सोमवार, 30 जून 2014

सोनाबाई रजवार


सोनाबाई रजवार, छत्तीसगढ़
सोनाबाई, जी हां भारत की बेटी के तौर सोनाबाई की कला का जादू पूरे विश्व में अपने शीर्ष पर आया है। दरअसल सोनाबाई ने अपने घर के आंगन और गांव के चबूतरे पर बैठ अपने चिंतन से उस चित्रांकन को आकार दिया जो शून्य की समाधि से उतर कर आया ऋषि का मन व्यक्त करता है। अभिव्यिक्ति और चेतना के जाने किस पटल पर देखे चित्रों को सोनाबाई ने भौतिक दुनिया पर उतारा, यह देखना जो है और उस देखे हुए को दिखाने की कला में सोनाबाई ने जो महारथ हासिल की है उसके चलते वे भारत की सच्ची बेटी के रूप में आज प्रतिष्ठित हुई हैं।
आगत agat

सोनाबाई के मेरा संबंध दृश्य और दृष्टा का है। 2003 में सरगुजा के इन कलाग्रामों में चला आया था। पहिले कभी 1992 में भी आदिवासी लोक कला परिषद् के काम से पुहपुटरा आना हुआ था पर वह यात्रा सरकारी थी। परिषद् कभी किसी प्रदर्शनी या स्टेज के सौन्दर्य के लिए उन्हें आमंत्रित करती। तो 2003 में ग्राम मेन्ड्रा के पास उतर में सुन्दरी बाई के घर की ओर पैदल ही चल पढ़ा, रास्ते में मिट्टी के अलग अलग रंग देखे तभी लगने लगा कि सोनाबाई के रंग संसार में आ गया हूं। सुन्दरी बाई के घर पर श्री बजरंग बहादुर जी आ गये वे मुझे अपनी मोटरसाईकिल पर बिठाकर सोनाबाई जी के घर ले गये, कैमरे से मैं फोटोग्राफ खीचता तो वे जैसे सुरमयी दीखती। वहां से आत्माराम, भगत और फिर दिलबसिया और दिलभरन से मिला। वह यात्रा मेरे जीवन की एक अविस्मरणीय यात्रा बनी।

सोनाबाई भारत की उन महिलाओं में से एक हैं जिनका संसार दूसरों से कुछ अलग नहीं रहा था। सरगुजा अंचल में अंबिकापुर के समीप के केनरापारा गाँव में सात बहन-भाईयों के बीच एक भरे पूरे रजवार कृषक परिवार में जन्मी, पली-बढ़ी और १४ साल की उम्र मे ही सात किमी दूर के गांव पुहपुटरा में ब्याही गईं। बिना सास का ससुराल मिला। ससुराल में आते ही एक अनुशासित स्त्री का चरित निबाहना पढ़ा। पति होतीराम की खेती-बाड़ी में संलग्नता ने सोनाबाई को एकांतिकता और अतःकरण के विचारों के प्रकटीकरण के लिए गहन दृष्टि विकसित की। ऐसे समय उन्हें अपनी मां के वे बहुत सारे जीवन कर्म और धर्म के विविध पक्षों की याद आती और इस सतत् याद ने उनके कलामन में प्रकृति के विविध दृश्यांकन का विविध संसार व्यक्त होने की कोशिश करने लगा।

जातिगत परिवेश ने रजवार घर को एक नये नजरिये से देखा है और अंचल की स्त्रियां अपने दैनिक कर्म में आवास को स्वच्छ रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह उनका बचपन से देखा हुआ संसार और उसका अपना दैनिक कर्म है। लेकिन यह केवल जरूरत की आवासीय व्यवस्था तक सीमित है इसमें दीवारों को सुन्दर तरीकों से सजाना, भूमि को ज्यामितिक आकार देते हुए रेखांकित करना। और अधिकतम द्वार पर बंदनवार जैसी व्यवस्था कर सकना है।

सोनाबाई ने दीवारों की प्रकृति को बदला और उसकी जगह सुन्दर कलात्मक जालियों की परिकल्पना की उन्हें अपने बचपन से देखे हुए प्रकृति के विविध विस्तार वृक्ष, बेल, पत्ती बंदर, चिडिया, हिरण, और न जाने कितने अपने देखे दृश्यों से चित्रित किया। घर के हर कोने में किसी प्राणी या पक्षी को उसके हेतु स्थान बांटने में सोनाबाई के हृदय की विशालता को देखा जा सकता है। सोनाबाई ने बाहर की बहुत बड़ी दुनिया में ऐसा जो जो बचाये रखने के लायक है अपने इस घर के संसार में जैसे बचाकर रख लिया है। शायद वह भावना कुछ वैसी ही रही हो कि यह पृथ्वी वैसी ही बनी रहे जैसे हमें मिली थी और वैसी ही हमारी पीढ़ियों को उपलब्ध हो। यह तो वैदिक ऋषियों का विचार है।
सोनाबाई और  दरोगा रजवार , रजवार वाल पैन्टिन्ग 

तो अब सोनाबाई लगभग 52 साल की हो गई। गांव के लोग उन्हें स्थितप्रज्ञता में केन्द्रित देखते। उनके हाथों के शिल्पों का नर्तन, चेहरे की भाव-भंगिमा बरसस मोहती। ऐसे शिल्पों को जब उन्हें नाचते गाते झूमते पुतले बनाते और अपने घर में सजाते देखते तो कहते इससे घर मेें भूत-प्रेतों का वास हो जायेगा। इस भावना ने सोनाबाई की कला को पड़ोस की यात्रा भी नहीं करने दी। पर सोनाबाई अपने में रत रहीं।

भारत भवन बन रहा था 1982 का समय मध्यप्रदेश की कलाओं के लिए नई उम्मीद और विस्तार लेकर आया था भारत भवन में कलाओं का घर बनाया गया और इस घर के लिए सरगुजा की कला सामग्री के एकत्रीकरण दल ने पिल्खा पहाड़ की तराई में बसे पुहपुटरा  ग्राम की गलियों से गुजरते हुए सोनाबाई के घर का दरवाजा खटखटाया। घर के आंगन में घुसते ही कला विशेषज्ञों की आंखों चैधिया गई। इस क्षण से सोनाबाई के कला संसार की ख्याति पूरे देश और दुनिया को जाने वाली थी। गांव में हलचल हुई। सोनाबाई के हाथों के शिल्प दीवारों निकाले और भारत भवन की कलादीर्धा तक पहुंच देश के सामने आये। उन्हें सम्मान मिला, राष्ट्रीय सम्मान भी मिला।
सोनाबाई का घर, puhputra
सोनाबाई घर लौट आई फिर वही समय लौट आया। घर का कैनवास फिर सफेद हो गया था अपने शिल्पों की फिर-फिर याद जाने कब तक उन्हें उदास करती रही। सम्मान से मिला उत्साह जरूर मिला पर और शिल्पों के संसार का यों च्युत हो जाना उन्हें अखरता। वे फिर शिल्पों के निर्माण में जुट गई। अब उन्हें विदेशों से बुलावा आने लगा। देसी लोग आते भोपाल से दिल्ली से और विदेशी लोग आते देश के बाहर से। उन्होंने फिर अपना कला संसार रच लिया उसे रंग लिया।

गांव के लोग अब उन्हें बहुत सम्मान देने लगे। गांव के लोग देखते कि देश और विदेश से आये लोग कैसी-कैसी मीठी मीठी बातें करते, कैसे-कैसे वादे करते, और जाने कैसे कैसे प्रलोभन भी देते। अकसर सभी उन्हें देने के नाम से आते पर उनकी आखों में लेने का भाव किन्हीं कोने में छिपा अक्सर दिखता। इस तरह सोनाबाई अपना संसार और अपना समय सभी को बांटती रहीं। उन्हें किसी से कुछ ज्यादा चाहिए भी नहीं था। उसके पास अपना रचा जैसे सब कुछ था।

1983 में सोनाबाई को पहिले राष्ट्रीय सम्मान मिला और में प्रशस्तियां लिखी गई पढ़ी गई, सम्मान फलक और राशि दी गई। तीन साल पश्चात 1986 में मध्यप्रदेश शासन का तुलसी सम्मान मिला। सोनाबाई के सम्मान में प्रशस्तियां लिखी गईं और पढ़ी गई। चैमासा में डेढ़ दो पेज के आलेख लिखे गये और मध्यप्रदेश शासन ने सम्मान फलक दे राशि दी। अब वे शासकीय समारोहों की शोभा बन गई। उनके चेहरे की झुरियां उनके मर्म को दिखाती और कांपते हाथों का स्पर्श एक संदेश देता लगता। उन्हें शिल्प गुरू सम्मान और ने छत्तीसगढ़ राज्य में दाऊ मंदराजी सम्मान मिला। सोनाबाई अब भी शासकीय बुलावे पर वैसे ही शिल्प बनाने जातीं, वैसे ही काम करती, कभी धूप में, तो कभी गर्म हवा के थपेड़ों के बीच भी। बड़ा कलाकार होने के रंग-ढंग के प्रदर्शन से कोसों दूर थी। अब वे सरगुजा की कला की एक जरूरी कलाकार बन गईं थी। पर...
आत्माराम मानिकपुरी, रजवार चित्रांकक ,सरगुजा, छत्तीसगढ़ 

