शुक्रवार, 6 जून 2014

लिंगोपेन: देवगांव, बस्तर

लिंगोपेन गाथा संकलन : देवगांव, बस्तर
भारत में आख्यानों का समय वैदिक काल के बाद का है। यज्ञ आयोजनों में आख्यानों का पाठ होता था ये आख्यान नाट्य, नृत्य गीत के विविध पक्षों से सौन्दर्य सत्ता का प्रदर्शन भी करते थे। छत्तीसगढ़ की इस धरती को जब महाकान्तर नाम से पुकारते होंगे। उसके दृश्यों को खोजते रहने की धुन मुझे जाने किन-किन पुस्तकों, गाथाओं, कथाओं में पुरातन समय के संसार की यात्रा कराने लगती है।

ऐसे में पिछली सदी के समापन दशक को याद करने लगता हूं जब लिंगोपेन की गाथा का संकलन करने के लिए देवगांव, बस्तर में रहना हुआ।

बुन्देलखण्ड की धर्मासावरीं गाथा, आल्हा, जगत का पुआंरा, कबीर के भजनों के संकलन सर्वक्षण के बाद बधेलखंड की लोक कलाओं पर काम करने का अवसर मिला था। भीली क्षेत्र में गीतों का संकलन, अमरकंटक, बैगाचक, के पहाड़ी हिस्से में कबीर निरगुनिया पदों की लम्बी खोज यात्रा से मध्यप्रदेश को जाना था। पहिले एक बार बस्तर के धनकुल गाथा गायकों की खोज करते हुए जगदलपुर के नजदीक के ग्राम आसना से गुरूमायों खोजकर भोपाल लेकर गया था। जहां समग्र धनकुल जगार कथा की रिकार्डिंग, संकलन संपादित की थी।

आगत, Agat shukla
भोपाल से छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस... हम लोग शाम को लगभग दौड़ते..पकड़ते, सुबह रायपुर उतरते ही पास खड़ी बसों में बैठते और यहीं से हमारे मन का बस्तर हमें अपने उस आदिम समय में समेट लेता, हमें जैसे सब कुछ बस्तरिया ही लगता। रायपुर शहर बस्तर के हाट-बाजार से कुछ अधिक न था। ट्रेन से उतरते ही रायपुर का हर आदमी जनजातीय महसूस होने लगता। स्टेशन पर बेवजह खींसें निपोरते बस चालक आयातित लगते और कन्डेक्टर कहीं से भाग आया हुआ आदमी लगता। स्टेशन से निकलते ही होटल से तुरत-फुरत खरीदे चार समौसे ही प्रातः का नाश्ता और खाना हो जाते जो बस में बैठे-बैठे खा पाते। चिन्ता होती कि जल्दी से जल्दी लग्जरी बस पकड़कर कोण्डांगाव पहुंच जायें शाम ढ़लने के पहिले ही। कोण्डागाव लांज की सुविधा से जंगल की जमीन पर सोना ठीक लगता।

कोण्डागांव के पहिले दायें ओर के रास्ते नारायणपुर चैक पर जाकर 200किमी की यात्रा पूरी हुई कि लग्जरी बस को विदाई दी, शाम हो रही थी। कुछ देर इंतजार के बाद पता लगा कि नारायणपुर जाने वाली बस तो निकल गई है अब 70 किमी का रास्ता है। वहीं तिराहे पर बतियाता ट्रक का ड्राईवर चाय पीते-पीते खुद ही पूछने लगा ‘साहब क्या बाहर से आये हो, नारायणपुर जाओगे ? मैनें कहा ‘हां भाई आप तो जानते ही हो कि वही जाने के लिए खड़ा हूं।’ पैसे की बात नहीं हुई वह भी जानता था कि मुझे जाना है मैं भी जानता था कि मुझे वही ले जायेगा। ट्रक को अब अंतिम सवारी मिल गई, दो-तीन गांव निकल गये, आगे जाते-जाते ‘ााम बीती और अंधेरा हुआ पता लगा कि ट्रक में लाईट तो थी ही नहीं, पर ट्रक खड़खड़ाता बहुत जोर से था और ट्रक के पिछवाड़े में लदे मुरिया महिला, पुरूष भी जोर-जोर से गीत गाने लगते। यह गीत संकेत किसलिए ? लोगों को संगीत ध्वनि का आसरा था कि सामने आ रहा वाहन इस ध्वनि को सुन लेगा और समझ जायेगा गाड़ी आ रही है गीत गा रही है। मैं सांस रोके अपना बैग सम्हाले अगली सीट पर दुबका। छिटकी सी चांदनी में मुझे हर मोड़ देवगांव का मोड़ ही समझ आता, पर ड्राईवर तो बस काली सड़क और उसके बाजू की लाल मुरूम पर ही आंख गढ़ाये रहता। मुझे समझ आया उसका यह काला-मैरून रंग की रेखा का भेद ज्ञान ही हम सबके जीवन का सहारा है। ट्रेन की अधूरी नींद जाने कब झपकी तक ले गई पता हीं नहीं चला तभी ‘साहब उतरना है कि नहीं देवगांव आ गया।

