सोमवार, 30 जून 2014

सोनाबाई रजवार


सोनाबाई रजवार, छत्तीसगढ़
सोनाबाई, जी हां भारत की बेटी के तौर सोनाबाई की कला का जादू पूरे विश्व में अपने शीर्ष पर आया है। दरअसल सोनाबाई ने अपने घर के आंगन और गांव के चबूतरे पर बैठ अपने चिंतन से उस चित्रांकन को आकार दिया जो शून्य की समाधि से उतर कर आया ऋषि का मन व्यक्त करता है। अभिव्यिक्ति और चेतना के जाने किस पटल पर देखे चित्रों को सोनाबाई ने भौतिक दुनिया पर उतारा, यह देखना जो है और उस देखे हुए को दिखाने की कला में सोनाबाई ने जो महारथ हासिल की है उसके चलते वे भारत की सच्ची बेटी के रूप में आज प्रतिष्ठित हुई हैं।
आगत agat

सोनाबाई के मेरा संबंध दृश्य और दृष्टा का है। 2003 में सरगुजा के इन कलाग्रामों में चला आया था। पहिले कभी 1992 में भी आदिवासी लोक कला परिषद् के काम से पुहपुटरा आना हुआ था पर वह यात्रा सरकारी थी। परिषद् कभी किसी प्रदर्शनी या स्टेज के सौन्दर्य के लिए उन्हें आमंत्रित करती। तो 2003 में ग्राम मेन्ड्रा के पास उतर में सुन्दरी बाई के घर की ओर पैदल ही चल पढ़ा, रास्ते में मिट्टी के अलग अलग रंग देखे तभी लगने लगा कि सोनाबाई के रंग संसार में आ गया हूं। सुन्दरी बाई के घर पर श्री बजरंग बहादुर जी आ गये वे मुझे अपनी मोटरसाईकिल पर बिठाकर सोनाबाई जी के घर ले गये, कैमरे से मैं फोटोग्राफ खीचता तो वे जैसे सुरमयी दीखती। वहां से आत्माराम, भगत और फिर दिलबसिया और दिलभरन से मिला। वह यात्रा मेरे जीवन की एक अविस्मरणीय यात्रा बनी।

सोनाबाई भारत की उन महिलाओं में से एक हैं जिनका संसार दूसरों से कुछ अलग नहीं रहा था। सरगुजा अंचल में अंबिकापुर के समीप के केनरापारा गाँव में सात बहन-भाईयों के बीच एक भरे पूरे रजवार कृषक परिवार में जन्मी, पली-बढ़ी और १४ साल की उम्र मे ही सात किमी दूर के गांव पुहपुटरा में ब्याही गईं। बिना सास का ससुराल मिला। ससुराल में आते ही एक अनुशासित स्त्री का चरित निबाहना पढ़ा। पति होतीराम की खेती-बाड़ी में संलग्नता ने सोनाबाई को एकांतिकता और अतःकरण के विचारों के प्रकटीकरण के लिए गहन दृष्टि विकसित की। ऐसे समय उन्हें अपनी मां के वे बहुत सारे जीवन कर्म और धर्म के विविध पक्षों की याद आती और इस सतत् याद ने उनके कलामन में प्रकृति के विविध दृश्यांकन का विविध संसार व्यक्त होने की कोशिश करने लगा।

जातिगत परिवेश ने रजवार घर को एक नये नजरिये से देखा है और अंचल की स्त्रियां अपने दैनिक कर्म में आवास को स्वच्छ रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह उनका बचपन से देखा हुआ संसार और उसका अपना दैनिक कर्म है। लेकिन यह केवल जरूरत की आवासीय व्यवस्था तक सीमित है इसमें दीवारों को सुन्दर तरीकों से सजाना, भूमि को ज्यामितिक आकार देते हुए रेखांकित करना। और अधिकतम द्वार पर बंदनवार जैसी व्यवस्था कर सकना है।

सोनाबाई ने दीवारों की प्रकृति को बदला और उसकी जगह सुन्दर कलात्मक जालियों की परिकल्पना की उन्हें अपने बचपन से देखे हुए प्रकृति के विविध विस्तार वृक्ष, बेल, पत्ती बंदर, चिडिया, हिरण, और न जाने कितने अपने देखे दृश्यों से चित्रित किया। घर के हर कोने में किसी प्राणी या पक्षी को उसके हेतु स्थान बांटने में सोनाबाई के हृदय की विशालता को देखा जा सकता है। सोनाबाई ने बाहर की बहुत बड़ी दुनिया में ऐसा जो जो बचाये रखने के लायक है अपने इस घर के संसार में जैसे बचाकर रख लिया है। शायद वह भावना कुछ वैसी ही रही हो कि यह पृथ्वी वैसी ही बनी रहे जैसे हमें मिली थी और वैसी ही हमारी पीढ़ियों को उपलब्ध हो। यह तो वैदिक ऋषियों का विचार है।
सोनाबाई और  दरोगा रजवार , रजवार वाल पैन्टिन्ग 