उनकी इस परम्परा को उनके अपने बेटे दरोगाराम रजवार और पुत्रवधु राजनबाई ने भी अपनाया। गांव के बुधराम कलाकर्म में सदैव उनके सतत् संगी रहे। पड़ौस पुहपुटरा में ही बचपन बिताने वाली सुन्दरीबाई जो सोनाबाई के शिल्पों को देख कलानवअंकुर जगाती रहीं। वे भी विवाहोपरान्त सोनाबाई के व्यक्त संसार और उनकी प्रसिद्ध से अभिभूत हो इस कला की दुनिया में आई और अपने मनमोहक काम से अपना नाम स्थापित किया उनके पुत्र-मानीलाल और पुत्रवधु बीवी बाई इसको परंपरा में दीक्षित किया। पास ही के ग्राम रनपुर कला की दिलबसिया यादव और उनके पति दिलभरन, पुत्र संतोष ने भी उनकी कला से नये प्रतिमान गढ़ना आरंभ किया। आसपास के ग्रामों के विविध घर इस कला वैविध्य से अपने घर को भी इस कला से सजाने लगे। ग्राम मेन्ड्रा के पास के उदयपुर ढ़ाब ग्राम के आत्माराम जो कभी बचपन में सोनाबाई से उनसे रूबरू हुए थे और तभी से इस कलाकर्म को अपनाया था आज रजवार कलात्मकता के विशिष्ट सृजनकर्मी हैं।  घसिया जाति की पार्वती बाई ने शिल्पों में महारत हासिल की ओर भगत ने जाली शिल्प को दीवारों पर अंकन करने में नाम कमाया है।

देश में सोनाबाई के नाम पर पहला सम्मान सुदूर समुद्र तक के किनारे पर स्थित केरल ललित कला अकादमी, केरल द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य के सरगुजा जिले की प्रसिध्द भित्ती चित्रकार स्वर्गीय श्रीमती सोना बाई रजवार के नाम पर सम्मान स्थापित किया है।  सरगुजा के कला विशेषज्ञ श्री बजरंग बहादुर सिंह ने इस कला को बनाये रखने के अनेक प्रयत्न किए थे। कलाकारों का उत्साहवर्धन और इस कला के बारे में सर्वेक्षण उनके जीवन का सार्थक कार्य था।

सोनाबाई के साथ श्री स्टीफन पी. ह्यूलर Stephen p.Huyler,

प्रसिद्ध अमेरिकी समाजशास्त्री और मानवविज्ञानी, फोटोग्राफर श्री स्टीफन पी. ह्यूलर (Stephen p.Huyler)जो पर्यटक के रूप में विविध कला सर्वेक्षण करते हैं। ह्यूलर ने एक किताब के लिए रिसर्च के दौरान भित्ति चित्र कला की प्रतिनिधि कलाकार और शिल्प गुरु सम्मान पा चुकी सोनाबाई की कला को पहचाना। वे 37 सालों से देशभर में यात्राएं कर रहे हैं। ने सोनाबाई के बारे में सुना तब वे 2007 के आसपास सरगुजा के इस छोटे से ग्राम पुहपुटरा चले आये। उन्होंने यहां कलाकारों के बीच रहकर सोनाबाई के जीवन पर विविध संकलन करना आरंभ किया। हजारों फोटो खींचते, अलग-अलग मौसमों के छायाकन, रजवार कला की विविध कलाकृतियों को निर्मित करवाकर उन्हें खरीदा और अब वे अमेरिका और अन्य यूरोप के देशों में रजवार कला कला प्रदशिर्नी के रूप में परिचित करा रहे हैं। उनकी बनाई डॉक्यूमेंट्री फिल्म डीवीडी में उपलब्ध है। 'सोनाबाई' शीर्षक के नाम से प्रकाशित किताब पूरे संसार को उपलब्ध है।
सोनाबाई पर किताब


(Stephen p.Huyler,) स्टीफन पी. ह्यूलर की पहल पर कैलीफोर्निया के सेन डियागो स्थित त्रिगेई इंटरनेशनल म्यूजियम में जुलाई 2009 से फरवरी 2010 तक छत्तीसगढ़ के रजवार भित्ति चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। यह प्रदर्शनी न्यूयार्क के दुग्गल विजुअल साल्यूशन के साथ मिलकर लगाई गई और वहां सोनाबाई के गांव से एकत्र तस्वीरों के अलावा इस कला पर बनी फिल्में भी प्रदर्शित की गईं। बताते हैं, इनकी लोकप्रियता को देखते हुए अमेरिका की अन्य जगहों पर भी प्रदर्शनी लगाई जाती रहेगी।

शंपा शाह लिखती हैं कि अभी चार-छः माह हुए पता चला कि सोनाबाई नहीं रही. दो वर्ष पूर्व जब मैं सरगुजा, उनके घर गई थी तो वे मुझे अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठी मिलीं थीं. बरसात के दिन थे, घर के बेटे-बहु बल्कि आसपास के सारे स्त्री-पुरुष खेतों में रोपा लगाने गए हुए थे. सोनाबाई, सामने फैले खेतों के विस्तार को देखती हुई चबूतरे पर प्रकृतिस्थ बैठी थीं- वैसे ही जैसे खेतों के उस पार पिल्खा पहाढ़ बैठा था.













शुक्रवार, 13 जून 2014

बसदेवा छत्तीसगढ़

बसदेवा कथा गायकों की सबसे बड़ी बस्ती चिरहुलडीह, रायपुर में हैं जहां लगभग 800 बसदेवा परिवारों का निवास हैं इनमें से लगभग 200 कथा गायकों ने अपनी कला परम्परा का निर्वाह करते हुए छत्तीसगढ़ को कथा, आख्यानों से लगातार गुंजित किया है।
छत्तीसगढ़ के निरगुनिया कबीर पदों के संकलन के लिए 1984 में रायपुर के आमापारा चैक पर चिरहुलडीह के निकट रहने वाले गायकों ने बताया था कि पास ही बसदेवा समुदाय के लोग रहते हैं। जो किसी समय कर्वधा से स्थानांतरित हुए थे और छत्तीसगढ़ अंचल में उनकी सबसे अधिक संख्या इसी चिरहुलडीह बस्ती में

है.. तब बात आई-गई हो गई थी।

बसदेवा कथा गायक
रायपुर में कला विमर्श 2014 के दौरान संस्कृति विभाग के नये मंत्री अजय चंद्राकर की उपस्थिति में प्रदेश के कलाकारों के अधिकारों की चर्चा के बीच मुझे चिरहुलडीह के असली कथा गायकों की याद आने लगी और एक ''मैं चिरहुलडीह में रह रहे बसदेवाओं के घरों की ओर चल पड़ा।

विजय चैक से दुर्ग की ओर जाने वाली सड़क पर जाते हुए आमापारा के आगे सब्जी बाजार से लगा हुआ रामकुंड मोहल्ला है। इसके आगे जाने पर चिरहुलडीह मोहल्ला दीखने लगता है। नये नवेले लोग इस नाम को लगभग नहीं जानते हैं पर कभी इसे बसदेवा पारा भी कहा जाता था। पुराने रिक्शे वाले ही इस मोहल्ले की स्थिति परिस्थिति को बता पाते हैं। सो उनसे ही पूछकर ही में वहां तक पहुंच पाया।

हीरोहांडा की ऐजेन्सी की बाजू की गली से जायें तो एक दूसरी ही दुनिया दीखने लगती है। गली के दायें तरफ की सपाट दीवार और बायें तरफ सांस लेता जीवन, छोटे-छोटे डिब्बेनुमा मकानों की तंग गलियां, गलियों के पतलेपन के आकारों में सिमटे दुबले-पतले बच्चों के खेलते-कूंदते नगें पावों की आहट और किलकारियों से गूंजता मोहल्ला लेकिन, आदमी के पसीने और सघन बसाहट से उपजी गंध शहर को इससे अलग करती महसूस होती है।

आगे जाने पर पीपल के विशाल वृक्ष के नीचे नये निर्मित  शीतला मंदिर दीखता है और उसके दूसरे बाजू पान की दुकान पर पूछने पर कि क्या यही बसदेवाओं की बस्ती है। वह कहता है कि हां ये जो सीमेन्ट गेट देख रहे हो यही है से है बसुदेव की बस्ती,