 रामसिंग  काष्ठ शिल्पी
सचमुच देवगांव आ गया था, बस जंगल सा ही था। देवगांव की सड़क पर पहला मकान रामसिंग मुरिया का था समझ नहीं आया कि साल का पेड़ पहिले था जिसके नीचे घर बनाया या पहिले घर था जिसके बीच से पेड़ उगा। मेरे लिए वह एक बस स्टेंंड, एक धर्मशाला, एक होटल और सुरक्षा का आश्वासन था। रामसिंग दुबला पतला पर मजबूत काष्ठ शिल्पी है, वह जंगल जाता, लकड़ी लाता, मुखौटे बनाता रहता, मुखौटै बन जाते या आधे अधूरे भी होते और यदि वन विभाग के लोग आ गये तो मुफत में ले जाते। कुछ नियम भी सुना देते। रामसिंग का कलाकार लुट जाता और रामसिंग बच जाता। लकड़ी के देव मुखौटे नियमों के संरक्षकों के हाथों जाते-जाते साहबों के ड्राईगरूम में राक्षसों के मुखौटे बन जाते और आदिम कला के प्रतिमान रचते। अब रामसिंग छिपकर मुखौटे बनाने लगा और उन्हें दूसरे मुरिया की झोपड़ी में जाकर छिपा देता। कभी-कभी अपने घोटुल के मुरिया नृत्य दल को भोपाल गणतंत्र दिवस पर लोकरंग में लेकर आता ककसार या मांदरी गाता, नाचता और अपने संगियों को गणतंत्र की खुशी बांटता, वह देवगांव के घोटुल का पुराना सदस्य जो ठहरा। इसलिए उसके मकान में अतिथि हो जाने में अतिथि को एक गर्व महसूस होता। रामसिंग बाहर से आने वाले आदमी को यदि ‘साहब’ कह देता तो सारा गांव उसे ‘साहब’ ही मान लेता। प्रतिप्रश्न नहीं करता।

रामसिंग बताने लगाता कि अब वह शिल्प नहीं बनायेगा। लोग उसके यहां आते हैं और उसे ठगकर चले जाते हैं। रायपुर से एक सज्जन अकसर कुछ विदेशी लोगों को लेकर चले आते, दो-तीन दिन के लिए वह अपने सारे काम छोड़ साहब-साहब कहता वह गाईड बन जाता, लोगों को गांवों से, खेतों से, काम पर से बुला-बुला कर लाता, अपनी जिम्मेदारी पर जंगल का ज्ञान अपरिचितों को परोसता वह प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देना अपना धर्म भी समझता और यही उसका अहम भी बनता। इस गर्व ज्ञान में गोंडी-हिन्दी भाषा का दुभाषिया भी बन जाता और फिर रायपुरिया सज्जन उसके जितने भी काष्ठ शिल्प होते अपनी गाड़ी में रखवा लेते, गाड़ी स्टार्ट हो जाती, ऐसे में उन साहब को रायपुर जाने की जल्दी अकसर होती। जाते-जाते रामसिंग की नमस्ते के बीच ही कह देते थैंक्यू..जब तुम रायपुर रायपुर आओगे तो घर जरूर आना, इन सबका जो भी होगा दे देंगे...पर वह बेचारा रामसिंग...‘बहुत बार होने पर एक बार उसने कह ही दिया कि साहब हमें आप जैसे कला कद्रदानों की जरूरत नहीं आप यहां न ही आया करें। हम ऐसे ही ठीक हैं।’

MURIYA 
MANDRI DANCE
यह वह 1987 का समय था जब देवगांव का घोटुल खत्म हो रहा था। रामसिंग के भाई का नाम भी रामसिंग ही था वह गांव की सड़क के दूसरी ओर 1 किमी अंदर के गांव में रहता था। उसका मुरिया नृत्य दल प्रायः भोपाल के बुलावे पर तुरन्त आ जाता। रामसिंग अच्छी जड़ी-बूटी की दवा जानता है। रामसिंग की गांव की चर्चा शहर तक चली गई। साहब की बीबी को गठिया था तो कुछ पुलिस महकमे के लोग उसके पास आ पहुंचे, दवा ली खैर खबर पूछी और चले गये। पर रामसिंग के तो दुर्दिन आ गये। जंगल के लोगांे ने भी पूछा क्यों आये थे ? सब कुछ बताओ, पर वह बेचारा क्या कहता... कुछ दिन बाद फिर मेम साहब के घुटने की दवा लेने लोग आ गये उन्होंने भी पूछा यहां के हालचाल कैसे है। अब रामसिंग इन दो के बीच नाचने-पिसने लगा। गांव में मुरिया नाचना, गाना, मिलना बंद हो गया। देवगांव का घोटुल वीरान हो गया। गांव में रहना दूभर हो गया। अब वह सदैव डरा डरा सा रहता।