तो अब सोनाबाई लगभग 52 साल की हो गई। गांव के लोग उन्हें स्थितप्रज्ञता में केन्द्रित देखते। उनके हाथों के शिल्पों का नर्तन, चेहरे की भाव-भंगिमा बरसस मोहती। ऐसे शिल्पों को जब उन्हें नाचते गाते झूमते पुतले बनाते और अपने घर में सजाते देखते तो कहते इससे घर मेें भूत-प्रेतों का वास हो जायेगा। इस भावना ने सोनाबाई की कला को पड़ोस की यात्रा भी नहीं करने दी। पर सोनाबाई अपने में रत रहीं।

भारत भवन बन रहा था 1982 का समय मध्यप्रदेश की कलाओं के लिए नई उम्मीद और विस्तार लेकर आया था भारत भवन में कलाओं का घर बनाया गया और इस घर के लिए सरगुजा की कला सामग्री के एकत्रीकरण दल ने पिल्खा पहाड़ की तराई में बसे पुहपुटरा  ग्राम की गलियों से गुजरते हुए सोनाबाई के घर का दरवाजा खटखटाया। घर के आंगन में घुसते ही कला विशेषज्ञों की आंखों चैधिया गई। इस क्षण से सोनाबाई के कला संसार की ख्याति पूरे देश और दुनिया को जाने वाली थी। गांव में हलचल हुई। सोनाबाई के हाथों के शिल्प दीवारों निकाले और भारत भवन की कलादीर्धा तक पहुंच देश के सामने आये। उन्हें सम्मान मिला, राष्ट्रीय सम्मान भी मिला।
सोनाबाई का घर, puhputra
सोनाबाई घर लौट आई फिर वही समय लौट आया। घर का कैनवास फिर सफेद हो गया था अपने शिल्पों की फिर-फिर याद जाने कब तक उन्हें उदास करती रही। सम्मान से मिला उत्साह जरूर मिला पर और शिल्पों के संसार का यों च्युत हो जाना उन्हें अखरता। वे फिर शिल्पों के निर्माण में जुट गई। अब उन्हें विदेशों से बुलावा आने लगा। देसी लोग आते भोपाल से दिल्ली से और विदेशी लोग आते देश के बाहर से। उन्होंने फिर अपना कला संसार रच लिया उसे रंग लिया।

गांव के लोग अब उन्हें बहुत सम्मान देने लगे। गांव के लोग देखते कि देश और विदेश से आये लोग कैसी-कैसी मीठी मीठी बातें करते, कैसे-कैसे वादे करते, और जाने कैसे कैसे प्रलोभन भी देते। अकसर सभी उन्हें देने के नाम से आते पर उनकी आखों में लेने का भाव किन्हीं कोने में छिपा अक्सर दिखता। इस तरह सोनाबाई अपना संसार और अपना समय सभी को बांटती रहीं। उन्हें किसी से कुछ ज्यादा चाहिए भी नहीं था। उसके पास अपना रचा जैसे सब कुछ था।

1983 में सोनाबाई को पहिले राष्ट्रीय सम्मान मिला और में प्रशस्तियां लिखी गई पढ़ी गई, सम्मान फलक और राशि दी गई। तीन साल पश्चात 1986 में मध्यप्रदेश शासन का तुलसी सम्मान मिला। सोनाबाई के सम्मान में प्रशस्तियां लिखी गईं और पढ़ी गई। चैमासा में डेढ़ दो पेज के आलेख लिखे गये और मध्यप्रदेश शासन ने सम्मान फलक दे राशि दी। अब वे शासकीय समारोहों की शोभा बन गई। उनके चेहरे की झुरियां उनके मर्म को दिखाती और कांपते हाथों का स्पर्श एक संदेश देता लगता। उन्हें शिल्प गुरू सम्मान और ने छत्तीसगढ़ राज्य में दाऊ मंदराजी सम्मान मिला। सोनाबाई अब भी शासकीय बुलावे पर वैसे ही शिल्प बनाने जातीं, वैसे ही काम करती, कभी धूप में, तो कभी गर्म हवा के थपेड़ों के बीच भी। बड़ा कलाकार होने के रंग-ढंग के प्रदर्शन से कोसों दूर थी। अब वे सरगुजा की कला की एक जरूरी कलाकार बन गईं थी। पर...
आत्माराम मानिकपुरी, रजवार चित्रांकक ,सरगुजा, छत्तीसगढ़ 