बसुदेव की बस्ती का द्वार अभी कुछ दस-पन्द्रह साल पुराना है सीमेंन्ट से निर्मित है। उस पर लिखा है "'जय मां काली मंदिर बसदेव पारा' मंदिर का पत्थर बताता है कि यह मंदिर 13 नवम्बर 1879 विक्रम संवत् 1936 माघ कार्तिक कृष्णपक्ष तिथि चतुर्दशी दिन गुरूवार को सिपाही लाल वासुदेव द्वारा प्रतिष्ठित किया गया था। बाद में 1997 में इसका जीर्णोद्वार किया गया। मंदिर में काली माता विराजित हैं। मंदिर में ही पीपल का पेड़ उगा है और शिव की पिंडी पूजित है।

बसदेवा स्थायी आवास वाले किन्तु भ्रमणशील चरित गायक हैं। भारतीय संस्कृति के आदर्श-उदात्त और नैतिक चरित्र बसदेव गायकी के आधार हैं। अत्यंत पिछडी दशा और अभावों में जीवने के बावजूद ये सदियों से अपनी गायकी के माध्यम से जनमानस को शिक्षित और संस्कारित करते रहे हैं। जीवन के उदात्त मूल्यों की रक्षा के साथ उनका पोषण और संर्वधन करते रहे हैं। आज बदली हुई परिस्थिति में भी ये ऋतु चक्र के साथ अपने निश्चित पारंपरिक जीवन कर्म में रत हैं। अपने एकमात्र गायन कम्र के प्रति ये शंका और पुनरावलोकन के दौर से गुजर रहे हैं बावजूद इसके अधिसंख्य बसदेव स्वयं के काम के प्रति अटूट विश्वास और गहन आस्था के कारण सामाजिक सरोकार का निर्वाह कर रहे हैं।

'हरबोले' और 'जय गंगान' बसदेवा गायकी की टेक से लिए गये शब्द हैं इन टेकों को गायकी में इस्तेमाल के कारण बसदेवों को हरबोले ओर जय गंगान के नाम से अभिहित किया जाता है। भटरी, भाटगिरी से बना है और बाभन कर्मगत विशेषण हैं। बसुदेव के भजन कीर्तन करने वाले लोग बसदेवा कहलाये किन्तु वे बसदेवा जो श्रवण कुमार की गाथायें गाते हैं। वे बसदेवा के अंतर्गत श्रावणी ब्राम्हण कहलाते हैं।
रामकुंड तालाब

बसदेवा गंगा नदी के किनारों के पुरातन निवासी रहे हैं। वैदिक काल में यज्ञ में के विविध अनुष्ठानों के बीच बीच आख्यानों की परम्परा थी। लगभग 36 आख्यान तो गाये ही जाते थे। इस तरह राजस्थान से चली लोककथाओं, गाथाओं की धारा पूरे गंगा क्षेत्र में फैली। प्रदेश में फैली महामारी के भंयकर रूप से प्रत्येक जाति के लोगों ने पलायन किया और इसीलिए बसदेवा बधेलखण्ड की भूमि पर प्रवेश करते हुए गोंडवाना की धरती पर अपनी गाथाओं को गंुजाने लगे। पश्चात भौरमदेव की छाया में लम्बे समय तक पीढ़ियों का सरंक्षण हुआ। रायपुर के क्षेत्र की धार्मिक भाव प्रवण जनता के आदरभाव से प्रभावित होकर कर्वधा से बसदेवाओं के समूह रायपुर के रामकुंड तालाब के पास एकत्र हुए और यहीं का आवास उन्हें भाया आखिर रामकुंड तालाब के पास के विविध धार्मिक स्थल में पंचेश्वर महादेव मंदिर, गोरखनाथ महादेव, औघड़नाथ महादेव तथा भूतनाथ महादेव मंदिर के मंदिरों में गूंजती भक्ति धारा ने बसदेवाओं के लिए एक आदर्श स्थान सिद्ध किया और वे स्थायी रूप से यही बस कर छत्तीसगढ़ के सुदूर ग्रामों तक अपने यजमान खोजने लगे और परिवेश को संगीत और आख्यानों से सत्यालोक से परिचित कराने लगे।

पंचेश्वर महादेव, रामकुंड
पान की दुकान पर ही बजरंग से मुलाकात होती है वे मंदिर तक मुझे ले आते हैं। मैं कैमरा से चित्र लेता हूं तब तक बस्ती के कुछ लोग आ मदिर के पटिये पर जमा हो जाते हैं। मजमा लग जाता है मैं बैग से कापी-पेन निकाल उनसे चर्चा करने लगता हूं।

बजरंग प्रसाद वासुदेव बताते हैं कि हम लगभग 200 साल से इस बस्ती में रहते हैं हमारे पूर्वज भी कर्वधा  से यहां स्थानातरित हो यहां पहुंचे थे। तब यहां बस रामकुंड तालाब था जिसके चारों ओर आम के विशाल वृक्ष थे वह आमापारा भी कहलाने लगा था। तब यहां से रेल्वे की लाईन देखी जा सकती थी। अब यहां लगभग 800 परिवार रहते हैं। हर घर में लोग अधिक हो गये। जगह की कमी हो गई है। कुछ परिवार चंगोरा भाट रहने चले गये। छत्तीसगढ़ में उनकी जानकारी में पिथौरा, चैरेंगा, मुसुआ में, बछेरा, नवागांव, अकलतरा, धमतरी, कांकेर में कुछ अशतः सरगुजा के अंबिकापुर में में केदारपुर के पास इनकी बस्ती है। कुछ बसदेवा बस्तर में भी हैं। मलाजखंड के पौनी, महाराष्ट्र के वर्धा में भी वासुदेवाओं की बस्ती बसी है।

बसदेवाओं का मुख्य कर्म गायकी है और अशतः व्यवसाय । गायकी के सिलसिल में वे अपने स्थायी आवासों से चार मास के लिए बाहर निकलते हैं और दूर-दूर के नगर ग्रामों की यात्रा करते हैं। अपने जाने पहचाने जजमानों को भूलते नहीं ओर दान की अनूठी परम्परा के सम्बंध को पुनः पुनः दोहरा कर उस सत्य की प्रतीति के बदले अपने दान की महिमा का भी बखान करते हैं। आख्यान की परम्परा व्यक्ति को जीवन के मोक्ष के उन प्रतिमानों की बारंबार याद दिलाती और उस वैराग्य तक ले जाती जब उसके सामने धन-सम्पदा की व्यर्थता का बोध होता। उपजी भावना धर्म और दान के कर्म की ओर उत्साह भरती आकृष्ट करती।
छत्तीसगढ़ की धरती पर स्थायी रूप से बसने का कारण यह था कि मान-सम्मान और दान अन्य जगहों के बनिस्पत अधिक प्राप्त होता है। बसदेवाओं को अधिक सम्मान प्राप्त हआ। साथ ही दान के रूप बर्तन, गहन, कपडे, अन्न और कभी कभी जमीन भी प्राप्त हुई है। बसदेवाओं के लिए छतीसगढ़ का लोक मानस इतना अनुकूल लगता है कि उन्हें अपने कलाकर्म और धर्मकर्म की सार्थकता पूर्ण होती लगती है।

बल्देव वासुदेव कहने लगते हैं कि हम रामअवतारी, कृष्ण अवतारी, सरमन की कथा, हरिश्चन्द्र की कथा, मोरध्वज की कथा, भरथरी कथा, सती अनुसुईया कथा, शिव विवाह की कथायें गाते है। बीच में याद कर कहते हैं कि 25 साल पहिले रायपुर के किन्हीं द्वारिका नाथ ने भगवान कृष्ण, सरमन और मोरध्वज की कथाओं का उनके गायन से ध्वनि संकलन किया था। और फिर याद करते कहते हैं कि कोई और भी हमारे बारे में जानकारी लेने के लिए आये थे। शायद भोपाल से ही...फिर वे कभी वापस नहीं मिल सके...

वासुदेव कलाकार गाई जाने वाली गाथाओं को उनकी मूल बोली शब्दों में गाते और उसके परिवेश को भी जीते पर छत्तीसगढ़ की जमीन पर रहते हुए यहां के परिवेश की समझ ओर अपने यजमानों के भाषाई व्यवहार को सीख-समझ गये। एक समय जो लोक नाट्य नाचा का था। नाचा जब इस अंचल में जादू विखेर रहा था तो उस के ताने-बाने ने इन बसदेवा कलाकारों के मन को भी आकृष्ट किया। र्फुसत के समय में आत्मप्रेरणा से इस बस्ती में नाचा की गूंज भी गुंजित होने लगी। बस्ती के वासुदेव कलाकारों ने नाचा से प्रभावित होकर एक मंडली भी बनाई थी और नाम रखा था ‘वासुदेव नाच पार्टी, रामकुंड’ उसमें बल्देव वासुदेव, मानसिंग वासुदेव, मुन्ना वसुदेव, रामादीन वासुदेव, भागीरथी वासुदेव, भगतराम वासुदेव, गिरधर वासुदेव, प्रमुख थे। परी की भूमिका मुन्ना वासुदेव निबाहते, नर्तक रामाधीन वासुदेव, पूरी मंडली ने पहली प्रस्तुति आपने ही मोहल्ले के जन्माष्टमी के आयोजन पर की। इसके प्रदर्शन के बाद यूनिवर्सिटी में, महाराष्ट्र मंडल में, रामकुंड के लावारिन में, ईदगाह भाटा में, शताक्षी मंदिर के पास, सेमरिया और टाटीबंध में इसके प्रदर्शन किए।

