शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

अमरदास मानिकपुरी


 

छत्तीसगढ़ के वादक अमरदास मानिकपुरी को संगीत नाटक अकादेमी की फैलोशिप  तथा अकादेमी सम्मान से 23 अक्टूबर 2015 को दरबार हाल, राष्ट्रपति भवन में सम्मानित किया जायेगा।


छत्तीसगढ़ के ग्राम्य परिवेश में बीत गये समय का नाचा जो आंखों में झूल-झूल जाता है। 'दर्शकों के बीच आंचलिक रसानुभूति से सराबोर ‘नाट्य कला’ अपने पात्रों के माध्यम से अपनी कहानी के दृष्यों का आकाश  बटोर जैसे गांव के चैराहे, खलिहान में उतार लाती... ऐसे समय का नाचा सोनहा बिहान की तस्वीर झलकाता सा अब भी याद आता है। बहुत से बीत गये किस्सों, कहानियों और नाचा कला के अनेक उतार-चढ़ावों को देखने-सुनने-समझने वाले अमरदास मानिकपुरी अब एक तरह से नाचा कला के द्रष्ट्रा है जिनके कहे शब्दों से हम अपने छत्तीसगढ़ की उन स्मृतियों को महसूस कर सकते हैं।
अमरदास मानिकपुरी को इस वर्ष का संगीत नाट्क अकादेमी, दिल्ली से सम्मान देने की घोषणा हुई है। मेरी  दृश्टि में ऐसे समय इस सम्मान का छत्तीसगढ़ आना अत्यन्त महत्वपूर्ण बन गया है। अमरदास मानिकपुरी ने एक ऐसा भी समय देखा है जब दूरांचल के क्षितिज पर उनके कला कद्रदान इस जमीन के बहुत सारे हिस्से के लोग बने। और अब जब पूरी पृथ्वी सूचना के नाम पर बहुत छोटी सी पढ़ गयी है तब अमरदास अपने दर्शकों से बहुत-दूर, बहुत दूर से हो गये हैं। यह उनको सालता है। दुनिया की दुनियादारी अब शायद उनके काम की न रही है। समय बीत गया, मन में जीवन की सार्थकता लगभग पूरी हो गयी है। पर कही समाज, संस्कृति और सरकार से उनको अपेक्षा है। और क्यों न होनी चाहिए। पूरा अंचल उनके कला कर्म का ऋणी जो है।
रायपुर के महंत घासीदास संग्रहालय, में जब वे आये तो लगा कि कुछ देने आये हैं। शान्त मुखमुद्रा और अपेक्षाहीन, क्या कलाकार के चहरे की यह शान्त और सौम्य शाति उसकी कला और उनके की सार्थकता का प्रमाण है। षायद हां। वे आये और मैं उनसे बात करने लगता हूं। कुछ कैमरे से फोटो लेता  हूं और बात आगे की मुलाकात को टल जाती है।

भौरमदेव की प्रतिकृति के मंदिर के नीचे बैठा संस्कृति विभाग के कार्यालय को देख उसे मंदिर की कथाओं से ओढ़ाना चाहता हूं। चाहता हूं यहां कला की साधना और कलाकार का सम्मान कैसे भी करके जीवन्त रख सकूं। कोशिश  भी नही कर सकता पर सोच तो सकता ही हूं।
वे हाथ में थैला लटकाये सधे कदमों की जैसे ताल पर वादित चले आते हों। धैर्य के साथ... वे भी पास आते हैं और मैं उनका स्वागत कर पूछ बैठता हूं क्या बात है? वे कहते हैं दिल्ली जाना है सो उसकी तैयारी के लिए पांडे जी ने बुलाया है पत्र अंग्रेजी में है सो वे ही बतायेंगे कि करना क्या है। कैसे दिल्ली जाऊंगा। वे बैठ जाते हैं।
वे सहज ही थैले को सम्हालने-उलटने-पलटने लग जाते हैं तो मैं पूछ बैठता हूं? तो कहने लगते कि पूरे जीवन की जमापूंजी है। मैंने कहा तो बताईये मैं कैमरा निकाल कर उनके पत्रों की फोटो लेता हूं और लेख लिखने की सामग्री इकटठी करने लगता हूं।
उनके पन्ने-पन्ने अपनी कहानी कहने लगते हैं।

