बुधवार, 26 नवंबर 2014

जयदेव बघेल

डाॅ. जयदेव बघेल
बस्तर पर आगत की दृश्टि...

जीवन भर सूर्य की रष्मियों को अपनी भट्टी में उगाकर पीतल को सोने सा चमकाकर उसे कला से संवारते-निखारते जयदेव बघेल,  शिल्प गुरू  64 वर्ष यहां रहने के बाद 9 नवम्बर 2014 को ब्रम्ह महूर्त में सुबह 4.00 बजे सूर्यवार (रविवार) के दिन अपने लोक को लौट गये। तो खबर छप ही गई कि ‘पूरी दुनिया को बेलमेटल आर्ट (बस्तर की घड़वा कला ) से रूबरू कराने वाले शिल्प गुरु जयदेव बघेल नहीं रहे,

जयदेव बघेल
खबर सारांश  यह है कि कोंडागांव। सिंधुघाटी-हडप्पाकालीन शिल्पकला के प्रतिबिंब के रूप में प्रसिद्ध बस्तर की घ़ड़वा अथवा बेलमेटल शिल्पकला के सशक्त हस्ताक्षर शिल्पगुरू के नाम से ख्यात कोंडागांव निवासी डॉ. जयदेव बघेल ने इस घड़वा कला को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाया था। कला का यह सिपाही धीरे-धीरे व्याधियों और समय के हाथों बाध्य हो गया. मधुमेह की बीमारी के कारण उनका एक पैर अलग हुआ था. इन दिनों भी वे लम्बे समय से अस्वस्थ चल रहे थे तथा डायलिसिस पर थे। रायपुर के रामकृषण केयर हास्पिटल में उन्होंने अंतिम सांस ली। रविवार सुबह उनके निधन की खबर मिलते ही पूरे बस्तर में शोक की लहर दौड़ गई। उनका पार्थिव शरीर दोपहर को सड़क मार्ग से रायपुर से कोंडागांव वापस लाया गया। दोपहर बाद स्थानीय मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार हुआ । उनकी अंतिम यात्रा में काफी संख्या में स्थानीय मित्रगण, संगी, शिष्य, जन प्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक व शिल्पकार शामिल हुए और प्रदेश के मुख्यमंत्री  ने शोक संदेश में कहा कि डॉ. जयदेव बघेल के देहावसान से छत्तीसगढ. में पारम्परिक शिल्प जगत के एक तेजस्वी सितारे का हमेशा के लिए अन्त हो गया है लेकिन उनकी दिखाई रौशनी से राज्य और देश में हस्त शिल्प की गौरवशाली परम्परा हमेशा आलोकित होती रहेगी।

जयदेव बघेल
जहां तक मुझे याद है कि 1990 आदिवासी लोक कला परिषद् की नौकरी में आते-आते ‘मध्यप्रदेश  के घातु शिल्प’ मोनोग्राफ आया था इसे श्री नवल शुक्ल  ने पूरे प्रदेश  में सर्वे कर पूरे मनोयोग से लिखा था। उसमें जयदेव बघेेल का नाम पढ़ा था। उसी दौरान जयदेव बघेेल ने साहिबगिरी की समवेत शक्ति के सामने झुकने को मना किया था। वे अपने कलाकार मन की सुन रहे थे और व्यवस्था उन पर दबाव बना रही थी कि वे बस आदेश  का पालन कर दुम हिलाये। पर बघेल जी ने अपने स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया। यदा-कदा रिसकर आती बातों से यह जानकारी तो होने लगी कि बस्तर के लोग बिकते नहीं और झुकते भी नहीं। तब बस्तर को जानने की उत्कंटा मन में बैठ गई।