अब वासुदेव नवयुवक गाथाओं के पारंपरिक गायन-वादन और चर्या से सरोकार स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। विविध दैनिक व्यवसाय में संलग्नाता उन्हें इस परंपरा से एक दूरी पैदा करती है। उनके मन में आदर्श सत्य और ज्ञान के पीछे पाया धन एक भिक्षुक के पाये धन का अहसास कराता है।

1980 के बाद पुराने मध्यप्रदेश में हुई कला गतिविधियों में इस बसदेवा पारा का सर्वेक्षण तो हुआ पर किसी भी कलाकार या समूह का नाम न प्रदीप्त हुआ और न कोई सम्मान, शासन ने इस गायक समुदाय के कला संरक्षण लिए कोई ऐसी योजना बनाने में दिलचस्पी भी नहीं ली कि यह परम्परा, परम्परागत रहे। नये छत्तीसगढ़ के अब तक 14 साल बीतने पर यह दूरी और बसदेवाओं का अज्ञातवास पूर्ववत है।

नवयुवकों ने वासुदेव युवा कल्याण समिति बनाई है उसे 2 साल काम करते हो गया है। गनेश, देव, कुलदीप, उमाशंकर, हरिओम वासुदेव युवा शक्ति हैं वे अपने समाज के लिए कुछ आगे करना चाहते हैं अपने भौतिक विकास और परम्परा की अक्षणुता पर पर लक्ष्य क्या हो इस बारे में प्रयासरत हैं।


बसदेवा छत्तीसगढ़ की कथा गायकी और लोक मानस के धार्मिक भावाभिव्यक्ति के सतत् उत्प्रेरक हैं। प्रदेश इनके परम्परागत कथा गायन से सदैव संस्कारित हुआ है। संस्कृति के दृश्यांकित रहने के आधारभूत कायों में बसदेवाओं की संलग्नता छतीसग़ढ़ को विशेष बनाती है। छतीसगढ़ का लोक मानस इस समुदाय के गायन कर्म के प्रति सम्मान की दृष्टि रखता है।

आगत


छत्तीसगढ़ के निवासी रहे नवल शुक्ल-चैमासा लेख से कुछ मार्गदर्शन तथा सामग्री ली है और हां जब 9 दिसम्बर 2012 का आरंभ-में संजीव तिवारी का लेख देखा तो लिखने का मन भी बना, इन दौनों सज्जनों का हृदय से आभारी हूं।

शुक्रवार, 6 जून 2014

लिंगोपेन: देवगांव, बस्तर

लिंगोपेन गाथा संकलन : देवगांव, बस्तर
भारत में आख्यानों का समय वैदिक काल के बाद का है। यज्ञ आयोजनों में आख्यानों का पाठ होता था ये आख्यान नाट्य, नृत्य गीत के विविध पक्षों से सौन्दर्य सत्ता का प्रदर्शन भी करते थे। छत्तीसगढ़ की इस धरती को जब महाकान्तर नाम से पुकारते होंगे। उसके दृश्यों को खोजते रहने की धुन मुझे जाने किन-किन पुस्तकों, गाथाओं, कथाओं में पुरातन समय के संसार की यात्रा कराने लगती है।

ऐसे में पिछली सदी के समापन दशक को याद करने लगता हूं जब लिंगोपेन की गाथा का संकलन करने के लिए देवगांव, बस्तर में रहना हुआ।

बुन्देलखण्ड की धर्मासावरीं गाथा, आल्हा, जगत का पुआंरा, कबीर के भजनों के संकलन सर्वक्षण के बाद बधेलखंड की लोक कलाओं पर काम करने का अवसर मिला था। भीली क्षेत्र में गीतों का संकलन, अमरकंटक, बैगाचक, के पहाड़ी हिस्से में कबीर निरगुनिया पदों की लम्बी खोज यात्रा से मध्यप्रदेश को जाना था। पहिले एक बार बस्तर के धनकुल गाथा गायकों की खोज करते हुए जगदलपुर के नजदीक के ग्राम आसना से गुरूमायों खोजकर भोपाल लेकर गया था। जहां समग्र धनकुल जगार कथा की रिकार्डिंग, संकलन संपादित की थी।

आगत, Agat shukla
भोपाल से छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस... हम लोग शाम को लगभग दौड़ते..पकड़ते, सुबह रायपुर उतरते ही पास खड़ी बसों में बैठते और यहीं से हमारे मन का बस्तर हमें अपने उस आदिम समय में समेट लेता, हमें जैसे सब कुछ बस्तरिया ही लगता। रायपुर शहर बस्तर के हाट-बाजार से कुछ अधिक न था। ट्रेन से उतरते ही रायपुर का हर आदमी जनजातीय महसूस होने लगता। स्टेशन पर बेवजह खींसें निपोरते बस चालक आयातित लगते और कन्डेक्टर कहीं से भाग आया हुआ आदमी लगता। स्टेशन से निकलते ही होटल से तुरत-फुरत खरीदे चार समौसे ही प्रातः का नाश्ता और खाना हो जाते जो बस में बैठे-बैठे खा पाते। चिन्ता होती कि जल्दी से जल्दी लग्जरी बस पकड़कर कोण्डांगाव पहुंच जायें शाम ढ़लने के पहिले ही। कोण्डागाव लांज की सुविधा से जंगल की जमीन पर सोना ठीक लगता।

कोण्डागांव के पहिले दायें ओर के रास्ते नारायणपुर चैक पर जाकर 200किमी की यात्रा पूरी हुई कि लग्जरी बस को विदाई दी, शाम हो रही थी। कुछ देर इंतजार के बाद पता लगा कि नारायणपुर जाने वाली बस तो निकल गई है अब 70 किमी का रास्ता है। वहीं तिराहे पर बतियाता ट्रक का ड्राईवर चाय पीते-पीते खुद ही पूछने लगा ‘साहब क्या बाहर से आये हो, नारायणपुर जाओगे ? मैनें कहा ‘हां भाई आप तो जानते ही हो कि वही जाने के लिए खड़ा हूं।’ पैसे की बात नहीं हुई वह भी जानता था कि मुझे जाना है मैं भी जानता था कि मुझे वही ले जायेगा। ट्रक को अब अंतिम सवारी मिल गई, दो-तीन गांव निकल गये, आगे जाते-जाते ‘ााम बीती और अंधेरा हुआ पता लगा कि ट्रक में लाईट तो थी ही नहीं, पर ट्रक खड़खड़ाता बहुत जोर से था और ट्रक के पिछवाड़े में लदे मुरिया महिला, पुरूष भी जोर-जोर से गीत गाने लगते। यह गीत संकेत किसलिए ? लोगों को संगीत ध्वनि का आसरा था कि सामने आ रहा वाहन इस ध्वनि को सुन लेगा और समझ जायेगा गाड़ी आ रही है गीत गा रही है। मैं सांस रोके अपना बैग सम्हाले अगली सीट पर दुबका। छिटकी सी चांदनी में मुझे हर मोड़ देवगांव का मोड़ ही समझ आता, पर ड्राईवर तो बस काली सड़क और उसके बाजू की लाल मुरूम पर ही आंख गढ़ाये रहता। मुझे समझ आया उसका यह काला-मैरून रंग की रेखा का भेद ज्ञान ही हम सबके जीवन का सहारा है। ट्रेन की अधूरी नींद जाने कब झपकी तक ले गई पता हीं नहीं चला तभी ‘साहब उतरना है कि नहीं देवगांव आ गया।

 रामसिंग  काष्ठ शिल्पी
सचमुच देवगांव आ गया था, बस जंगल सा ही था। देवगांव की सड़क पर पहला मकान रामसिंग मुरिया का था समझ नहीं आया कि साल का पेड़ पहिले था जिसके नीचे घर बनाया या पहिले घर था जिसके बीच से पेड़ उगा। मेरे लिए वह एक बस स्टेंंड, एक धर्मशाला, एक होटल और सुरक्षा का आश्वासन था। रामसिंग दुबला पतला पर मजबूत काष्ठ शिल्पी है, वह जंगल जाता, लकड़ी लाता, मुखौटे बनाता रहता, मुखौटै बन जाते या आधे अधूरे भी होते और यदि वन विभाग के लोग आ गये तो मुफत में ले जाते। कुछ नियम भी सुना देते। रामसिंग का कलाकार लुट जाता और रामसिंग बच जाता। लकड़ी के देव मुखौटे नियमों के संरक्षकों के हाथों जाते-जाते साहबों के ड्राईगरूम में राक्षसों के मुखौटे बन जाते और आदिम कला के प्रतिमान रचते। अब रामसिंग छिपकर मुखौटे बनाने लगा और उन्हें दूसरे मुरिया की झोपड़ी में जाकर छिपा देता। कभी-कभी अपने घोटुल के मुरिया नृत्य दल को भोपाल गणतंत्र दिवस पर लोकरंग में लेकर आता ककसार या मांदरी गाता, नाचता और अपने संगियों को गणतंत्र की खुशी बांटता, वह देवगांव के घोटुल का पुराना सदस्य जो ठहरा। इसलिए उसके मकान में अतिथि हो जाने में अतिथि को एक गर्व महसूस होता। रामसिंग बाहर से आने वाले आदमी को यदि ‘साहब’ कह देता तो सारा गांव उसे ‘साहब’ ही मान लेता। प्रतिप्रश्न नहीं करता।

