राम्य संवेदना से पूरित नाचा और विकसित हो रहे आधुनिक रंगमंच से लगातार जुडे़ रहने की निरंतरता उन्हें सम्पूर्ण कलाकार के रूप में निखारती ही रही।

हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ की कला प्रतिभा और कलाकारों के सौश्ठव को जाना-पहचाना, उनके चयन से गोविन्दराम निर्मलकर जी 1960 से ‘नया थियेटर’ में काम करने लगे। उस दौरान निर्देषक हबीब तनवीर के नाटक ‘चरणदास चोर’ ने पूरे देश में अभिनय के नये प्रतिमान स्थापित करना आरंभ किया ही था कि अभिनय को अपना धर्म-कर्म मानने वाले गोविन्दराम निर्मलकर ने ‘नया थियेटर’ में नायक की भूमिकाएं की। मदनलाल और द्वारका के बाद आप ऐसे कलाकार थे जिन्होंने इस प्रसिद्ध नाटक के नायक की भूमिका कर अपनी कला का लोहा मनवाया। छत्तीसगढ़ की धरा की जीवन शैली षैली में रंगमंचीय उत्स के दर्शन से कला जगत अभिभूत हुआ और छत्तीसगढ़ी बोली की लयात्मकता और भावों को व्यक्त करने की शक्ति से वैष्विक रंगमंच का भी मान बढ़ा।
दिल्ली थियेटर की पहली प्रस्तुति आगरा बाजार (1954) में सषक्त अभिनय किया। अब आप नाटकों के स्थायी कलाकार बन गये थे। लोकतत्वों से भरपूर मिर्जा शोहरत बेग (1960), बहादुर कलारिन (1978), चारूदत्त और गणिका वसंतसेना की प्रेम गाथा मृच्छकटिकम मिट्टी की गाडी (1978), पोंगा पंडित, ब्रेख्त के नाटक गुड वूमेन आफ शेत्जुवान पर आधारित शाजापुर की शांतिबाई (1978), गांव के नाम ससुरार मोर नाव दमाद (1973), छत्तीसगढ के पारंपरिक प्रेम गाथा ‘लोरिक चंदा’ पर आधारित ‘सोन सरार’ (1983), असगर वजाहत के नाटक ‘जिन लाहौर नई देख्या वो जन्मई नई’ (1990), शेक्सपियर के नाटक ‘मिड समर्स नाइट ड्रीम’ पर आधारित ‘कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना’ (1994) में गोविन्दराम के अभिनय को सराहा गया।
गोविन्दराम जी के अभिनय से नाटकों के पात्र अब अविस्मरणीयता को प्राप्त होने लगे। इस तरह चरणदास चोर के अभिनय की भूमिका के साथ ही खासकर आगरा बाजार में ककडी वाला, बहादुर कलारिन में गांव का गौंटिया, मिट्टी की गाडी में मैतरेय, हास्य नाटकों के लिए प्रसिद्ध मोलियर के नाटक बुर्जुआ जेन्टलमेन का छत्तीसगढी अनुवाद लाला शोहरत बेग (1960) में शोहरत बेग जैसी केन्द्रीय व महत्वपूर्ण भूमिकायें यादगार रही। इन्होंने बावन कोठी के रूप में सोन सागर में सर्वाधिक विस्मयकारी और प्रभावशाली अभिनय किया था।
आप अब रससिद्ध कलाकार होना सिद्ध करने लगे थे। आंखों में उतर जाने वाले यम रूपी क्रोध को, वहशीपन को अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय देने लगे साथ ही शुद्ध उच्चारण और मंच के लिये अपेक्षित लोचदार आवाज से वे पात्रगुण से एकाकार होने और संवेदनाओं को सहज उकेरने की कला में निश्णात् दीखने लगे।
मृच्छकटिकम मिट्टी की गाडी (1978) में नटी और मैत्रेय की भूमिका में चुटीले संवादों से हास्य व्यंग को एक नई ऊंचाई दी और पोंगा पंडित में व्यंग्य की दृष्य कला विधा से प्रदर्षनकारी कला तत्व को नये आयाम दिए।
‘मुद्राराक्षस’: जीव सिद्धि, स्टीफन ज्वाईग की कहानी ‘देख रहे हैं नैन’: दीवान, ‘कामदेव का सपना’ : वसंत ऋतु में परियों से संवाद करने वाला बाटम, ‘गांव के नाम ससुरार मोर नाव दामाद’ (1973) में दामाद की भूमिका, ‘जिन लाहौर नई देख्या वो जन्मई नई’ (1990) में अलीमा चायवाला, ‘वेणीसंघारम’ में युधिष्ठिर, ‘पोंगवा पंडित’ में पंडित की जोरदार भूमिका गोविन्दराम निर्मलकर की कला साधना की सार्थकता की कहानी है।
अंतर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह, एडिनबरा लंदन में ‘चरणदास चोर’ का प्रदर्शन विश्व के बावन देशों से आमंत्रित थियेटर समूहों के बीच हुआ और ‘चरणदास चोर’ नाटक को विश्व रंगमंच का सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया। इस सफलता के बाद इसी नाटक का मंचन विश्व के अन्य सत्रह देशों में हुआ। श्याम बेनेगल ने फिल्म ‘चरणदास चोर’ बनायी जिसमें गोविन्दराम जी ने अभिनय किया।
श्री गोविन्दराम ने रंगकर्मी हबीब तनवीर के निर्देशन में कई सफल नाटकों में मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं। उनमें रूस्तम सोहराब, लाला सोहरतराय, चरणदास 
  