1990 में काश्ठ शिल्प सर्वेक्षण, धनकुल सर्वेक्षण और मालवा उत्सव, इंदौर के आयोजन के सिलसिले में बस से रायपुर से जगदलपुर जाते-जाते रास्ते के गांव और बड़े वृक्षों से आच्छादित जंगल से अबूझमाढ़ के जंगलों की गहनता का अनुमान लगाता। कोण्डागांव का मतलब कोण्डागांव के जयदेव का घर 'भेलवापारा' ही था हमारे लिए। परिशद् के अन्य अधिकारी भी आरंभ में बघेेलल जी के माध्यम से शिल्पियों से परिचित हो पाये थे। बघेल जी के बारे में सुना था कि वे बस्तर की कला परम्परा को बाहरी दुनिया के लिए सबसे बेहतर पथप्रदर्षक बने रहे थे। विगत तीन-पैतीस सालों के सैलानियों, अध्येताओं के लिए बघेल से मिलना बस्तर से मिल लेना जैसा था। फिर हिन्दी साहित्य विधा के नये नवेले अधिकारियों को बघेल जी के कलाकार मन की स्वतंत्रता और उनका आत्मसम्मान जैसे चुभने लगा। वे लोग उनसे बड़े कहलाना चाहते थे। सो उन्होंने अन्यों को विशषेश कहना आरंभ किया और बात दूसरी दिषा में जाने लगी बस्तर के मूल कलाकारों की उपेक्षा का आरंभ इसी समय से आरंभ हो गया। लोग रायपुर के तथाकथित जनजातीय विषेशज्ञों से आलेख तथा प्रकाशन की पैगे बढ़ाने लगे और कोण्डागांव और जगदलपुर के मूल लोक और जनजातीय साहित्यकार हाॅसिये पर डाल दिये गये।
जयदेव बघेल घर पर शिल्प

घड़वा शिल्पियों में मानिक घड़वा और जयदेव बघेेल बहुत बड़े कलाकार रहे है पर अबके विगत 25 सालों से कोई इनका नाम लेवाल नहीं दीखता था। 80-90 के दशक में धीरे-धीरे श्री जयदेव बघेेल बस्तर के सांस्कृतिक उन्नयन की एक मिसाल बनने लगे थे। उन्हांेने देश के सामने अपनी कला के नये आयाम प्रदर्षित किये। उनके अपने दम पर विविध घड़वा कला प्रदर्शनियाँ आयोजित होने लगी। देश और विदेश में पहिले-पहल जाने का सिलसिला उनके समय ही आरंभ हुआ था।

लोग उनके नाम से उस बस्तर को जानने के लिए आने लगे जो बाहरी दुनिया का आबूझा और पुरातन का अज्ञात लोक था। विदेशी  यायावर, कलाकारों, लेखकों  को जयदेव बघेल की उस चेतना पर पूरा भरोसा था जो अंततः कला के माध्यम से व्यक्ति को संत भी बनाती और हृदय की अंतरंगता से भी जोड़ती। विदेश की भाषाई दूरियों के कायम रहते हुए भी उनके पास अनेक विदेशी शिल्पकार आये उनके पास महिनों रहे, सुरक्षित रहे। उनसे कला दान लिया, उन्हें गुरू बनाया और विदेषी शिष्य बस्तर की घड़वा कला गुणगान करते हुए आभार व्यक्त करते रहेै। यह सब किताबों में पहिले ही लिखा गया है। विदेश में भारत की, बस्तर की, छत्तीसगढ़ की कलात्मक छवि निर्मित हुई।