रामसिंग बताने लगाता कि अब वह शिल्प नहीं बनायेगा। लोग उसके यहां आते हैं और उसे ठगकर चले जाते हैं। रायपुर से एक सज्जन अकसर कुछ विदेशी लोगों को लेकर चले आते, दो-तीन दिन के लिए वह अपने सारे काम छोड़ साहब-साहब कहता वह गाईड बन जाता, लोगों को गांवों से, खेतों से, काम पर से बुला-बुला कर लाता, अपनी जिम्मेदारी पर जंगल का ज्ञान अपरिचितों को परोसता वह प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देना अपना धर्म भी समझता और यही उसका अहम भी बनता। इस गर्व ज्ञान में गोंडी-हिन्दी भाषा का दुभाषिया भी बन जाता और फिर रायपुरिया सज्जन उसके जितने भी काष्ठ शिल्प होते अपनी गाड़ी में रखवा लेते, गाड़ी स्टार्ट हो जाती, ऐसे में उन साहब को रायपुर जाने की जल्दी अकसर होती। जाते-जाते रामसिंग की नमस्ते के बीच ही कह देते थैंक्यू..जब तुम रायपुर रायपुर आओगे तो घर जरूर आना, इन सबका जो भी होगा दे देंगे...पर वह बेचारा रामसिंग...‘बहुत बार होने पर एक बार उसने कह ही दिया कि साहब हमें आप जैसे कला कद्रदानों की जरूरत नहीं आप यहां न ही आया करें। हम ऐसे ही ठीक हैं।’

MURIYA 
MANDRI DANCE
यह वह 1987 का समय था जब देवगांव का घोटुल खत्म हो रहा था। रामसिंग के भाई का नाम भी रामसिंग ही था वह गांव की सड़क के दूसरी ओर 1 किमी अंदर के गांव में रहता था। उसका मुरिया नृत्य दल प्रायः भोपाल के बुलावे पर तुरन्त आ जाता। रामसिंग अच्छी जड़ी-बूटी की दवा जानता है। रामसिंग की गांव की चर्चा शहर तक चली गई। साहब की बीबी को गठिया था तो कुछ पुलिस महकमे के लोग उसके पास आ पहुंचे, दवा ली खैर खबर पूछी और चले गये। पर रामसिंग के तो दुर्दिन आ गये। जंगल के लोगांे ने भी पूछा क्यों आये थे ? सब कुछ बताओ, पर वह बेचारा क्या कहता... कुछ दिन बाद फिर मेम साहब के घुटने की दवा लेने लोग आ गये उन्होंने भी पूछा यहां के हालचाल कैसे है। अब रामसिंग इन दो के बीच नाचने-पिसने लगा। गांव में मुरिया नाचना, गाना, मिलना बंद हो गया। देवगांव का घोटुल वीरान हो गया। गांव में रहना दूभर हो गया। अब वह सदैव डरा डरा सा रहता।

 बेलगूर चित्र
नारायणपुर का देवगांव हम दूरस्थ लोगोंं के लिए धीर गंभीर बस्तर था। गांव से कुछ दूर चित्रकार ‘बेलगूर’ का घर  था। चित्रकार स्वामीनाथन जी अपने समय में बेलगूर के चित्रकार को समझने का प्रयास करते रहे और उन्होंने ही बेलगूर के हृदय के उस गहरे-आदिम कैनवास को पहचाना था। भारत भवन के संग्रहालय की सामग्री संकलन करते हुए वे बस्तर पहुंचे और बेलगूर में उन्हें वह आदिम आदमी मिला।  निश्चित ही बेलगूर हमारे समय के बड़े जनजातीय चित्रकार हैं।

शिल्पी पण्डीराम
देवगांव के पास के ही गांव में काष्ठ शिल्पी पण्डीराम का गांव है। पण्डीराम अपने घर के सामने मैदान में लकड़ी को बस्तर की कला में बदलते दीखते। वे दूर से ही किसी काष्ठ के टुकड़े पर कुछ खोजते से दीखते। पसीने में उनका शरीर सौने की सी आभा देता लगता और आंखों में जैसे किसी पुरातन विरासत की परम्परा दीखती, मुस्कुराते हुए जीवन की जीवटता जैसे जंगल से भैंट में मिली दीखती। मैं तय नहीं कर पाता कि क्या यह काष्ठ शिल्पी गांव में है या शिल्पी में गांव है। अपने लगभग पूरे जीवन भर वे अपने कलाश्रम को विविध संस्थानों को चन्द रूपयों के बदले बस्तर की कला उपलब्ध कराते रहे हैं। पर सब कुछ विनिमय के तौर पर ही सम्पन्न हुआ।

यही से हम गोलावंड की ओर चल देते। रात में जाने पर वहां शेर की आवाज सुनाई देती इसलिए दिन में ही जाना हो पाता। काष्ठ शिल्पी को अपने घर के बाहर पड़े वृक्षों के उन ठूठों से मानवाकार ‘ाक्ल के मानवीय शिल्प बनाता देखता। उसे देखकर लगता कि वह ‘ाहरी मानस के सौन्दर्य विलास को समझने लगा है और जब उसे बहुत आड़ा तिरछा पेड़ दिखता तो उसकी आंखों में चमक आ जाती और एक आदिम शिल्प उससे आकार ले लेता। कभी कभी उसका बनाया शिल्प जब नहीं बिक पाता तो महुआ उबालने के चूल्हें में उसका उपयोग होता, ऐसे समय यदि कोई व्यापारी आ गया तो वह अधजला शिल्प सबसे कीमती शिल्प माना जाता। उसके घर जब भी गया हूं  हमेशा उबलता हुआ महुआ और गुस्से से उबलती हुई उसकी पत्नी दिखती। बच्चे और कुत्ते आपस में लिपटते-खेलते दीखते,,,इसके अलावा उसके घर में जैसे कुछ था ही नहीं। टूटे फूटे मिट्टी के बर्तन, और बिना दरवाजे की झोपड़ी बस यही उसकी गृहस्थी थी। दिल्ली के व्यापारी अकसर उससे मिलने आते। काष्ठ शिल्पों को जलाऊ-लकड़ा बताकर उसकी टी.पी. बनवाते और और मिनी ट्रक भर कर ले जाते। बाद में हस्तशिल्पियों की संस्था ने बस्तर के सारे शिल्पों को तोलकर ही खरीदना आरंभ किया। कला का मूल्य कभी नहीं तय हुआ।

तो गाथा संकलन के लिए एक काला बैग जिसे गांव के मुरिया जन गौर से देखते उसे उठा चलने में उत्साह दिखाते। वे जताने की कोशिश भी करते कि बैग में रखी चीजों को उन्होंने, कभी, कहीं देखा है। तो एक पुराना टेपरिकार्ड, सोनी की आडियो कैसिट, सेल, माईक लेकर मैं अकेले ही बस्तर के कोण्डागांव से 80 किमी नारायणपुर से पहिले दो किमी पर देवगांव पहुंच ही गया था। रात की चांदनी और उसके तारे और रामसिंग का घर अब मेरा भी घर था।

रात में गांव के लोग भी आये चर्चा मंे तय हुआ कि पास ऐड़का ग्राम की ओर ही 9 किमी दूर गायक का गांव हैं जो 71 साल के हैं नाले के पार गांव हैं इसलिए लाईट नहीं है। इसलिए देवगांव में ही रामसिंग के घर पर रिकार्डिंग करनी पड़ी। रात को जंगल की ओर की तरफ पड़ी खटिया में सोया, रामसिंग बताता है कि पास ही महुआ के पेड़ के नीचे सुबह-सुबह रीछ आते हैं इसलिए उस ओर मैदान मत जाना। गांव का एक लड़का सुबह ही साईकिल से चला गया और दोपहर होते-होते साईकिल पर एक व्यक्ति को बिठाकर ढ़ो लाया। मैने देखा वह उन्हें बांध कर लाया था। उनके हाथ की उंगलियों और पांव के अगले हिस्से गलने लगे थे पर गले में आवाज और आंखों में जीवट था। मैंने कहा कि ‘आप कैसे यहां तक आ पाये। आपकी तबियत ठीक नहीं’ उन्हांेंने कहा कि ‘तबियत तो मुझे ले जाकर ही छोड़ेगी। पर जो मैं जानता हूं वह बचा रहे यही मेरी जीवन का बड़ा काम होगा।’ और उसी रात से तीन-तीन धण्टे की पारियों में गाथा गायन होने लगा मैं रिकार्डिंग करने लगा। पांच दिन रूक-रूक कर गायन होता, वे दिन में गाने से मना कर देते और शाम होते वे थोड़ी सी महुआ की शराब की मांग करते हर आधे घंटे में एक कप महुआ के साथ यह गायन चलता रहता। महुआ जैसे बार-बार उनमें दुगना उत्साह भर देता।