एक समय श्री गोविन्दराम ने अपनी नाचा पार्टी बनाकर चरणामृत, इंग्लैंड वाला और इंग्लैंड वाली गम्मतों की सर्जना की और उनका मंचन भी किया। बीच-बीच में जब रवेली-रिंगली पार्टी सक्रिय थी, तब गोविन्दराम ने उसमें काम किया, फिर मटेवा साज जैसी उभरती नाचा मंडली में भी गोविन्दराम ने काम किया। गोविन्दराम के गंभीर प्रयासों से भी वे छत्तीसगढ़ में अपनी नाचा मंडली नहीं बना पाये और न किसी नाचा पार्टी में अपने आपको अन्तर्निहित कर पाये। इसका कारण वे अपने उच्च स्तरीय अभिनय क्षमता को देते हैं। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ की नाचा मंडलियों में काम करने से मेरा अभिनय सबसे अलग-थलग दिखाई देता है, स्थानीय कलाकार इतनी कसावट के  सामने टिक नहीं पाते हैं अथवा जिस तरह का काम चाहते हैं, उस तरह नये नाचा कलाकार खरे नहीं उतरते हैं। इसलिए गोविन्दराम फिर एक बार हबीब तनवीर के नया थियेटर में शामिल हो गये।

श्री गोविन्दराम निर्मलकर जी छत्तीसगढ़ की नाट्य कला ‘नाचा’ के सशक्त अभिनेता थे। नाचा में विभिन्न चरित्रों को निभाने के कारण गोविन्दराम के अभिनय में कला तत्व से भरपूर आत्मविश्वास सदैव मौजूद होता था। वे नाचा विधा के उन्मुक्त रंग तत्वों को सन्तुलित रूप से प्रदर्षित करते थे। साफ दीखता भी था कि उनके अभिनय का मूलाधार नाचा ही था। नाचा के मूल में अपने परिवेष के ही हास्य और व्यंग की जमीन होती है। इस गुण की साधना से वे कभी विलग नहीं हुए।  गोविन्दराम ने अपने मार्गदर्षक श्री मदन निषाद की रचनाशीलता, श्री लालू की अभिनेयता और श्री ठाकुर राम से चपलता के गुण सीखे और अपनी मौलिक पहचान बनाई। वे पात्र के गुण-धर्म को इस तरह व्यक्त करते कि कलाकार और पात्र का व्यक्त्वि एक दूसरे में घुल-मिल एक हो जाते। राजा- रंक, किसान-नेता, साधु-चोर, सिपाही-सेठ, ग्राहक-नौकर, साहब, गुरू-चेला, उनका अभिनय पात्र को प्रमाणिक हो जी लेता था। वे अपनी शारीरिक भाशा का इस तरह इस्तेमाल में महारत हासिल कर चुके थी कि षरीर-मन-भाव लगभग एक समय में नियंत्रित कर सकते थे। वे हाथ, आँख और चेहरे की स्वाभाविक भंगिमाआंे का भरपूर प्रभावकारी उपयोग करते और उनकी भरावदार आवाज का उतार-चढ़ाव दर्शक श्रोताओं पर अभूतपूर्व असर करता। प्रायः आंगिक चेष्टाएँ और चेहरे की विकृतियाँ, गूढ़ भावों का विस्तर कर, हास्य और विद्रूपता पैदा करती हंै।
  