उनकी इस परम्परा को उनके अपने बेटे दरोगाराम रजवार और पुत्रवधु राजनबाई ने भी अपनाया। गांव के बुधराम कलाकर्म में सदैव उनके सतत् संगी रहे। पड़ौस पुहपुटरा में ही बचपन बिताने वाली सुन्दरीबाई जो सोनाबाई के शिल्पों को देख कलानवअंकुर जगाती रहीं। वे भी विवाहोपरान्त सोनाबाई के व्यक्त संसार और उनकी प्रसिद्ध से अभिभूत हो इस कला की दुनिया में आई और अपने मनमोहक काम से अपना नाम स्थापित किया उनके पुत्र-मानीलाल और पुत्रवधु बीवी बाई इसको परंपरा में दीक्षित किया। पास ही के ग्राम रनपुर कला की दिलबसिया यादव और उनके पति दिलभरन, पुत्र संतोष ने भी उनकी कला से नये प्रतिमान गढ़ना आरंभ किया। आसपास के ग्रामों के विविध घर इस कला वैविध्य से अपने घर को भी इस कला से सजाने लगे। ग्राम मेन्ड्रा के पास के उदयपुर ढ़ाब ग्राम के आत्माराम जो कभी बचपन में सोनाबाई से उनसे रूबरू हुए थे और तभी से इस कलाकर्म को अपनाया था आज रजवार कलात्मकता के विशिष्ट सृजनकर्मी हैं।  घसिया जाति की पार्वती बाई ने शिल्पों में महारत हासिल की ओर भगत ने जाली शिल्प को दीवारों पर अंकन करने में नाम कमाया है।

देश में सोनाबाई के नाम पर पहला सम्मान सुदूर समुद्र तक के किनारे पर स्थित केरल ललित कला अकादमी, केरल द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य के सरगुजा जिले की प्रसिध्द भित्ती चित्रकार स्वर्गीय श्रीमती सोना बाई रजवार के नाम पर सम्मान स्थापित किया है।  सरगुजा के कला विशेषज्ञ श्री बजरंग बहादुर सिंह ने इस कला को बनाये रखने के अनेक प्रयत्न किए थे। कलाकारों का उत्साहवर्धन और इस कला के बारे में सर्वेक्षण उनके जीवन का सार्थक कार्य था।

सोनाबाई के साथ श्री स्टीफन पी. ह्यूलर Stephen p.Huyler,

प्रसिद्ध अमेरिकी समाजशास्त्री और मानवविज्ञानी, फोटोग्राफर श्री स्टीफन पी. ह्यूलर (Stephen p.Huyler)जो पर्यटक के रूप में विविध कला सर्वेक्षण करते हैं। ह्यूलर ने एक किताब के लिए रिसर्च के दौरान भित्ति चित्र कला की प्रतिनिधि कलाकार और शिल्प गुरु सम्मान पा चुकी सोनाबाई की कला को पहचाना। वे 37 सालों से देशभर में यात्राएं कर रहे हैं। ने सोनाबाई के बारे में सुना तब वे 2007 के आसपास सरगुजा के इस छोटे से ग्राम पुहपुटरा चले आये। उन्होंने यहां कलाकारों के बीच रहकर सोनाबाई के जीवन पर विविध संकलन करना आरंभ किया। हजारों फोटो खींचते, अलग-अलग मौसमों के छायाकन, रजवार कला की विविध कलाकृतियों को निर्मित करवाकर उन्हें खरीदा और अब वे अमेरिका और अन्य यूरोप के देशों में रजवार कला कला प्रदशिर्नी के रूप में परिचित करा रहे हैं। उनकी बनाई डॉक्यूमेंट्री फिल्म डीवीडी में उपलब्ध है। 'सोनाबाई' शीर्षक के नाम से प्रकाशित किताब पूरे संसार को उपलब्ध है।
सोनाबाई पर किताब


(Stephen p.Huyler,) स्टीफन पी. ह्यूलर की पहल पर कैलीफोर्निया के सेन डियागो स्थित त्रिगेई इंटरनेशनल म्यूजियम में जुलाई 2009 से फरवरी 2010 तक छत्तीसगढ़ के रजवार भित्ति चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। यह प्रदर्शनी न्यूयार्क के दुग्गल विजुअल साल्यूशन के साथ मिलकर लगाई गई और वहां सोनाबाई के गांव से एकत्र तस्वीरों के अलावा इस कला पर बनी फिल्में भी प्रदर्शित की गईं। बताते हैं, इनकी लोकप्रियता को देखते हुए अमेरिका की अन्य जगहों पर भी प्रदर्शनी लगाई जाती रहेगी।

शंपा शाह लिखती हैं कि अभी चार-छः माह हुए पता चला कि सोनाबाई नहीं रही. दो वर्ष पूर्व जब मैं सरगुजा, उनके घर गई थी तो वे मुझे अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठी मिलीं थीं. बरसात के दिन थे, घर के बेटे-बहु बल्कि आसपास के सारे स्त्री-पुरुष खेतों में रोपा लगाने गए हुए थे. सोनाबाई, सामने फैले खेतों के विस्तार को देखती हुई चबूतरे पर प्रकृतिस्थ बैठी थीं- वैसे ही जैसे खेतों के उस पार पिल्खा पहाढ़ बैठा था.













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