Gotul
सुबह किसी न किसी गांव की ओर चल देते और सारा दिन काट लेते। रामसिंग कहता कि सल्फी पीकर लू नहीं लगती। और हम सभी इसी का आसरा ले पैदल चल देते। एक सुबह राम सिंग के दूर के मामा के चाचा के भतीजे के, इसके के ,उसके के उसके का देहांत हो गया। रामसिंग का जाना जरूरी था सो हम भी तेज गर्मी में नदी के किनारे-किनारे सूखी रेत में चलते-चलते एक गांव में पहुंचे वहां महज 2 रूपये में बच्चों से खरीदे डाल के पके 4 आमों को खाया बच्चों को आश्चर्य था कि आम के बदले पैसे भी मिल सकते हैं बच्चों ने दो तीन आम हमें यों ही दे दिए उनका का स्वाद आज भी मुझे याद है आगे चलते हुए दोपहर बाद देवगुड़ी में उस ग्राम के मृतक के संस्कार की पूजा में शामिल हुऐ। लोग आने लगे धीरे-धीरे गाते हुए नृत्य-गीत होने लगा है।

एक सुबह रामसिंग की पत्नी को पेट में दर्द हुआ। मैं खिड़की से देखता हूं गांव का सिरहा ध्वन्यांत्मक मंत्रों की गहन गुनगुनाहट करता, जैसे आमंत्रण करता हो शक्ति का, जैसे बजाता हो वाद्य प्रकृति का सांसे ऐसे चलती कि बस अब यही अंतिम सांस होगी। मैं सांस रोके देखता रहा। कुछ ही देर में स्त्री ठीक हो गई और उठकर जंगल में महुआ बीनने चली गई।

तो लिंगोपेन गाथा पूरी हुई यह गोंडी में गाई गई थी। पारिश्रमिक देने के बाद गायक ने मेरी आंखों में गहरे से झांका विदा होते मुझे लगा कि जैसे वे सदियों का अपना बोझ उतार कर मुझ पर डाल चल दिऐ। अब लिंगोपेन की गाथा आडियो कैसेट में बंद थी।

आदिम समय, उसका परिवेश, उसका संगीत और वेद से भी पुरातन समय जब केवल नदियां, घाटियां और पर्वत ही देव थे तब के समय की कथा, तब का समय मेरे झोले में था। खाली जाना और भरकर आना मुझे पहिली बार महसूस हुआ।



गुरुवार, 5 जून 2014

नगरनार-बस्तर की पांरंपरिक मिट्टी शिल्प कला

Tuesday, 12 July 2011

नगरनार : मिट्टी शिल्प कला ग्राम

बस्तर की पांरपरिक शिल्प कलाओं को पुरातन समय से बार-बार प्रतिध्वनित करता यह गावं, नदी के किनारे अलसाया सा पढ़ा रहता है। नदी के साथ रोज सृजन का रिश्ता, हर सूरज उगने के साथ ही सार्थक अगुलियों से आदमी के आत्मतत्व की मिट्टी, नदी की मिट्टी से सृजन करती, रोज अपने को नये रूप में पसार देती है। नदी के इन किनारे ने कुम्हारों को बाध्य किया यहीं बस कर रह जाने के लिए,  नगरनार के आस-पास की मिट्टी के अनेक प्रकार मिल जाते हैं। मिट्टी की यह अलग-अलग प्रकृति इस सृजन स्थल को खुद ही चुनती है।

 नगरनार में कुम्हारों के लगभग 50 परिवार हैं जो सदियों से दैनिक उपयोग की सामग्री, शिल्प, अनुष्ठान सामग्री बनाते आये हैं। लोक विनिमय प्रथा के चलते तो पूर्व में केवल उदर पोषण पूरा करते हुए अल्प कामनाओं के चलते यहां समय ठहरा हुआ सा जान पढ़ता है। बहुत समय से मानो कुछ बदला ही न हो। बस बदला तो रोज ही उंगलियों से बहता सृजन,
 नगरनार ने जहां कला के अनेक मूल्य सहेजकर रखे, शिल्प के पारंपरिक आकार को स्मृतियों में सहेजे रखा, और नवीन रूपाकारों से भी परहेज नहीं किया। अपने परिवेश को शिल्पांश्रम की मर्यादाओं से सर्देव आरक्षित और पोषित किया। अपनी विरासत को अपनी पीढ़ियों तक निरंतर जारी रखने का महती काम किया, और इस कठिनतर जीवन शौली से कभी भी परहेज नहीं किया। नगरनार ने समाज और संसार को अपनी ओर से भरसक देने की कोशिश की। और आज नगरनार शैली पूरे देश की बची-खुची ‘ौलियों में से एक है जो अपने अस्तित्व को बचाने की अंतिम कगार पर खड़ी हैं। 

देश में कला परोपकारी सामाजिक, सांस्कृतिक, राज्यों की शासकीय, देश की केन्द्रीय संस्थाओं, ने अपने-मानदण्डों से जो भी यहां किया उसके कुछ भी सूत्र यहां नहीं दिखते हैं। एक कला ग्राम को कैसे संरक्षित किया जाये इसके लिए पूरे देश में संगठनों, संस्थानों की भरमार है। लेकिन बजट बनाने पर लोगों के नगरनार पहुंचने का खर्चा अधिक और उस कलाकार के जेब और पेट में पहुंची सहायता का धन इतना कम है। कि कहते हुए शर्म आती है।

कलाकारों की हालत तो यह है कि चक्र बनाने के लिए, मिट्टी लाने के लिए, शिल्प पकाने के लिए पैसों का अभाव रहता है। और यदि शिल्प बन जाये तो उसकी विक्रय समस्या सामने होती है।
देश में शिल्प को बाजार तक पहुंचाने के लिए अनेक एन.जी.ओ., राज्य और केन्द्र की अनेक योजनायें हैं। योजनायें आकाशीय मार्ग से आने वालों के वश में होती हैं। लोग दिल्ली से प्लेन से आते, 3स्टार होटल में ठहरते, रायपुर से ए.सी. कार लेकर जगदलपुर में ठहर कर रात्रि विश्राम कर प्रातः नगरनार पहुंचकर सुबह के सूरज की रोशनी में चमकदार शिल्पों और धुंऐ से काले होते बूढ़े शिल्पियों की आंखों, गालों के गढ़ढे, हाथों की धिस चुकी लकीरें जो चेहरे पर छप गई हैं उनके कलात्मक फोटो संकलित कर, अपने अफसरी पहनावे, शब्दों के बंधाये आसरे, विकास की झूठी चमक चमकाते, अपने साथ के आदमियों की आंखों में इशारा करते कि इन्हें मैनेज कर लेना। चले जाते....फिर लौटकर नहीं आते...
 बच्चे कार को धुएं उड़ाते आते देखते और धूल उड़ाते जाते दीखते-दीखते जवान होते जाते, पिता की पारंपरिकता अब उन्हें रास नहीं आती है। छोटी सी जमीन जो शिल्पों के लिए अधिक थी अब नगरनार के प्लांट लग जाने से जमीन की कीमत और उसके एवज में सरकारी नौकरी मिलना नवजीवतों के लिए ज्यादा लाभप्रद लगता है।

अब जो नगरनार के पुराने आलेखों, बोशरों, या सूचनाओं के आधार पर जो भी योजनायें बनायी जा रही हैं उनका उपयोग अब सार्थक होने की संभावना नहीं हैं। नगरनार की कला परिवेश तब जीवित रहता जब कला, परम्परा से आगे विरासत के रूप में आगे बढ़ती। यह नहीं हो सका। और अब बस नगरनार की कला ग्राम की पहचान असली से नकली होने की है।

पूरे देश में कला, शिल्प, सांस्कृतिक संस्थाओं, सहयोगी संस्थाओं ने कलाकारों के लिए विभिन्न योजनाओं के लिए एक सूत्र दिया था और बहुत सारा पैसा इस पर खर्च भी किया। विचार था कि सारी पारंपरिक कला परंपरा को दस्तावेजीकरण कर लिया जाये। 1980 से 2000 तक ऐसे कलाकार समुदाय को ध्यान में रखकर पैसा खर्च हुआ कि हमारी विरासत अब इन 60 साल से 80 साल के कलाकारों के पास संरक्षित है। सो इनका समग्र संकलन किया जाये। यह कहते-कहते वे समय काटते रहे। यह कहने वाले अफसर आदि अब तक रिटायर हो चुके हैं। तो उस समय के बाबू महोदयों ने एक अजब तरीका ढूंढा है और वह यह है कि कलाओं में नवीन नवाचार नवआकार नवउपयोगिता अनुसंधान करते हुए कलाकारों के बाजारों को उन्नत किया जाये।