 बेलगूर चित्र
नारायणपुर का देवगांव हम दूरस्थ लोगोंं के लिए धीर गंभीर बस्तर था। गांव से कुछ दूर चित्रकार ‘बेलगूर’ का घर  था। चित्रकार स्वामीनाथन जी अपने समय में बेलगूर के चित्रकार को समझने का प्रयास करते रहे और उन्होंने ही बेलगूर के हृदय के उस गहरे-आदिम कैनवास को पहचाना था। भारत भवन के संग्रहालय की सामग्री संकलन करते हुए वे बस्तर पहुंचे और बेलगूर में उन्हें वह आदिम आदमी मिला।  निश्चित ही बेलगूर हमारे समय के बड़े जनजातीय चित्रकार हैं।

शिल्पी पण्डीराम
देवगांव के पास के ही गांव में काष्ठ शिल्पी पण्डीराम का गांव है। पण्डीराम अपने घर के सामने मैदान में लकड़ी को बस्तर की कला में बदलते दीखते। वे दूर से ही किसी काष्ठ के टुकड़े पर कुछ खोजते से दीखते। पसीने में उनका शरीर सौने की सी आभा देता लगता और आंखों में जैसे किसी पुरातन विरासत की परम्परा दीखती, मुस्कुराते हुए जीवन की जीवटता जैसे जंगल से भैंट में मिली दीखती। मैं तय नहीं कर पाता कि क्या यह काष्ठ शिल्पी गांव में है या शिल्पी में गांव है। अपने लगभग पूरे जीवन भर वे अपने कलाश्रम को विविध संस्थानों को चन्द रूपयों के बदले बस्तर की कला उपलब्ध कराते रहे हैं। पर सब कुछ विनिमय के तौर पर ही सम्पन्न हुआ।

यही से हम गोलावंड की ओर चल देते। रात में जाने पर वहां शेर की आवाज सुनाई देती इसलिए दिन में ही जाना हो पाता। काष्ठ शिल्पी को अपने घर के बाहर पड़े वृक्षों के उन ठूठों से मानवाकार ‘ाक्ल के मानवीय शिल्प बनाता देखता। उसे देखकर लगता कि वह ‘ाहरी मानस के सौन्दर्य विलास को समझने लगा है और जब उसे बहुत आड़ा तिरछा पेड़ दिखता तो उसकी आंखों में चमक आ जाती और एक आदिम शिल्प उससे आकार ले लेता। कभी कभी उसका बनाया शिल्प जब नहीं बिक पाता तो महुआ उबालने के चूल्हें में उसका उपयोग होता, ऐसे समय यदि कोई व्यापारी आ गया तो वह अधजला शिल्प सबसे कीमती शिल्प माना जाता। उसके घर जब भी गया हूं  हमेशा उबलता हुआ महुआ और गुस्से से उबलती हुई उसकी पत्नी दिखती। बच्चे और कुत्ते आपस में लिपटते-खेलते दीखते,,,इसके अलावा उसके घर में जैसे कुछ था ही नहीं। टूटे फूटे मिट्टी के बर्तन, और बिना दरवाजे की झोपड़ी बस यही उसकी गृहस्थी थी। दिल्ली के व्यापारी अकसर उससे मिलने आते। काष्ठ शिल्पों को जलाऊ-लकड़ा बताकर उसकी टी.पी. बनवाते और और मिनी ट्रक भर कर ले जाते। बाद में हस्तशिल्पियों की संस्था ने बस्तर के सारे शिल्पों को तोलकर ही खरीदना आरंभ किया। कला का मूल्य कभी नहीं तय हुआ।

तो गाथा संकलन के लिए एक काला बैग जिसे गांव के मुरिया जन गौर से देखते उसे उठा चलने में उत्साह दिखाते। वे जताने की कोशिश भी करते कि बैग में रखी चीजों को उन्होंने, कभी, कहीं देखा है। तो एक पुराना टेपरिकार्ड, सोनी की आडियो कैसिट, सेल, माईक लेकर मैं अकेले ही बस्तर के कोण्डागांव से 80 किमी नारायणपुर से पहिले दो किमी पर देवगांव पहुंच ही गया था। रात की चांदनी और उसके तारे और रामसिंग का घर अब मेरा भी घर था।