तो उस दौरान के राज्याश्रृय से मुक्त और त्यक्त हो बधेल जी ने अपने घर के पिछवा़डे ही एक कार्यशाला आरंभ कर ली यह एक आश्रम की तरह काम कर रही थी। देश -विदेश से लोग यहां आ कर पूरे समय रहते हुए पूरे कला परिवेश में निमग्न हो कला साधना करते बस्तर के कलाकारों की तरह ही दक्ष होने लगे। ग्राम के अन्य इस अनूठे प्रयोग से हैरान थे। जब लोगों ने सुना कि बघेल जी को प्रशिक्षण से अधिक आय हुई है तब उनका विरोध होने लगा कि लोग प्रचारित करने लगे कि ’वे कलाकारों का शोशण कर रहे हैं।’ इस बात को बहुत उछाला गया। पर बघेल जी अपनी कला साधना और उसके उच्चादर्ष के प्रति सदैव समर्पित रहे। आखिर उनकी अंतिम इच्छा घड़वा  शिल्प सृजन करते हुए अपने लोक को जाते समय तक जीवन की सार्थकता प्राप्त करने की थी और उन्होंने वह प्राप्त की भी। अब उनमें विश्र्व व्यापने लगा था।

बधेल जी के पास जन्म से ही उनकी अपनी पारिवारिक कला परम्परा का इतिहास था। 1950 में जब भारत में बस्तर की अपनी प्राचीन गणप्रथा इस पूरे देश और उसके संविधान को आधार दे रही थी। तब जयदेव का जन्म कोण्डागांव के तालाब के पार के ग्राम भेलवापारा में हुआ था। पिता सिरमनराम जो स्वयं एक विशिष्ट  शिल्पी थे उनके षिल्प गुरू हुए। बधेल जी ने आठ साल की उम्र से ही घड़वा शिल्प सृजन करना आरंभ कर दिया। ओर उनको विरासत में यह स्थान, परिवेश  और कला सौष्ठव प्राप्त हुआ। इस तरह पुरखों की परम्परा के निर्वाह का गर्व, उसकी रक्षा उनकी अपनी आत्मशक्ति का आधार बन गया था।  

वे बस्तर की कला परम्परा को देखने-समझने और व्यक्त कर सकने की और उसका उन्नयन करने की क्षमता से लैस थे। उनकी आंख कला के वैष्विक विस्तार को देख रही थी। वे कला और कलाकार के सम्मान के लिए बहुत संवेदनशील थे। बस्तर की आदिम कलाओं को जानने और अन्वेषण करने की प्रृवित्ति उनमें सहज थी। आदमी के कलामन को समझने और उसे पैना करने की महारथ उन्होनं शायद बहुत पहिले ही प्राप्त कर ली थी। इसीलिए सबसे कम उम्र के घड़वा शिल्पी होने पर भी वे पुरस्कार के अधिकारी मान लिए गये थे।

2006 को जब मैं छत्तीसगढ़ पर्यटन मण्डल के प्रोजेक्ट के यू.एन.डी.पी. की ग्रामीण पर्यटन योजना के लिए जगदलपुर जिले के मिट्टी शिल्प ग्राम नगरनार, चोकावा़ड़ा के शिल्प ग्राम के आकल्पन और निर्माण के लिए काम कर रहा था और चित्रकोट के भी दण्डामी माडिया परिवेष पर केन्द्रित टूरिस्ट इनफरमेषन सेन्टर के लिए काम कर रहा था। तब रायपुर से आते-जाते श्री जयदेव बघेल से और राम सिंह से जरूर मिलता। तब बघेल जी ने कहा था कि उनके ग्राम के कलाकारों के हिसाब से योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हो रहा था। अनुपयोगी योजनायें ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के उदद्ेष्य से चलायी जा रही थी। कलाकारों की उपेक्षा हो रही है। कोई सरकारी मोटल दूर कही बनाया गया है जिससे उसका लाभ भेलवापारा के शिल्पियों को हो नहीं सकता था। वे दुखी थे।