श्री गोविन्द राम ने निष्चित ही अपनी कला साधना से छत्तीसगढ़ की कला परम्परा के आकाश को वृहत किया है। नाचा-गम्मत के अभिनय संसार को व्यापकता के साथ नई अर्थवत्ता दी है। उन्होंने नाचा के प्रत्येक अंग को स्वमेधा से सौश्ठव प्रदान किया है। वे नई पीढ़ी के कलाकारों में सबसे प्रतिभावान माने जाते गये। उनमें नाचा को नये सिरे से संगठित करने और लोक नाट्य की वर्तमान अवधारणाओं के अनुरूप उसे प्रतिष्ठित करने की क्षमता निर्विवाद रूप से रही।

श्री गोविन्दराम निर्मलकर की उत्कृश्ट कला साधना के लिए अविभाजित मध्यप्रदेश राज्य में अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किया गया है। जिसमें मध्यप्रदेश शासन का लोक कलाओं का सबसे बड़ा तुलसी सम्मान भी शामिल है। नाचा परम्परा के अनुरक्षण और उसे आगे बढ़ाने के लिए श्री गोविन्दराम निर्मलकर ने जो अथक प्रयास किये। उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। छत्तीसगढ़ के नये राज्य के रूप में उदित होने के बाद दाऊ मंदराजी सम्मान से भी विभूशित किया गया। इसके अलावा अनेक सम्मानों से उन्हें नवाजा गया। 2005 से लकवाग्रस्त गोविन्दराम जी को विगत दिनों बहुमत सम्मान मिला तब...

आप प्रतिभा के धनी महान कलाकार थे कि उनका सम्मान करना जैसे खुद को सम्मानित करने जैसा लगता था। छत्तीसगढ़ के कला संसार को समृद्ध करने वाले इस सच्चे छत्तीसगढि़या कलाकार के रूप में तो उन्हें कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने पूरे विश्व में छत्तीसगढ़ की धरती की जीवन संवेदनाओं की, लोक के हृदय स्पंदन की और अपनी लोक परम्पराओं की षक्ति से ग्राम्य जीवन और उसके परिवेश की सहजता को अपनी उच्च अभिनय क्षमता से प्रदर्षित किया साथ ही विश्व को भी परिचित कराया ऐसी इस धरती की सेवा करने वाला अनन्य नहीं दीखता। धरा के सच्चे प्रतिनिधि थे।

वे नाचा का भविश्य थे और उनके मन में नाचा के भविश्य की चिन्ता भी रही पर जैसा वे सुदूर  देशों में कला और कलाकार को दिये जाने वाले परिवेश शा का अवलोकन करते रहे। वैसे ही अपनी धरती के कलाकारों को उपलब्ध कराने की चेश्ठा का मनन करते ही उनका समय बीता। एक कलाकार मन को जिम्मेदारों ने सदा निराश ही किया।

जब जीवन के अंतिम साल को बीतते देख रहे थे तब दर्षकों के बीच तालियां बजाते खुद बच्चे से अधेड़ होते दीखते जाते, संस्कृति के गौरव की थांती सज़ाने वाले लोगों के पास एक मौका था कि इस कलाकार के प्रति कुछ तो अपनी जिम्मेदारी निबाह लें। गोविन्दराम जी का शरीर जवाब दे रहा था। परिवार का बोझ और धनाभाव की पीड़ा भी कम न थी ऐसे कमजोर क्षणों में उन्होंने मानवीय संवेदनाओं की आकांक्षा भी की थी पर जीवन के अंतिम माह में राज्य शक्ति धारित किया हुआ अल्पावधि का पात्र उनसे ही आंखों चुरा रहा था या आखें दिखा गुर्रा रहा था। वे समय को पढ़ पा रहे थे। समय का खर्च होना देख रहे थेे। वह तो हो ही रहा था... ऐसे में वे लोग जो उनके कामों को सहेजने की बात करते रहे वे ही उन्हें व्यर्थ हाथ पसारने विवश करते रहे।
वे जाते-जाते दुखी थे शायद बहुत ही दुखी थे...
उनकी अपनी मृत्यु की खबर अखबार इस तरह देगा उन्हें पता ही नही चला...
पर कला आंसू भर-भर रोई होगी...

इस आलेख में श्री संजीव तिवारी जी के लेख से भी मदद ली गई है। उनका आभार है।