शुक्रवार, 13 जून 2014

बसदेवा छत्तीसगढ़

बसदेवा कथा गायकों की सबसे बड़ी बस्ती चिरहुलडीह, रायपुर में हैं जहां लगभग 800 बसदेवा परिवारों का निवास हैं इनमें से लगभग 200 कथा गायकों ने अपनी कला परम्परा का निर्वाह करते हुए छत्तीसगढ़ को कथा, आख्यानों से लगातार गुंजित किया है।
छत्तीसगढ़ के निरगुनिया कबीर पदों के संकलन के लिए 1984 में रायपुर के आमापारा चैक पर चिरहुलडीह के निकट रहने वाले गायकों ने बताया था कि पास ही बसदेवा समुदाय के लोग रहते हैं। जो किसी समय कर्वधा से स्थानांतरित हुए थे और छत्तीसगढ़ अंचल में उनकी सबसे अधिक संख्या इसी चिरहुलडीह बस्ती में

है.. तब बात आई-गई हो गई थी।

बसदेवा कथा गायक
रायपुर में कला विमर्श 2014 के दौरान संस्कृति विभाग के नये मंत्री अजय चंद्राकर की उपस्थिति में प्रदेश के कलाकारों के अधिकारों की चर्चा के बीच मुझे चिरहुलडीह के असली कथा गायकों की याद आने लगी और एक ''मैं चिरहुलडीह में रह रहे बसदेवाओं के घरों की ओर चल पड़ा।

विजय चैक से दुर्ग की ओर जाने वाली सड़क पर जाते हुए आमापारा के आगे सब्जी बाजार से लगा हुआ रामकुंड मोहल्ला है। इसके आगे जाने पर चिरहुलडीह मोहल्ला दीखने लगता है। नये नवेले लोग इस नाम को लगभग नहीं जानते हैं पर कभी इसे बसदेवा पारा भी कहा जाता था। पुराने रिक्शे वाले ही इस मोहल्ले की स्थिति परिस्थिति को बता पाते हैं। सो उनसे ही पूछकर ही में वहां तक पहुंच पाया।

हीरोहांडा की ऐजेन्सी की बाजू की गली से जायें तो एक दूसरी ही दुनिया दीखने लगती है। गली के दायें तरफ की सपाट दीवार और बायें तरफ सांस लेता जीवन, छोटे-छोटे डिब्बेनुमा मकानों की तंग गलियां, गलियों के पतलेपन के आकारों में सिमटे दुबले-पतले बच्चों के खेलते-कूंदते नगें पावों की आहट और किलकारियों से गूंजता मोहल्ला लेकिन, आदमी के पसीने और सघन बसाहट से उपजी गंध शहर को इससे अलग करती महसूस होती है।

आगे जाने पर पीपल के विशाल वृक्ष के नीचे नये निर्मित  शीतला मंदिर दीखता है और उसके दूसरे बाजू पान की दुकान पर पूछने पर कि क्या यही बसदेवाओं की बस्ती है। वह कहता है कि हां ये जो सीमेन्ट गेट देख रहे हो यही है से है बसुदेव की बस्ती,

बसुदेव की बस्ती का द्वार अभी कुछ दस-पन्द्रह साल पुराना है सीमेंन्ट से निर्मित है। उस पर लिखा है "'जय मां काली मंदिर बसदेव पारा' मंदिर का पत्थर बताता है कि यह मंदिर 13 नवम्बर 1879 विक्रम संवत् 1936 माघ कार्तिक कृष्णपक्ष तिथि चतुर्दशी दिन गुरूवार को सिपाही लाल वासुदेव द्वारा प्रतिष्ठित किया गया था। बाद में 1997 में इसका जीर्णोद्वार किया गया। मंदिर में काली माता विराजित हैं। मंदिर में ही पीपल का पेड़ उगा है और शिव की पिंडी पूजित है।

बसदेवा स्थायी आवास वाले किन्तु भ्रमणशील चरित गायक हैं। भारतीय संस्कृति के आदर्श-उदात्त और नैतिक चरित्र बसदेव गायकी के आधार हैं। अत्यंत पिछडी दशा और अभावों में जीवने के बावजूद ये सदियों से अपनी गायकी के माध्यम से जनमानस को शिक्षित और संस्कारित करते रहे हैं। जीवन के उदात्त मूल्यों की रक्षा के साथ उनका पोषण और संर्वधन करते रहे हैं। आज बदली हुई परिस्थिति में भी ये ऋतु चक्र के साथ अपने निश्चित पारंपरिक जीवन कर्म में रत हैं। अपने एकमात्र गायन कम्र के प्रति ये शंका और पुनरावलोकन के दौर से गुजर रहे हैं बावजूद इसके अधिसंख्य बसदेव स्वयं के काम के प्रति अटूट विश्वास और गहन आस्था के कारण सामाजिक सरोकार का निर्वाह कर रहे हैं।