वे अपने पिता की निर्मित की हुई गुड़ी मंे बैठ अपने पिता के बारे में बताने लगते हैं। वहां लकड़ी की एक बहुत आदिम चेहरे की महिला मूर्ति की संरचना का वर्णन करते हैं कि पहिले इस तरह का काम पुराने समय के बस्तर में होता था। वे बताते हैं कि एक बार तो मैं अकेले ही बस्तर की कला के बारे में जानने के लिए साईकल से निकल पड़ा था। बस्तर के नारायणपुर, कांेटा, सुकमा और सुदूर उनके रिष्तेदार भी थे सो उस बहाने महिनों के उस जंगल-जंगल घूमने के अनेक संस्मरणों को वे बताने लगते बीच-बीच में चुप भी हो कहीं खो जाने...। मैं समझ जाता कि कहने को बहुत बड़े आख्यान मन में है पर दृष्यों के लिए शब्द और समय कम है।
जयदेव बघेल
बधेल जी ने बस्तर के अनेक अन्य कलाओं के कलाकारों को भी आश्रय दिया, सहयोग दिया। पाषाण शिल्प की समाप्त होती परम्परा को बचाने के लिए उन्होंने शिल्पियों को अपने पास रखकर मूर्तिया बनवाई और उसे अपने घर की मुंडेरों, दीवारों पर जड़ सुरक्षित किया। उनका पूरा घर प्रयोगशाला, निर्माणशाला, आश्रम, संग्रहालय, पथप्रदशक और जीवंत संग्रहालय बना रहा। अपने परिवार की कला विरासत की परम्परा बनाये रखने के लिए पूरे घर के सदस्यों की कला यात्रा को उन्होंने एक दिशा दी और अन्य कलाकारों के लिए एक ध्येय प्रदान किया।

बस्तर की जनजातीय कथाओं, संस्मरणों, विविध समयों की समझ के घनी थे। बस्तर पर आ रहे परिवर्तन के नित नये-नये रूपों को समझ रहे थे। आज के 20 वर्शो के बाद के समय की जैसे उन्हें भनक लग गई थी। इसीलिए वे अपनी दुनिया में सिमट गये और अपने कार्य को बाहरी दुनिया से अक्षुण्ण रखने का प्रयास करने लगे। वे कहते थे कि ये नौकरशाह बस्तर की कला परम्परा को एक दिन धन केन्द्रित बना कर नष्ट कर ही देंगे।

उस दौरान अविभाजित राज्य के हस्त षिल्प विकास निगम ने घडवा शिल्पकारों के लिए शिल्प क्रय योजना की क्रियान्विती की जिसके अनुसार षिल्पकारों के शिल्प तराजू पर तौलकर लिये जा सकने की नीति बनी और कुछ कमीषन भी तय हुआ। इससे कला परम्परा एक दूसरी दिशा में मुड़ गई। घड़वा शिल्पी वजन बढ़ाने के लिए अधिक मिट्टी का उपयोग करने लगे, भारी मूर्तियों को बनाया जाने लगा। कलात्मक बारीक मोटिव्ह ने अपने आकारों को बदला और खोया। जल्दी बन सकने वाले शिल्प तैयार होने लगे, कला मूल्य किनारे कर दिए गये। शिल्पों में जनजातीय मान्यता के प्रतीकों का सम्मान नष्ट हुआ। व्यवसायिक संस्थाओं के डिग्रीधारी कला डिजाईनरों ने आकर दूसरे राज्यों के प्रतीकों और आकारों को लाकर शिल्पों को बाजार की आवष्यक्तानुसार बदला।

बस्तर का सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक परिवेष तेजी से बदल रहा था। गाथाओं के जानने वाले और गाने वाले खांसते हुए थकने लगे थे और लगभग चुप हो गये थे। अब वे उस सम्पदा को लेकर जाने वाले थे। मुरियों के घोटुल जो जंगल के भीतर कभी जीवंत थे। विविध दबावों के चलते नष्ट होने लगे या बन्द होने लगे थे। अक्सर ही मंद बनाते हुए लोगों को पकड़ने रोज ही ग्रामों के घरों की तलाशी होने लगी थी। बेरोजगार बढ़ रहे थे। दूर का कभी-कभार का सिनेमा छोटै बाक्स की शक्ल में गांव के समर्थ के आंगन में पूरे गांव की भीड़ से छोटा पड़ता नजर आने लगा था। बाजार बढ़ रहा था। नकली सामान यहां खूब उंचे दामों पर बिक रहा था। देखने-सुनने में आता था कि बाजारों में, ग्रामों में वर्शों से जमे समृद्ध व्यापारियों की सूदखोरी का जाल इस दौरान सबसे मजबूत था। जिसे तोड़ पाना ग्रामों के गरीबी से जूझ रहे मुरियों-माडि़यों के बस का नहीं था।

