शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

मिट्टी बाई-छत्तीसगढ़ी पौराणिक भित्ति उद्रेखण कला

छत्तीसगढ़ की पौराणिक भित्ति उद्रेखण कला

मिट्टी  बाई-जिनके हाथों से पौराणिक मांगलिक सौंदर्य झरता रहा...
 
मिट्टी बाई, छत्तीसगढ़,भित्ति उद्रेखण
मिठ्ठी बाई छत्तीसगढ़ अंचल की भित्ति कला की विलक्षण कलाकार रहीं हैं। मिट्टी बाई गढ़ उपरोढ़ा, कठघोरा, बिलासपुर को उनके विशिष्ट कलाकर्म के लिए उन्हें लोक रूपांकर कलाओं के लिए वर्ष 1989-90 का मध्याप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के शिखर सम्मान से विभूषित किया गया। उनकी भित्ति कला भारत-भवन, मानव संग्रहालय और देश की राजधानी के अनेकों कला संस्थानों में संरक्षित की गई है। मिट्टी बाई छत्तीसगढ़ की गौरव हैं।

कला, जीवन को अपनी कसौटी पर परख चलती है। रंगों की एक नदी के जैसी बहती है हृदय में। सराबोर हो तो आप संसार को ऐसे देखने लगते हैं जैसे वह एक कैनवास हो। रंगों की यह नदी प्रकृति के विविध किनारों पर सौन्दर्य बिखेरती उस विराट की याद में बहते-बहते उस समुंदर में जा मिलती है। जहां जीवन की पूर्णता है और शायद मोक्ष का सबसे निकट तीर्थ भी।

कहते हैं घर में बेटी पैदा हो तो घर जैसे एक झींनी चदरिया ओढ़ लेता है, प्रकृति जैसे एक भविष्य को गढ़ने उतावली हो उठती है, लगता है कि संगीत कोई अपना प्रिय छन्द गा रहा हो। बेटी कभी फूल तो कभी सुगन्ध जान पढ़ती है और हां बेटी जब भी आती है कुछ न कुछ तो अज्ञात लोक से ऐसा कुछ तो ले आती है जो इस पुरातन संसार में सबसे नया होता है।

छत्तीसगढ़ अंचल की एक ऐसी बेटी की याद करता हूं तो बरबस मिट्टी बाई की याद हो आती है। मिट्टी बाई ने छत्तीसगढ़ अंचल में प्रचलित परम्परागत व पुरातन, मिट्टी से उद्रेखण की कला को नया आयाम दिया है। मिट्टी बाई के परिवार में उनकी अपनी बुआ घर में और आसपास के गांवों में जाकर भित्ति अलंकरण बनाती थी। इस पारिवारिक वातावरण ने मिट्टी बाई को बचपन से ही कला की ओर प्रेरित किया। जब वे सात-आठ बरस की थी तभी से वे इस कला परिवेश से मन में कला के अंकुर विकसित होने लगे थे।

मिट्टी बाई
बिलासपुर जिले की कठघोरा तहसील के घरी-पखना ग्राम के त्यौहार परिवार में मिट्टी बाई का जन्म हुआ और बारह साल की इस छोटी उमर में ही गढ़उपरोढ़ा के विश्वकर्मा परिवार में ब्याह हो गया। ससुराल में मिट्टी से जुड़ाव सतत् रहा। जब तीन बेटियां हुई और जब छोटी बेटी सात बरस की हुई तभी पति चल बसे।

तीन बेटियों का पालन-पोषण, शादी-विवाह की चिन्ता में वे घर-घर जाकर भित्ति अलंकरणों को बनाती इससे उनका शौक भी पूरा होता और परिवार भी चलता लेकिन केवल भित्ती अंलकरण बनाकर अपने परिवार का खर्चा पूरा नहीं हुआ तब मजबूरन उन्हें भिक्षावृत्ति को अपनाया। मिट्टी बाई के हाथों से बने देवता प्रतीक्षा करते रहे मिठ्ठी बाई की चाहना की। लेकिन मिठ्ठी बाई ने उन्हें भी यह मौका नहीं दिया, बस सृजन का ईश्वरी भाव और स्वभाव उनमें सदैव सदा व्यक्त रहा। जीवन के कर्म और धर्म में जिस कर्मठता से उन्होंने अपनी जीवटता का प्रदर्शन किया वह छत्तीसगढ़ अंचल की नारियों के लिए एक आदर्श हो सकता है।