दिल्ली में छपी-बढ़ी ‘नुक्कड़’ हबीब तनवीर के बारे में विशेषांक के माध्यम से उनकी योरोप की यात्रा की घटनायें बताती, पारसी थियेटर के नाटक की चर्चा करती हैं इसमें पत्रिका अपने पेज उलटते 158 पर ठिठक जाती है यहां अमरदास मानिकपुरी का नाम जो है। राजनांदगांव से 26 किमी की दूरी पर कोलिहापुरी ग्राम है ।
कोलिहापुरी गांव की अपनी नाचा पार्टी में पिता ही उसके जनक और संचालक थे। उन्होंने अपना कला कर्म मुझे सिखाना बचपन से आरंभ कर दिया था। वे तबला बजाते तो मैं भी सीखता, वे हरमोनियम बजाते तो मैं भी कोशिश करते हुए सीखता। ऐसे समय गांव में दाऊ मंदराजी का नाचा के लिए गांव में आना हुआ। मेरी लगन देखकर दाऊ ने मेरे पिता से नाचा के लिए मुझे मांग लिया और पिता ने भी आज्ञा दे दी पश्चात् मदन और ठाकुरराम मेरे संगी-साथी बन गये।



यहां रहने वाले अमरदास गांव की नाचा मंडली में तबला बजाते और कभी कभार छोटे-छोटे अभिनय भी करते सन इक्क्हत्तर के नवम्बर माह में हबीब तनवीर ने उनको बुलावा भेज अपने पास बुला लिया।
प्रसि़द्ध नाचा कलाकार देवीलाल को उन्होंने अपने तबले पर नचाया है देवीलाल जी नृत्य करते थे और स्त्री पात्र बनकर फिल्मी गाना भी गाते थे उस दौरान मदनलाल चुटकुले सुनाने में सिद्ध हो चले और और अनेकार्थी चुटीले संवादों से दर्शकों का मनोरजन करते थे। मालाबाई के गाने का तरीका सबसे खास था।
नया थियेटर में पहिले-पहल दिल्ली में गांधी दर्शन  के भवन में निवास-रहना होता था। फिर आगरा बाजार नाट्क के आरंभ में हबीब जी के माध्यम से तीन मूर्ति में रहना हुआ। नया थियेटर ने छत्तीसगढ़ के कलाकारों के माध्यम से संगीत की एक विरासत देश-और दुनिया के सामने पेश  की है। अमरदास ने ‘गांव का नाव ससुराल में’ बाजा बजाया है। ‘सडक’ नाटक के आरंभ में आपका अभिनय था।
आंचलिकता से सराबोर संगीत छत्तीसगढ़ की रिद्म और परिवेश को दिखाता संगीत की बेहद बारीक कारीगरी का नमूना बन गया है। मतलब कहरवा के बाद दादरा भी बजाते हुए रिद्म को पकड़े रखना होता था। इसका मुख्य जिम्मा मानिकपुरी जी ने सदैव निबाहे रखा।
नवभारत अखबार की एक कतरन कहने लगती है। ‘ कि जीवन के इतने साल कलाओं के लिए दिये पर उच्च या सर्वोच्च से कभी कोई ठीक-ठाक आसरा नहीं मिला। घर छोड़कर चले थे और अब जब हबीब साहब से छुट्टी मांगी तो उन्होंने हंसकर दे दी मुझे क्या मालूम कि वे भी हंसकर यूं चले जायेंगे...
वे याद करने लगते हैं कि भोपाल की वर्कशाप में श्री हबीब जी के निर्देशन में नये युवाओं के साथ काम किया था और फिर रायपुर में आ कर वर्तमान परिप्रेक्ष्य और समकालीन घटनाओं के आधार पर नाटक तैयार किया गया इस तरह अलग-अलग ढंग से वर्कशाप का अनुभव रहा है। नाचा का एक वर्कशाप खैरागढ़ में हुआ था उसमें प्रतिभाशाली लोगों का चयन करके  'चंदन वन के बाघ'  नाम से तैयार किया गया।
संतोष दुबे, अखबार की कतरन से कहते दीखते हैं कि पीपली लाईव के गीत में अमर की छाप है। चोला माटी के गीत में कोलिहापुरी के नाचा कलाकार ने बजाया मांदर फोटो में अमीर खान दीख रहे हैं। अमरदास कहते हैं कि 'मैं अमिरखान से मिला था वे बहुत अच्छे आदमी हैं।'
पृथ्वी थियेटर का लेटर पेड कहने लगता है कि माननीय अमरदास थियेटर में आपके बहुमूल्य और अभूतपूर्व योगदान के लिए आपके आभारी हैं। और आपका धन्यवाद करते हैं। इतने वर्शों के अभूतपूर्व थियेटर के लिए हम आपके मुमनून हैं। शुक्रगुजार हैं आभारी है। हस्ताक्षर शशिकपूर हैं।