इस दौरान जयदेव बघेल ने घड़वा सृजन के अलावा वाचिक परम्परा के सरंक्षण का महती कार्य किया। वे अब एक बस्तर के आदिम संसार के प्रस्तोता बन गये थे। विविध संस्थायें और अच्छे लोग उनके कामों से आकृश्ट हुए। जयदेव बघेल ने बेलमेटल की शिल्पकारी बचपन में ही शुरू कर दी थी। अपने हुनर के दम पर शीघ्र ही राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना लेने वाले स्वर्गीय डॉ जयदेव बघेल को उनके शिल्पकारी के लिए देश-विदेश में कई अवार्ड मिल चुके थे।

वर्ष 1977 में उन्हें कला की साधना के लिये शिल्पकला के क्षेत्र में देश का प्रतिष्ठित नेशनल क्राफ्ट अवार्ड मिला था। तब उम्र 24 साल थी। वर्ष 1976 में उन्हें मध्यप्रदेश राज्य से सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 1978 मे जयदेव बघेल के अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी मास्को मे आयोजित की उन्हें अंतर्राष्ट्रीय शिल्पकार माना गया। भोपाल में भारत भवन के उद्घाटन अवसर पर वर्ष 1982 में उन्हें प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी के हाथो शिखर सम्मान प्राप्त हुआ. 1982 में लंदन में आयोजित हुए भारत उत्सव में उन्हे सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ। डॉ बघेल को हाल ही में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से डी.लिट की मानद उपाधि प्रदान की गई थी। रायपुर में नवम्बर 2012 में षिल्पगुरू सम्मान मिला। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय में आप एक बार कला एवं संस्कृति विभाग के सलाहकार पद पर भी रहे हैं।

जयदेव बघेल अन्र्तराश्ट्रीय स्तर के शिल्पी 80-90 के दशक में बन चुके थे। उन्होंने स्कॉटलैण्ड, इटली, जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, हॉगकॉग, सिंगापुर, बैंकाक आदि में घडवा शिल्प की अनेक सफल प्रदर्शनियाँ लगायीं. जो लगभग 35 शहरों में लगी मुख्यतः ये प्रदर्शनियां मास्को, टोकियो, सिंगापुर, रोम, पेरिस, लंदन, आक्सफोर्ड, हांगकांग में लगी। मुंबई के प्रतिष्ठित जहांगीर आर्ट गैलरी में छत्तीसढ़ प्रदेश से सबसे अधिक मौकों पर शिल्प कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाने का श्रेय डॉ जयदेव बघेल को ही प्राप्त है। 22-28 जुलाई 1996 को यहां उनकी एकल प्रदशिनी लगी रही। विष्व प्रसिद्ध मूर्तिकार हेनरी मर विशालकाय धातु प्रतिमायें बनाते थे. उनकी एक राजा-रानी की प्रतिमा जयदेव बघेल को प्रदर्शनी मे देखने को मिली जो बिलकुल बस्तर शैली की थी.
अविभाजित मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद सात बार जिला प्रशासन ने पद्मश्री अवार्ड के लिए उनके नाम की सिफारिश की लेकिन उन्हें यह सम्मान नहीं मिल पाया। पिछले दो साल से उनका नाम लगातार प्रदेश सरकार को इस अवार्ड के लिए कोंडागांव जिला प्रशासन द्वारा भेजा जा रहा था। पर आष्चर्य किन्तु सत्य है कि जितने समय जयदेव बघेल आग की भट्टी के सामने तपते और पसीना बहाते काम करते रहे उतनी ही उम्र (समय) के लोगों को इसी प्रदेश के भेजे नाम से पद्म श्री मिल जाती रही है और तब भी शिल्प गुरू डाॅ. जयदेव बघेल प्रतीक्षारत ही होते हैं।