बिलासपुर और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में भित्ति अलंकरण बनाने वाले कलाकारों को ‘बढ़ई’ कहा जाता है। नये गृह का निर्माण हो, शादी व्याह हो, पर्व त्यौहार हो घर की सजावट के लिए ‘बढ़ई’ को आमंत्रित किया जाता है और उस दौरान पारिश्रमिक स्वरूप घान और राशि भी दी जाती थी।

भित्ति उद्रेखण , मिट्टी बाई छत्तीसगढ़
बिलासपुर जिले के ग्रामीण अंचलों में लोक और जनजातियों के घरों की दीवारों पर मिट्टी से कलात्मक आकृतियों के उद्रेखण की पुरानी परंपरा रही है। घर की दीवारों, खिड़कियों और दरवाजा के आसपास बनये जाने वाले रूपांकनों में हनुमान, शकर, कृष्ण, गणपति की मूर्तियां विशेष उल्लेखनीय है। जो मंगल-कामना के लिए बनायी जाती हैं। पशु-मूर्तियों में हाथी, सिंह, घोड़ा, नन्दी, हिरण बंदर आदि। सिंह ओर बाघ शक्ति के प्रतीक हैं, वे शक्ति की देवी के वाहन के रूप में पूज्य हैं। घोड़े, गति एवं शोर्य  के प्रतीक हैं, अतः वे वीर योद्धाओं के वाहन के रूप में मान्य हैं। पक्षियों में तोता, मैना, मयूर, मुर्गा, चिड़िया का उद्रेखण घर में सुख समृद्धि की कामना का प्रतीक है। इनके अलावा खजूर, कदम्ब, लताएं, बेल, कमल, केला और नारियल के वृक्ष तथा भांति-भाति के मांगलिक चैक बनाये जाते हैं। नये घर का निर्माण अथवा किसी पर्व-त्यौहार पर भित्ति अलंकरण बनाना शुभ माना जाता है।

मिट्टी  बाई बताने लगती हैं कि कन्हारी मिट्टी में धान का भूसा मिलाकर रात भर उसे पानी में भिंगोकर आकृति बनाने लायक गारा तैयार किया जाता है। सबसे पहिले भित्ति को गोबर से लीपा जाता है। गारे से त्रिकोणात्मक ज्यामिती आकर से बार्डर तैयार की जाती है। पश्चात् गृह स्वामी द्वारा बताये गये देवी-देवता की आकृति बनाकर उसका पूजन किया जाा है। आकृतियों के सूखने के बाद उन पर गेरू, पीली मिट्टी, काली मिट्टी या नील से रंग भरे जाते हैं। कभी-कभी खडिया मिट्टी से ही आकृति को रंगा जाता है। एक कपड़े के टुकडे को ब्रश की तरह बनाकर रंग रंगा जाता है।

मिट्टी  बाई के उद्रेखण कार्य को देखने से लगता है कि धार्मिक विश्वासों और सामाजिक मान्यताओं के प्रति निष्ठा ओर प्रतिबद्धता से ही उनकी कला को नये आयाम मिले हैं। उनकी आस्था का बोध उनकी कला में व्यक्त होता है। लगता है सारा देवलोक मनुष्य की कल्पना सृष्टि का ही हिस्सा है जिसमें आदमी ने अपने अनुभवजन्य, परिकल्पित सौंदर्य, जीवन मूल्य और आस्था को प्रक्षेपित किया है। मिठ्ठी बाई के उद्रेखणों में हमारा सनातन पौराणिक समय, दीवारों पर मिट्टी के विविध उभारों से बार-बार कथा और आख्यानों को नए तरह से दिखाता-सुनाता है। उनकी सृजन शक्ति कल्पनाशीलता, तकनीकी दक्षता और रूप बोध से छत्तीसगढ़ की इस परम्परागत कला को नया अर्थ और विलक्षण सौंदर्य बोध मिला है।

परिषद् से जो व्यक्ति मिट्टी बाई से संपर्क और उन्हें लेने जाने के लिए गया था उसके लिए वह दुरूह यात्रा साबित हुई थी उसकी सुनाई कहानियों को हमलोग मजे लेकर सुनते थे। वह शार्टकट के चक्कर में पहाड़ के रास्ते गया तो वहां रीछ बैठे मिले फिर लौटा और फिर सुबह गया और जाने कितने सांप और बिच्छुओं से भी सामना हआ। जब मिट्टी बाई शिखर सम्मान लेने भोपाल आई तो पहले परिषद्, भोपाल में उनका आना हुआ था। उनके अत्यंत विनम्र सहज-स्वभाव-सरलता और आत्मीयता ने हम सभी को अपने अर्तमन में झांकने के लिए विवश किया था। वह समय और भाव अब भी मुझे याद है। 


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