'हरबोले' और 'जय गंगान' बसदेवा गायकी की टेक से लिए गये शब्द हैं इन टेकों को गायकी में इस्तेमाल के कारण बसदेवों को हरबोले ओर जय गंगान के नाम से अभिहित किया जाता है। भटरी, भाटगिरी से बना है और बाभन कर्मगत विशेषण हैं। बसुदेव के भजन कीर्तन करने वाले लोग बसदेवा कहलाये किन्तु वे बसदेवा जो श्रवण कुमार की गाथायें गाते हैं। वे बसदेवा के अंतर्गत श्रावणी ब्राम्हण कहलाते हैं।
रामकुंड तालाब

बसदेवा गंगा नदी के किनारों के पुरातन निवासी रहे हैं। वैदिक काल में यज्ञ में के विविध अनुष्ठानों के बीच बीच आख्यानों की परम्परा थी। लगभग 36 आख्यान तो गाये ही जाते थे। इस तरह राजस्थान से चली लोककथाओं, गाथाओं की धारा पूरे गंगा क्षेत्र में फैली। प्रदेश में फैली महामारी के भंयकर रूप से प्रत्येक जाति के लोगों ने पलायन किया और इसीलिए बसदेवा बधेलखण्ड की भूमि पर प्रवेश करते हुए गोंडवाना की धरती पर अपनी गाथाओं को गंुजाने लगे। पश्चात भौरमदेव की छाया में लम्बे समय तक पीढ़ियों का सरंक्षण हुआ। रायपुर के क्षेत्र की धार्मिक भाव प्रवण जनता के आदरभाव से प्रभावित होकर कर्वधा से बसदेवाओं के समूह रायपुर के रामकुंड तालाब के पास एकत्र हुए और यहीं का आवास उन्हें भाया आखिर रामकुंड तालाब के पास के विविध धार्मिक स्थल में पंचेश्वर महादेव मंदिर, गोरखनाथ महादेव, औघड़नाथ महादेव तथा भूतनाथ महादेव मंदिर के मंदिरों में गूंजती भक्ति धारा ने बसदेवाओं के लिए एक आदर्श स्थान सिद्ध किया और वे स्थायी रूप से यही बस कर छत्तीसगढ़ के सुदूर ग्रामों तक अपने यजमान खोजने लगे और परिवेश को संगीत और आख्यानों से सत्यालोक से परिचित कराने लगे।

पंचेश्वर महादेव, रामकुंड
पान की दुकान पर ही बजरंग से मुलाकात होती है वे मंदिर तक मुझे ले आते हैं। मैं कैमरा से चित्र लेता हूं तब तक बस्ती के कुछ लोग आ मदिर के पटिये पर जमा हो जाते हैं। मजमा लग जाता है मैं बैग से कापी-पेन निकाल उनसे चर्चा करने लगता हूं।

बजरंग प्रसाद वासुदेव बताते हैं कि हम लगभग 200 साल से इस बस्ती में रहते हैं हमारे पूर्वज भी कर्वधा  से यहां स्थानातरित हो यहां पहुंचे थे। तब यहां बस रामकुंड तालाब था जिसके चारों ओर आम के विशाल वृक्ष थे वह आमापारा भी कहलाने लगा था। तब यहां से रेल्वे की लाईन देखी जा सकती थी। अब यहां लगभग 800 परिवार रहते हैं। हर घर में लोग अधिक हो गये। जगह की कमी हो गई है। कुछ परिवार चंगोरा भाट रहने चले गये। छत्तीसगढ़ में उनकी जानकारी में पिथौरा, चैरेंगा, मुसुआ में, बछेरा, नवागांव, अकलतरा, धमतरी, कांकेर में कुछ अशतः सरगुजा के अंबिकापुर में में केदारपुर के पास इनकी बस्ती है। कुछ बसदेवा बस्तर में भी हैं। मलाजखंड के पौनी, महाराष्ट्र के वर्धा में भी वासुदेवाओं की बस्ती बसी है।

बसदेवाओं का मुख्य कर्म गायकी है और अशतः व्यवसाय । गायकी के सिलसिल में वे अपने स्थायी आवासों से चार मास के लिए बाहर निकलते हैं और दूर-दूर के नगर ग्रामों की यात्रा करते हैं। अपने जाने पहचाने जजमानों को भूलते नहीं ओर दान की अनूठी परम्परा के सम्बंध को पुनः पुनः दोहरा कर उस सत्य की प्रतीति के बदले अपने दान की महिमा का भी बखान करते हैं। आख्यान की परम्परा व्यक्ति को जीवन के मोक्ष के उन प्रतिमानों की बारंबार याद दिलाती और उस वैराग्य तक ले जाती जब उसके सामने धन-सम्पदा की व्यर्थता का बोध होता। उपजी भावना धर्म और दान के कर्म की ओर उत्साह भरती आकृष्ट करती।
छत्तीसगढ़ की धरती पर स्थायी रूप से बसने का कारण यह था कि मान-सम्मान और दान अन्य जगहों के बनिस्पत अधिक प्राप्त होता है। बसदेवाओं को अधिक सम्मान प्राप्त हआ। साथ ही दान के रूप बर्तन, गहन, कपडे, अन्न और कभी कभी जमीन भी प्राप्त हुई है। बसदेवाओं के लिए छतीसगढ़ का लोक मानस इतना अनुकूल लगता है कि उन्हें अपने कलाकर्म और धर्मकर्म की सार्थकता पूर्ण होती लगती है।