एक समय तो यह भी हुआ कि देश की सारी कलाओं को एक स्थान पर लेकर आया जाये। कलाकार एक दूसरे के कला आयामों का अध्ययन करें। एक दूसरे से सीखें और अपने गांव लौट कर उस विधि से काम करें। इन आयोजनों ने शिल्प कला की अपनी निजी स्थानिकता को गम्भीर नुकसान पहुंचाया। शिल्पी अपनी पारंपरिक विरासत को छोड़ बाजारवाद के अंधेरे गलियारे में भटकने को मजबूर हुए।
दरअसल ये सारे विचार, ये सारी योजनायें कलाकार, कला विशेषज्ञों, ग्रामीण कला पारखियों की नहीं थी। ये योजनायें तथाकथित पिछले दरवाजे से नौकरी ढूंढकर आने वाले, टाईपिस्ट की पोस्ट पर आते हुए मैनेज कर अफसर की बगल में जाकर अभिनव योजना बताने वालों और रिटायरमेंट तक या जब तक नौकरी करना हो तब तक के लिए सांस्कृतिक व्यक्ति का आडंबर ओड़े व्यक्तियों का काम-कौशल था। ये सभी हिन्दी साहित्य के पढ़े लोग थे जिन्हें सीधे-साधे गांवों के कलाकारों के समूह को नियंत्रित करना मुश्किल न था। 

कलाकारों ने इन सब अडम्बरवान लोगों के शब्दविलास से आकर्षित होकर इन पर विश्वास किया और परिणति में देश की कलाओं, और कला की पारंपरिक विरासत की प्रथा अब अपने अंत की कगार पर खड़ी है।

शिल्प उन्नयन संस्थाओं ने तो शिल्पियों के शिल्प के जो मानदंड स्थापित किए वे इतने विदेशी है कि देखकर दुख होता है। अब शिल्प संस्थाओं में शिल्प के नवाचार के नाम पर शिल्प के कारखाने खोलने का परिवेश दीखता है। एकाकी सृजन और परम्परागत शिल्पों, स्थानिकता के रूपांकनों को त्यागते हुए। अनेक तरह के नवाचार हुए हैं जिनके कारण पारंपरिक कलाकार बेरोजगार है।
 जो शिल्प बाजार में चलता है उसकी डाइ बन जाती है और उसे बाजार की मांग विक्रय के अनुसार हजारों की तादात में बनाया जाता है और आकार की एकता रखी जाती है। इस तरह कलाकार के हाथों का प्रथम शिल्प जो आकर्षित करता है उसे लेकर उस कलाकार को उसका इतनी संख्या में बनाये जाने का कोई लाभ नहीं मिलता। उसे कहा जाता है कि जो प्रशिक्षक कह रहा है वह करो। जो तुम्हारी कला है उसे घर पर ही छोड़कर आओ। इस तरह वह कलाकार न होकर एक मजदूर की हैसियत का हो जाता है। साथ ही कहा जाता है कि बच्चों को भी हम रोजगार देंगे बच्चे जब प्रशिक्षक के पास जाते हैं तो वह उन्हें वह शिल्प बनाने की ट्रेनिंग देता है जो पूरे देश में एक ही तरह का दिखता है। इस तरह कला की मूल आत्मा मार दी जाती है।

जिस हाथी को देखते ही हम गणेश की याद करके हल्दी का टीका लगाते दूब चढ़ाते शुभ काम के होने की आशा करते। उस हाथी के शिल्प को ऐश ट्रे में परिवर्तित कर निर्मित करते हैं। जिसका उपयोग ऐश टेª में सिगरेट के ठूंठ कुचलते होता है। कला का बेहुदा निर्माण और उसके हिस्से से कला का लगातार अपमान हमें पता नहीं शिल्पों की किस दुनिया में हमें ले जायेगा ?

नगरनार- दृश्यांकन देशाटन

Friday, 22 July 2011

नगरनार- दृश्यांकन देशाटन

नगरनार:1991 

भतरा मोनोग्राफ के श्वेत-श्याम तथा रंगीन दृश्यों के लिए भोपाल से एक फोटोग्राफर को लेकर जाना था। हम रेलगाड़ी से रायपुर पहुंचे और बस से जगदलपुर में जाकर ठहरे। सुबह तय हुआ कि बढ़िया नाश्ता करें, फिर चलें। हमने रास्ते के ठेले से, जहां बहुत से लोग छोले-पुरी का मजा उठा रहे थे.. हमने भी नाश्ता किया और बचत के इरादे से एक मेटाडोर में बैठकर चल दिये। रास्ते में दिखा.. बरगद का विशाल वृक्ष जो अपने नीचे कुछ चढ़ाये गये हाथी, घोड़े, शिल्पों, लाल, सफेद, पीले धागों से बांधे लोगों के संस्कार, आस्था और विश्वास को ढ़ाढ़स बंधाता.. अपने भी बचे रहने की आंस संजोये, एक ठन्डी सी मिट्टी की खुशबू के झोंके से हमारा स्पर्श करता है। आगे की धरती खेतों की मर्यादाओं में धान की बलियों को सहेजे पानी के पालने में हिलोरे ले गीत गाती सी लगतीं हैं। आगे एक बड़ा सा पहाड़ दीखता है पास आने पर वृक्षों के झुंड में बदल जाता है। यहां साल के लम्बे और ठन्डे इन तनों के बीच कभी-कभी भालू जड़ों को खोदते, दीमक को घेरते दीखते हैं और यही से ये भालू सड़क पार करके नगरनार बस्ती के पास के गन्ने और भुट्टे के खेतों में जाने का लोभ संवरण नहीं कर पाते।


इसी सड़क के पास चोकावाड़ा आने के पहिले लोगों का हुजूम दिखता है। लोग आपस में लड़ते-झगड़ते से दीखते हैं पास जाने पर हम अपने को अस्थायी बाजार में पाते हैं लोगों के अंदर का लड़ाकू आदमी अपने तौर-तरीके मुर्गे में स्थापित कर, अपने खोजे हथियार के छोटे, छोटे रूप मुर्गे के पैरों में बांध अपनी लड़ाई लड़ता तो दीखता है पर लड़ता हुआ मुर्गा, लहूलुहान होते दूसरे मुर्गे को मारकर जीतने के लिए कटिबद्ध, मौत का खेल खेलता है, मुर्गो के एक दूसरे पर किये वार, उड़ते हुए खून के धब्बे, छिटकते  मांस के कतरे लोगों मे उतेजना भर देते हैं, जब एक मुर्गा  मरता है तो आदमी जीत जाता है। हारा हुआ मुर्गा, जीते आदमी का भोजन बन जाता है। जीता हुआ मुर्गा अपने जिन्दा रहने का एक सप्ताह और जीत लेता है। लगता है जैसे दुनिया भी अपने विकास के नये हथियारों से कुछ समय और जिन्दा रहने की गुजाईश पैदा करती चलती है। बाजार के कोने में महिला, बूढ़े-बच्चे बाजार करते, 50 पैसे का धना, 1 रूपये का जीरा, 2 रूपये का तेल खरीदते दीखते हैं।

इस जगह आकर मेटाडोर चिल्लाकर रोकनी होती है और रास्ते में छोटा सा पेड़ों का झुरमुट और पगड़डी से जाते हुए दो वृक्षों के मध्य छं इंच की मकड़ी चिड़ियों को फांसने फंदा लगाये दिखी। उसका फोटो ले--दो ही कदम बढ़े कि हमारे फोटोग्राफर महोदय को डायरिया की शिकायत हो गई। किसी तरह उल्टी-दस्त कराते. गांव के सरकारी अस्पताल पहुंचे तो बन्द मिला, उसके अहाते में गायें बेफ्रिक बैठी हमें देखती रहीं। बाजू में ही एक छप्पर नुमा कमरे में वैध जी मिल गये। मैने कहां कि भाई इस आदमी को वैसे ही ठीक कर दो जैसे बिगड़ी गाडी को गैरेज तक पहुंचाना होता है। बस यह चल फिरने लगें?  उन्होंने फोटोग्राफर महोदय को कुछ आयुर्वेदिक दवा, कुछ अंग्रेजी और इंजेक्शन दिये। यह जुगाड़ की दवा-दारू हमारे ग्रामों में आम है।

केवल ढाई घन्टे के ताजे-ताजे स्वस्थ हुये  फोटोग्राफर महोदय को फिर व्यापार की चिन्ता हुई। हम उसी हालत में भतरा बस्ती गये। भतरा जनजाति के खान-पान,  टूटे-फूटे घर,  कपडे,  गन्दगी करते बच्चे,  मजबूर काम करती औरतों, टूटे फूटे बरतन, जंगल से लाये विविध खाने का सामान, पुराने पड़ चुके टूटे-फूटे देवस्थानों के विविध कोणों की फोटो लेते अपने आप को इस आदिम स्मृति के संरक्षण करने का आत्मसंतोष जताते हुए देश के सबसे जिम्मेदार संस्कृतिकर्मी का वैचारिक आवरण महसूस करते हुए। हम अजीब सी बैचेनी में घिर गये।


