शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

बैगा अचानकमार के

बैगा अचानकमार के
बैगा
 बैगाओं की सांस्कृतिक धनीभूत भूमि बैगाचक कहलाती है। संयोग से वह नये राज्य बनने के साथ राजनैतिक व्यवस्था के तहत दूर हो गयी हैं। बैगाचक से सांस्कृतिक कला और संस्कृति की लहरें अब भी इस क्षेत्र को झंकृत करती रही हैं। पर लमनी, मुंगेली जिला,छत्तीसगढ़ के बैगा जनजाति के लोगों के लिए वहां की याद अब भी जेहन में बसती है। वे वहां की याद करके बार-बार सिहर उठते हैं कि जनजाति का सांस्कृतिक कालक्रम का परिदृष्य ऐसा था वैसा था।

जनजाति का सांस्कृतिक बैगा जनजाति के कला कौशल को तथा प्रदर्षनकारी रूपों को अन्य जातियों के प्रभावों ने भी प्रभावित किया हैं जो साफ देखा जा सकता है। अत्यन्त संदेवदनषील और एककांतिकता में रमने वाली जाति बहुत सारे मनोवेगों में उलझी सी लगती है। हांलाकि कला और नृत्यों के प्रति उसके आकशर्ण में वृद्धि ही हुई है पर वह इस तरह से है कि जहां कभी पूरा ग्राम ही व्यक्ति से नर्तक और नृत्य में बदल जाता था और आंतरिक शक्ति आवेग इन कलाओं के माध्यम से निकलता था इससे कला भी निखरती थी और जीवन भी कला सौन्दर्य से भर जाता था जनजाति के हिंसक मनोभावों का स्वतः निरोध हो जाता था। 
बैगा नृत्य के लिए
अब धीरे-धीरे बैगा समाज दर्षक के रूप में दीखने लगा है। बैगा ग्रामों में बम्बईया गीतों, या रायपुर के बैगानी करमा गीत इस तरह की स्वर लहरियों में सीडी पर बजाये जा रहे हैं। अन्य भाषा -भाषी गायक अपना फूहड़ संगीत ग्रामों में गुजा रहे हैं। दो अर्थी गीतों की का आक्रमण तो पहिले ही हो चुका है। इन आधुनिक संसाधनों से निर्मित और प्रसारित गीतों का साम्राजय वनांचलों मंे सर्वप्राय‘ गुंजित है। इसका दुश्परिणाम यह हो रहा है कि एक बैगा युवती-युवक अब अपने परम्परागत गीतों को बेझिझक और उन्मुक्ता से नहीं गा पाते।  यह प्रभाव महिलाओं में सियानिनों के कारण कम हो पा रहा है लेकिन बच्चों में जनजातीय परम्पराओं के ज्ञान के प्रति जिम्मेदारी का अहसास कम से कमतर होता चला जा रहा है। बैगाओं की अपनी सामाजिक मूल प्रवत्ति जो ग्राम्य संस्कृति को व्यक्त करती थी। उसके प्रतीक में अनुषासित रखती और एक तरह का जीवन दर्षन भी विकसित करती थी। समाप्त हो रही है।
बैगा साप्ताहिक बाजार
बैगाओं ने साप्ताहिक बाजार मेें आने वाले ऐसे व्यापारी जो विनिमय में सामग्री लेते-देते हैं। उन्होंने बैगाओं के पारंपरिक आभूषणों का विनिमय किया। आज हालात यह है कि बैगाओं के पास नृत्य के लिए सजनें-संवरने के लिए अपने पारंपरिक आभूशणों का अभाव है।
अंगराग की कहें तो बैगा जनजाति जो अपने गुदनों के चमत्कारिक प्रतीकों और ज्यामितिक संरचनाओं के लिए पूरी दुनियां में मषहूर थे। अब वे गुदना गुदवाने से परहेज भी करने लगे हैं। वे अब गोंडी गुदना हाथ पर या पांवों में अंकित करवाने लगे हैं अंगराग की यह अप्रतिम कला शरीर के कैनवास को छोड़ अब किताबों और चित्र या पेंटिग्स के रूप में हमारे घरों या संग्रहालयों की शोभा ब़ड़ाने की सीमा पर आ गयी है।
बैगाओं के पारंपरिक आभूशणों को पारंपरिक हाट बाजार के व्यापारी नहीं बेचने आते, वे दिल्ली के सस्ते, खराब पालिश  के बने जो दो तीन माह में उतर जाते हैं ऐसे आभूषण विक्रय करने आते हैं। इस तरह दिल्ली के बाजारों में जो सामग्री व्यर्थ, चलन से बाहर और पहिनने से शरीर के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालती है। यह सामग्री महिलाओं द्वारा पहिनी जाती है। जिससे उन्हें विविध डिसीज और केन्सर जैसे रोग होने की महती संभावना है।