बल्देव वासुदेव कहने लगते हैं कि हम रामअवतारी, कृष्ण अवतारी, सरमन की कथा, हरिश्चन्द्र की कथा, मोरध्वज की कथा, भरथरी कथा, सती अनुसुईया कथा, शिव विवाह की कथायें गाते है। बीच में याद कर कहते हैं कि 25 साल पहिले रायपुर के किन्हीं द्वारिका नाथ ने भगवान कृष्ण, सरमन और मोरध्वज की कथाओं का उनके गायन से ध्वनि संकलन किया था। और फिर याद करते कहते हैं कि कोई और भी हमारे बारे में जानकारी लेने के लिए आये थे। शायद भोपाल से ही...फिर वे कभी वापस नहीं मिल सके...

वासुदेव कलाकार गाई जाने वाली गाथाओं को उनकी मूल बोली शब्दों में गाते और उसके परिवेश को भी जीते पर छत्तीसगढ़ की जमीन पर रहते हुए यहां के परिवेश की समझ ओर अपने यजमानों के भाषाई व्यवहार को सीख-समझ गये। एक समय जो लोक नाट्य नाचा का था। नाचा जब इस अंचल में जादू विखेर रहा था तो उस के ताने-बाने ने इन बसदेवा कलाकारों के मन को भी आकृष्ट किया। र्फुसत के समय में आत्मप्रेरणा से इस बस्ती में नाचा की गूंज भी गुंजित होने लगी। बस्ती के वासुदेव कलाकारों ने नाचा से प्रभावित होकर एक मंडली भी बनाई थी और नाम रखा था ‘वासुदेव नाच पार्टी, रामकुंड’ उसमें बल्देव वासुदेव, मानसिंग वासुदेव, मुन्ना वसुदेव, रामादीन वासुदेव, भागीरथी वासुदेव, भगतराम वासुदेव, गिरधर वासुदेव, प्रमुख थे। परी की भूमिका मुन्ना वासुदेव निबाहते, नर्तक रामाधीन वासुदेव, पूरी मंडली ने पहली प्रस्तुति आपने ही मोहल्ले के जन्माष्टमी के आयोजन पर की। इसके प्रदर्शन के बाद यूनिवर्सिटी में, महाराष्ट्र मंडल में, रामकुंड के लावारिन में, ईदगाह भाटा में, शताक्षी मंदिर के पास, सेमरिया और टाटीबंध में इसके प्रदर्शन किए।

अब वासुदेव नवयुवक गाथाओं के पारंपरिक गायन-वादन और चर्या से सरोकार स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। विविध दैनिक व्यवसाय में संलग्नाता उन्हें इस परंपरा से एक दूरी पैदा करती है। उनके मन में आदर्श सत्य और ज्ञान के पीछे पाया धन एक भिक्षुक के पाये धन का अहसास कराता है।

1980 के बाद पुराने मध्यप्रदेश में हुई कला गतिविधियों में इस बसदेवा पारा का सर्वेक्षण तो हुआ पर किसी भी कलाकार या समूह का नाम न प्रदीप्त हुआ और न कोई सम्मान, शासन ने इस गायक समुदाय के कला संरक्षण लिए कोई ऐसी योजना बनाने में दिलचस्पी भी नहीं ली कि यह परम्परा, परम्परागत रहे। नये छत्तीसगढ़ के अब तक 14 साल बीतने पर यह दूरी और बसदेवाओं का अज्ञातवास पूर्ववत है।

नवयुवकों ने वासुदेव युवा कल्याण समिति बनाई है उसे 2 साल काम करते हो गया है। गनेश, देव, कुलदीप, उमाशंकर, हरिओम वासुदेव युवा शक्ति हैं वे अपने समाज के लिए कुछ आगे करना चाहते हैं अपने भौतिक विकास और परम्परा की अक्षणुता पर पर लक्ष्य क्या हो इस बारे में प्रयासरत हैं।


बसदेवा छत्तीसगढ़ की कथा गायकी और लोक मानस के धार्मिक भावाभिव्यक्ति के सतत् उत्प्रेरक हैं। प्रदेश इनके परम्परागत कथा गायन से सदैव संस्कारित हुआ है। संस्कृति के दृश्यांकित रहने के आधारभूत कायों में बसदेवाओं की संलग्नता छतीसग़ढ़ को विशेष बनाती है। छतीसगढ़ का लोक मानस इस समुदाय के गायन कर्म के प्रति सम्मान की दृष्टि रखता है।

आगत


छत्तीसगढ़ के निवासी रहे नवल शुक्ल-चैमासा लेख से कुछ मार्गदर्शन तथा सामग्री ली है और हां जब 9 दिसम्बर 2012 का आरंभ-में संजीव तिवारी का लेख देखा तो लिखने का मन भी बना, इन दौनों सज्जनों का हृदय से आभारी हूं।

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