हबीब उत्सव के ब्रोशर में रंगमंच का सूरज शयद उग रहा है क्योंकि हबीब जी ऊपर की ओर देख रहे अभी भी प्रतीक्षारत हैं। इसमें हबीब की जीवंत दीख रहे हैं। अंदर।। हबीज जी नाटक की अपनी दुनिया में व्यस्त और मस्त हैं। वे दीख रहे हैं। दिखा रहे हैं। समय पर अपने हस्ताक्षर कर रहे हैं।
मई 2010 का पृथ्वी थियेटर का मई माह का कैलेन्डर अमरदास को हारमोनियम बजाते दिखाता है पास ही हबीब जी खड़े हैं भुलवाराम तथा अन्य कलाकार भी दीख रहे हैं।
2001 का राश्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली एवं मध्यप्रदेश कला परिषद् भोपाल के नाट्य लेखन शिविर का प्रमाण अंकित करता है।
1990 का कार्य समिति आयुध निमाणी रायपुर, देहरादून के भव्य सांस्कृतिक समारोह में भागीदारी व्यक्त करता है।
मोतीपुर सामुदायिक विकास समिति शहरी गरीबों के उत्थान के लिए आयोजित कार्यशाला में अमरदास की निष्ठा को सम्मानित करती है।
 2005 को जिला राजनांदगांव के कलेक्टर को लिखते हैं कि मैं अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर काम कर चुका कलाकार हूं कृपया मुझे वित्तीय सहयोग के तहत पेंशन  प्रदान करने का कश्ट करें। 31 दिसम्बर को संचालनालय संस्कृति एंव पुरातत्व रायपुर, छत्तीसगढ़ से उन्हें वित्तीय सहायता का नवीन प्रस्ताव भेजने को कहता है।
हल्का सा मैला हो चला पन्ना परिशिष्ट  एक, नियम 10, साहित्य कला के क्षेत्र में प्रतिश्ठित ऐसे व्यक्ति को जो कि अर्थाभावग्रस्त हों, या उनके आश्रितों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता के लिए आवेदन पत्र का निर्धारित प्रारूप ...कहता है कि अमरदास मानिकपुरी ग्राम कोलिहापुरी, पोस्ट व्हाया, चिचोला, जिला राजनांदगांव जन्म तारीख 5-8-1937 गरीब, खेतिहर, अनियमित आश्रित में श्रीमती राखीबाई, आनिक पुरी, आय-आश्रित संबंध-पत्नी व्यवसाय-आश्रित, आय और आय के साधन-कुछ नहीं 2.5 एकड़ खेती गांव में एक छोटा सा मकान, अनियमित आय भगवान भरोसे, आठ हजार से नौ हजार गरीबी रेखा के नीचे बीपीएल। दर्षकों श्रोताओं का अपार स्नेह, पृथवी थियेटर से सम्मान/ लेकिन शासन से अभी तक सौभाग्य नहीं मिल पाया विवरण संलग्न, अमरदास मानिकपुरी के हस्ताक्षर


संलग्न विवरण घोशणा करता है कि लिख दिया है कि सनद रहे और वक्त पर काम आवे..
1. 12 वर्श की उम्र से नाचा मंडली में वादक के रूप में प्रवेष संगीत की शिक्षा अपने पिता कला गुरू परम पूज्य श्री बरसनदास मानिकपुरी से प्राप्त की।
2. कोलिहापुरी नाचा पार्टी, तिलई खार नाचा पार्टी, कल्याण नाचा पार्टी, राजिम कोरा्र नाचा पार्टी, नवागांव नाचा पार्टी, खेली लखोली पाटी्र में काम करते हुए दाउ दुलार सिंह, साहू दाउ मंदराजी की खेली नाचा पाटी में प्रमुख तबला वादक के रूप में छत्तीसगढ़, महाराश्ट्र में ख्याति अर्जित की।
3. ताल वाद्य के तहत तबला, ढोलक, मांदर, मृदंग, लाला, नंगाड़ा वादन में निपुण, लोक ताल की गहरी समझ एवं पुस्तुति के कारण तबला वादक के रूप में अत्यधिक सराहना मिली और अंचल के स्थापित कलाकार के रूप में पहचान मिली।
4. वादन की विशिष्ठ शैली से प्रभावित होकर अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त रंग निर्देशक पद्मभूशण हबीब तनवीर ने अपने नया नियेटर में संगीत पक्ष की जिम्मेदारी सम्हालने के लिए आमंत्रित किया।
5. सन् 1971 से सुप्रसिद्ध रंग संस्थान नया थियेटर में प्रवेश किया नया थियेटर के सभी नाटकों के संगीत संयोजन में भागीदारी निभाते हुए मैं थियेटर में प्रमुख वादक के रूप में स्थापित हो गया।
6. विष्व प्रसिद्ध नाटक ‘ चरणदास चोर’ ‘ मिट्टी की गाड़ी ’ ‘ मोर नाव दमांद गांव के नाव ससुराल ’ बहादुर कलारिन, मिड समर नाइट्स आॅफ ड्रीम, बुजर्व जन्टलमेन, मुद्रा राक्षस, सोन सागर, वेणी संहारम, जिस लाहौर नई देख्या, सड़क, उत्तर रामचरित, शाजापुर की शाति बाई, आगरा बाजार, आदि नाटकों में संगीत संयोजन एवं प्रमुख वादक के रूप में छत्तीसगढ़ी, संस्कृत एवं विदेषी नाटकों में वादन
7. इंग्लेंड स्काॅटलैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, एथेन्स, रूस, स्वीडन, बंगलादेश, यूगोस्लाविया, इटली, ग्रीस, यूनान, आदि देशो की अनेक बार यात्रा करते हुए अन्तरराष्ट्रीय मंचों में अपने कला कौशल का प्रदर्षन
8. अन्तरराष्ट्रीय मंचों के अलावा भारत महोत्सव, भारत रंग महोत्सव, पृथ्वी थियेटर फेस्टीवल-मुंबई, नान्दीकर फेस्टीवल कलकत्ता, रंग शकरा, बंगलोर, जय सुन्दरी नाट्य समारोह-गुजरात, हरियाणा महोत्सव, राज्य उत्सव-रायपुर, नेहरू सेन्टर-मुम्बई, स्पीक मैके चेन्नई, भारत रंगकर्मी उत्सव, भारत भवन वर्शिकी भोपाल, दक्षिण मध्य सांस्कृतिक केन्द्र महोत्वस-नागपुर, इलाहाबाद उत्तर पूर्वी जोन, ताज उत्सव, आगरा आदि अनेक प्रतिश्ठापूर्ण आयोजन में शिरकत