हम लाल-गुलाबी होते सूरज के सामने के बादलों को पहाड़ों की तुलना करते देखते सड़क की ओर लौटने लगे। शरीर और मन के साथ जैसे आत्मा भी थक गई। पीछे मुड़कर देखना अच्छा नहीं लग रहा था। अपने रोजगार की इतिश्री करते...करते.. रात को ही जगदलपुर आ गये और फिर सोचा कि रात भर जगदलपुर के मच्छरों की दावत बनने से तो अच्छा है कि हिचकोले खाते हुए रायपुर पहुंच कर भोपाल जाया जाये और हम निकल लिए।
क्रमशः

भंगाराम-देवताओं का न्यायालय

Sunday, 10 July 2011
बस्तर के सभी देवताओं की उपस्थिति
जनजातीय पुजारी का महत्वपूर्ण स्थल
शक्तिपात से कापते सिरहा

नागवंशीय परम्परा के उत्स का समग्र दर्शन
आंगादेव और देवताओं की यात्रा का जलूस का विचित्र आयोजन
9 परगान के 500 माझी क्षेत्रों के ग्रामों के देवताओं का उत्सव

बस्तर की परम्परा की एक विचित्र और अनूठी स्थली

भंगाराम
लोक और जनजातीय संस्कृति के आदिम उत्स की जीवन्तता को बस्तर में आज भी देखा जा सकता है। लौकिक और पारलौकिक शक्तियों की उपासना, श्रृद्धा और भक्ति को पुरातन काल से बस्तर की संस्कृति में प्रमुख स्थान मिला है। बस्तर का देवलोक देश के अन्य जनजातीय क्षेत्रों से अधिक पुरातन, विस्तृत, और समृद्ध है। पारलौकिक शक्तियों के प्रति जितना अनुशासन और समर्पण यहां देखने को मिलता है,अन्यत्र दुर्लभ है।

भादों जात्रा
 छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से जगदलपुर सड़क पर लगभग 130 कि.मी. की दूरी पर केसकाल है। यहां से एक रास्ता सीतानदी अम्यारण्य और ऋषि मंडल सिहावा को जाता है। यह पहाड़ी राम वन गमन के मार्ग में आती है।  केसकाल की पहाड़ी पर वन विभाग के रेस्ट हाउस में ठहरने की सुविधा है। केसकाल की घाटी से बस्तर अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत ओढ़े नजर आने लगता है 
केसकाल की घाटी पर और केसकाल की बस्ती से कुछ दूरी पर बस्तर की प्रमुख देवी भंगाराम देवी का शक्ति स्थल है। इसे देवताओं का न्यायालय भी कहा जाता है। कहा जाता है कि बस्तर के राजा को देवी ने स्वप्न में कहा कि मैं तुम्हारे राज्य में आना चाहती हूं तब राजा ने मंत्री और प्रजा के साथ बस्तर से केसकाल की घाटी पर देवी के स्वागत के लिए आये। तब बड़ी जोर की आंधी चली और देवी पहले पुरुष वेश में घोडे़ पर सवार होकर आई ओर पास आते  जब लोगों ने उन्हें नमन किया तब वे स्त्री वेश में परिवर्तित हो गई। केसकाल की घाटी में सड़क के किनारे बना मंदिर ही देवी के प्रगट होने का स्थान है। इस स्थान से दो कि.मी. की दूरी पर एक दूसरा मंदिर बनवाया गया यहां पर देवी की स्थापना की गई।

 लोगांे का कहना है कि पूर्व में अनुष्ठानिक स्थल दैवीय शक्ति का शक्तिशाली केन्द्र माना जाता था। लोगों को कोई रोग-दोष होने पर इस स्थान पर लाने पर तीन-चार दिन में वह स्वतः ही स्वस्थ हो जाता था और आज भी यह मान्यता भंगाराम को बस्तर में अन्य किसी देवी-देवता की तुलना में उच्च स्थान प्राप्त है। भंगाराम देवी के स्थान को देवताओं का न्यायालय भी कहा जाता है। भादों जात्रा इस स्थान का महत्वपूर्ण अनुष्ठानिक आयोजन है। यह जन्माष्ठमी और पोला के बीच होता है। यह शनिवार को आयोजित किया जाता है और विशेषकर भादों महिने में ही। इसलिए इसे भादों जात्रा कहा जाता हैै।

इस पूरे आयोजन की शुरूआत ग्राम केसकाल के बाजार से होती है, लोग इकट्ठे होकर भंगाराम मंदिर जाते हैं यहां पर लगभग 100 आंगादेव, हजारों सिरहा जो भाव में होते हैं, सैकड़ों  छत्र एक साथ देखे जा सकते हैं। नगाडे़ की गूंज, जनजातीय स्वर वाद्यों की ध्वनि से माहौल अत्यन्त भावपूर्ण और उत्तेजक हो जाता है। लगभग 2000 जनजातीय अनुष्ठानिक लोग जो बस्तर के आधे भाग में इस पुरातन संस्कृति के संवाहक हैं अपने को सर्वोत्कष्ट पारलौकिक सत्ता के समीप अपने को अनुभव करते हैं। हाथ में कटीली चैन से अपने को ही मारते, भाव में आकर कपकपाते, ऐसी शक्तियों के उपस्थित होने का आभास कराते हैं। जिनके प्रति आधुनिक समाज अब संवेदनहीन होने लगा है। नाग वंशीय संस्कृति की जीवन्तता के दर्शन भादों जात्रा पर किए जा सकते हैं। नागवंशीय संस्कृति के प्रतीक चिन्ह के रूप में आंगादेव को बस्तर में सर्वत्र पूजा जाता है। बड़े देव की आराधना यहां प्रमुख है। इसके प्रतीक त्रिशूल और मंदिर के खम्ब में सभी देवी-देवताओं का प्रवेश माना जाता है। लोग प्रायः 100-50 कि.मी. दूर से जंगल और पहाड़ में उन्हीं मार्गों से पैदल आते हैं जिन मार्गों से उनके पूर्वज भी आते रहेे।

देव-देवियां
ग्रामों के लोग आफत या किसी परेशानी होने पर भंगाराम समिति के पास लिखित रूप में आवेदन करते हैं और समिति के पुजारी सदस्य आदि उस ग्राम में जाकर उस विपत्ति को दूर करने का प्रयास करते हैं। भादों जात्रा में भंगाराम देव स्थल पर इसके पूरे नौ परगान क्षेत्रों के गोंड, मुरिया, माड़िया, भतरा आदिवासी अपने आराध्य देव, ग्राम देव और भेंट लेकर उपस्थित होते हैं। जिसे रवाना कहा जाता है। इस रवाना में ग्राम की परेशानियों-रोग-दोष का प्रवेश माना जाता है। रवाना को भंगाराम देवी के मंदिर परिसर में रख देते हैं। जिससे वह बला-रोग-परेशानी भंगाराम के पास कैद हो जाती है और ग्राम उससे मुक्त हो जाता है। ऐसी मान्यता है।

 भंगाराम देवी के स्थल पर परगन के माझी क्षेत्रों के देवी-देवता आते हैं। 1 सिलिया परगन,  2 कोण्गूर  परगन 3 औवरी परगन 4 हडेंगा परगन 5 कोपरा परगन 6 विश्रामपुरी परगन 7 आलौर परगन 8 कोगेंटा परगन  9 पीपरा परगनभादों जात्रा के दिन लगभग 450 ग्रामों के लोग अपने देवताआंें को लेकर आते हैं जैसे छोटे डोंगर, बड़े डोंगर के देव, देतेश्वरी माई, खंडा डोकरा, नरसिंगनाथ, ललित कुंवर, शीतला माता और अनेकानेक देव-देवियां यहां उपस्थित होती हैं।  भंगाराम देवी पूरे परगने की प्रमुख है। यह कार्य भंगाराम देवी अपने मंत्री देवताओं और सहायक शक्तियों के माध्यम से करती है।
इस स्थल पर भेंट स्वरूप जो सामग्री लाई जाती है यदि वह कोई पशु है तो उसे ग्राम के लोग प्रसाद स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं और अन्य वस्तु को यहीं छोड़ देते हैंं। माना जाता है कि यहां से कोई वस्तु ले जाने पर आफत भी उस वस्तु के साथ ग्राम चली जायेगी।
मदिर की सारी व्यवस्था नौ परगान क्षेत्रों के माझी क्षेत्रों में ग्रामों से चंदा राशि एकत्रित कीजा ती है। इस तरह से यह परस्पर सहयोग से चलाये जाने वाली व्यवस्था है।

इस आलेख को 'हरिभूमि' के चैपाल में प्रकाशित किया गया है