बैगाओं की परम्परागत पोशाकें जो शादी व्याह में दी-ली जाती हैं। उन्हें पनिकाओं के द्वारा हस्तशिल्प के माध्यम से करघे पर बनाया जाता रहा है। कच्चे माल का मंहगा होना और बढ़ती हुई मजदूरी और पनिकाओं की अपनी जरूरतों ने बैगाओं के पहिने जाने वाले वस्त्रों को अत्यन्त मंहगा कर दिया है। अब बैगा बाजार की सस्ती, चमकदार रंगों से बनी कपड़े का उपयोग करने लगे हैं। इस तरह वस्त्र परिवेश छिन्न-भिन्न हुआ है।
बैगा स्त्री
बैगाओं ने हजारों वषो से एक सहृदयी और शांत जनजाति होने का परिचय दिया है। न तो उन्होंने सेनायें बनायी न युद्ध लड़े बस वे प्रकृति के संग-संग अपने अस्तित्व को सम्हाले रहे। वे शेर की पूजा करते है। अपने को जंगल का पुत्र मानते हैं। वन को समझने की समझ और वनों के बारे में उनकी परम्परागत जानकारी का उपयोग जंगल को बचाने के लिए उपयोग करने का अब अवसर दीखने लगा है।
राज्य वनों में जिन्हे दायित्व सोंपता है वे उस दायित्व के निर्वाहन के लिए वहां मुस्तेैद रहते हैं लेकिन अपनी नौकरी रहते ही उन दायित्वों की प्रतिपूर्ति करते हैं। दायित्य से मुक्त होते ही वनों के प्रति कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। जबकि बैगा अपनी हजारों पीढि़यों से जंगल में रहते जंगल के प्रति अपनी दायित्वों को जीवन रहते पूरा करता है और जाते-जाते अपनी इन पीढि़यों को अलिखित अपेक्षाहीन कर्तव्यबोध कराता जाता हैं। इस तरह बैगा ही वनों के सच्चे सेवक और हितैशी है।
राजधर्म यह है कि वह जनजातियों के परम्परागत काम-धन्धों को समाप्त  न करे। परम्परागत काम धन्धे में लगे लोग बाहरी दुनिया के छल-छन्दों और उसकी रीति-नीति को नहीं समझते। बस वे अपना काम करते हैं उनके ज्ञान का विकास अथवा परिवर्धन, उन्नयन नहीं होता। व्यवस्था सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को पहिले तो बेरोजगार करती है फिर उनके संस्कारों को धूमिल करती है। व्यक्ति इस दौड़ में शामिल हो आवशयक आवष्यक्ताओं के लिए दौड़ता है वह सब भूल जाता है। एकमात्र वस्तुओं के साम्राज्य में उसकी आत्मा खो जाती है। विकास के आंकडों के खेल में हजारों वर्शों की विरासत से बना एक परिवेश दम तोड़ता हैं अंत में जहां जिस खुशी  के लिए आदमी दौड़ता हुआ शायद अपने अंत के समय शांत हो जाता था अब मरते समय भी अत्यन्त व्यग्र और अशांत तरंगों का विस्तार करता इस संसांर में अपनी उदासी और असफलता की तरंगे छोड़ता है। ऐसे में प्रत्येक मानव मन जो इससे तरंगायित होता है। उसके स्मृतिकोश में जा बैठी तरंग उसे किस तरह प्रभावित करती है यह अभी जाना और परखा नहीं जा सकता।
बैगा ग्राम में आगत शुक्ल

समाज विकास के ऐसे पायदान पर खड़ा हो गया है। जहां विकास का मतलब बैकों संख्यात्मक धन शक्ति और औद्योगिक प्रतिभूतियों का संग्रह मात्र रह गया है। सारा विकास आंकड़ों में रच-बस गया है। आंकड़े मानव की सुख और शाति के पैमाने कभी नहीं रहे।
अमेरिका में 90 प्रतिशत नींद की गोलियां खाते हैं तब उन्हें नींद आती है आज भौतिक उन्नित में व्यस्त और मस्त, पूरा संसार अपने गुजरे हुुए कल की टीसें भुलाने के लिए न जाने किस-किस तरह की चीजों का सहारा लेते हैं। पर प्रेमी, नर्तक या कवि होने के लिए उनका सारा प्रयत्न अधूरा ही होता चला जाता है।

बैगा प्रकृति के पास हैं...दुनिया एक दिन उनसे सीखने के लिए उनके पास आ ही बैठेगी तब तक हम इन बैगाओं के परिवेश समाप्त न होने दें।   

आगत शुक्ल

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