रात में गांव के लोग भी आये चर्चा मंे तय हुआ कि पास ऐड़का ग्राम की ओर ही 9 किमी दूर गायक का गांव हैं जो 71 साल के हैं नाले के पार गांव हैं इसलिए लाईट नहीं है। इसलिए देवगांव में ही रामसिंग के घर पर रिकार्डिंग करनी पड़ी। रात को जंगल की ओर की तरफ पड़ी खटिया में सोया, रामसिंग बताता है कि पास ही महुआ के पेड़ के नीचे सुबह-सुबह रीछ आते हैं इसलिए उस ओर मैदान मत जाना। गांव का एक लड़का सुबह ही साईकिल से चला गया और दोपहर होते-होते साईकिल पर एक व्यक्ति को बिठाकर ढ़ो लाया। मैने देखा वह उन्हें बांध कर लाया था। उनके हाथ की उंगलियों और पांव के अगले हिस्से गलने लगे थे पर गले में आवाज और आंखों में जीवट था। मैंने कहा कि ‘आप कैसे यहां तक आ पाये। आपकी तबियत ठीक नहीं’ उन्हांेंने कहा कि ‘तबियत तो मुझे ले जाकर ही छोड़ेगी। पर जो मैं जानता हूं वह बचा रहे यही मेरी जीवन का बड़ा काम होगा।’ और उसी रात से तीन-तीन धण्टे की पारियों में गाथा गायन होने लगा मैं रिकार्डिंग करने लगा। पांच दिन रूक-रूक कर गायन होता, वे दिन में गाने से मना कर देते और शाम होते वे थोड़ी सी महुआ की शराब की मांग करते हर आधे घंटे में एक कप महुआ के साथ यह गायन चलता रहता। महुआ जैसे बार-बार उनमें दुगना उत्साह भर देता।

Gotul
सुबह किसी न किसी गांव की ओर चल देते और सारा दिन काट लेते। रामसिंग कहता कि सल्फी पीकर लू नहीं लगती। और हम सभी इसी का आसरा ले पैदल चल देते। एक सुबह राम सिंग के दूर के मामा के चाचा के भतीजे के, इसके के ,उसके के उसके का देहांत हो गया। रामसिंग का जाना जरूरी था सो हम भी तेज गर्मी में नदी के किनारे-किनारे सूखी रेत में चलते-चलते एक गांव में पहुंचे वहां महज 2 रूपये में बच्चों से खरीदे डाल के पके 4 आमों को खाया बच्चों को आश्चर्य था कि आम के बदले पैसे भी मिल सकते हैं बच्चों ने दो तीन आम हमें यों ही दे दिए उनका का स्वाद आज भी मुझे याद है आगे चलते हुए दोपहर बाद देवगुड़ी में उस ग्राम के मृतक के संस्कार की पूजा में शामिल हुऐ। लोग आने लगे धीरे-धीरे गाते हुए नृत्य-गीत होने लगा है।

एक सुबह रामसिंग की पत्नी को पेट में दर्द हुआ। मैं खिड़की से देखता हूं गांव का सिरहा ध्वन्यांत्मक मंत्रों की गहन गुनगुनाहट करता, जैसे आमंत्रण करता हो शक्ति का, जैसे बजाता हो वाद्य प्रकृति का सांसे ऐसे चलती कि बस अब यही अंतिम सांस होगी। मैं सांस रोके देखता रहा। कुछ ही देर में स्त्री ठीक हो गई और उठकर जंगल में महुआ बीनने चली गई।

तो लिंगोपेन गाथा पूरी हुई यह गोंडी में गाई गई थी। पारिश्रमिक देने के बाद गायक ने मेरी आंखों में गहरे से झांका विदा होते मुझे लगा कि जैसे वे सदियों का अपना बोझ उतार कर मुझ पर डाल चल दिऐ। अब लिंगोपेन की गाथा आडियो कैसेट में बंद थी।

आदिम समय, उसका परिवेश, उसका संगीत और वेद से भी पुरातन समय जब केवल नदियां, घाटियां और पर्वत ही देव थे तब के समय की कथा, तब का समय मेरे झोले में था। खाली जाना और भरकर आना मुझे पहिली बार महसूस हुआ।



2 टिप्‍पणियां:

  1. कथानक बड़ा है, पर इसमें कलाकारों की गहन पीड़ा सम्मिलित है। मैकाले के थैले से पैदा हुई साहबी ने भारत की संस्कृति को बर्बाद किया। कलाकार के भीतर सिर्फ़ कलाकार होता है और कुछ नहीं होता। वह अपनी कला के माध्यम से ही जाना जाता है। आपने प्राचीन संस्कृति को संजोने का काम किया, आभार।

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  2. आपका टीपना एक बड़ी स्वीकृति सी हासिल कर लेना लगता है। आपकी टिप्पणी अगले लेख के लिए मानस और साहस तैयार करती है। धन्यवाद सहित

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