उनकी घड़वा कला के कद्रदान पूरे विश्व में हैं। वे राज्य की मषीनरी पर आश्रित नहीं रहे। उनके पिता का बहुत सारा शिल्प विदेषों की संग्रहालयो में संरक्षित हुआ है। उनका पूरा परिवार शिल्पकारी के क्षेत्र में सक्रिय है। अब पुत्र और नाती इस कला परम्परा को अपनाये हुए हैं। उन्होंने मृत्यु पर्यंत अनेक लोगों को इस विधा में पारंगत किया। कोंडागांव की एक पूरी बस्ती भेलवापारा आज बेलमेटल कलाकारों की बसाहट है। 1992 में माधवराज सिंधिया ने कोण्डागावं आकर षिल्पग्राम का उदघाटन किया था। बघेल ने अपनी कोशिशों के चलते कोंडागांव को शिल्पग्राम के रूप में पहचान दिलाई। यहां लकड़ी, टेराकोटा, मैटल, पत्थर, बुनकरी, पेंटिंग, बांस शिल्प आदि नौ-दस शिल्पों का प्रषिक्षण दिया जाता रहा। यह उनके अपने पूरे जीवन भर की सार्थक पूंजी है। जयदेव बघेल लगातार काम करते रहे और लगभग पांच दशक तक वे बस्तर की ढोकरा कला का एकमेव चेहरा बने रहे. वे निरंतर प्रदर्शनियाँ आयोजित करते रहे, नयी पीढी के लिये प्रशिक्षण शिविर लगाते रहे और देश विदेश के नियमित अंतराल पर दौरे भी करते रहे। बघेल जी एक तरह से बस्तर के पचास साल के ‘समग्र दस्तावेज’ की तरह हैं।

1982 में उनका आलेख ढ़ोकरा शिल्प विघा पर आया था और टाटा पब्लिकेशन ने भी परम्परागत शिल्पकार किताब पर उनका महत्वपूर्ण विवरण चित्र सहित प्रकाशित किया है। उन पर अनेक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेख छपते रहे और अभी हाल में घडवा शिल्प पर उनकी पुस्तक का विमोचन श्री रमन सिंह ने राज्योत्सव 2014 के मंच से किया था और तब से नौ दिन बाद उनके चल पढ़ने की बेरा आ गई। श्री राजीव रंजन प्रसाद का कहना ठीक लगता है। ‘ कला कभी कोई युग अस्त नहीं होने देती, और कलाकार कभी मरते नहीं।’ और जयदेव बधेल तो सदा जीवंत ही रहेंगे अपनी कलाकर्म के दम पर...

इस आलेख को लिखने के पहिले मैंने श्री ललित शर्मा ज़ी का ब्लाग ‘शिल्पगुरू डाॅ. जयदेव बघेल नाम ही काफी है’। बस्तर के श्री राजीव रंजन प्रसाद, का आलेख‘ जयदेव बघेल कभी मरते नहीें। नई दुनिया, भास्कर और पत्रिका के लिखे को पढ़ा था। कोण्डागांव के श्री खैम वैष्णव के संस्मरण भी याद आये। इन लेखों से संदर्भ और गति मिली। इन सभी महानुभावों से इस वैचारिक श्रेय को बांटना चाहता हूं।

आगत शुक्ल
16 नवम्बर 2014 रायपुर, छत्तीसगढ़