9. अन्तरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय  कार्यशालाओं के तहत् ग्लासगो स्काॅटलैण्ड नाट्य कार्यशाला, हरियाणा संस्कृति विभाग नाट्य कार्यशाला, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंग कार्यशाला, रंगकर्मी कोलकाता, खैरागढ़ नाचा कार्यशाला, संगीत अकादमी द्वारा आयोजित इम्फाल मणिपुर नाट्य कार्यशाला, रीवा, बिलासपुर नाट्य कार्यशालाओं में भागीदारी
10. टेलीविजन धारावाहिक में आगरा बाजार, फिल्मों में दी आॅन स्टिंग इनडोकैनेडियन फिल्म, दी बर्निग सीजन में काम करने का अनुभव

क्रमांक 10 का विवरण
वर्तमान में असहाय होने के कारण आर्थिक स्थिति कमजोर है। घर का गुजारा चलाना बहुत मुश्किल है।


अंतिम लिफाफा सफेद रंग का अंग्रेजी से लिखा अमरदास मानिकपुरी के लिए बूझ-अबूझ है। 31 अगस्त 2015 का यह पत्र कहने लगता है कि मैं संगीत नाटक अकादेमी दिल्ली से आया हूं। प्रिय श्री अमरदास मानिकपुरी, आपको भारत के महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी आपको संगीत नाट्क अकादेमी की रत्न सदस्यता तथा अकादेमी सम्मान से विभूशित करेंगे। आपको विशेष रूप से आपको 23 अक्टूबर 2015 को शाम 6 बजे दरबार हाल, राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली  में आमंत्रित किया जाता है। आप 23 अक्टूबर 2015 को अकादेमी के अध्यक्ष के दिए सम्मान भोज में आमंत्रित किया जाता है। आपको इकोनामी क्लास के हवाईजहाज में आने की पात्रता होगी। आपको 27 अक्टूबर 2015 को मेघदूत थियेटर, रविन्द्रभवन नई दिल्ली में एक घन्टे की प्रस्तुति के लिए आमंत्रित करते हैं। आप अपने बैंक का नाम और पता बता दें।















मंगलवार, 4 अगस्त 2015

गोविन्द राम निर्मलकर

गोविन्द राम निर्मलकर
विश्व रंगमंच पर छत्तीसगढ़ की पताका फहराने वाले...
छत्तीसगढ़ की धरा के सच्चे प्रतिनिधि...
नाचा रग-रग में नदी सा बहा...

जन्म    10 अक्टूबर 1935, राजनांदगांव
मृत्यु    27 जुलाई    2014, रायपुर

गोविन्द राम निर्मलकर छत्तीसगढ़ के लोक नाट्य कला ‘नाचा’ की दूसरी पीढ़ी के शीर्षस्थ कलाकार थे। छत्तीसगढ में बहती शिवनाथ नदी के तट पर बसे ग्राम मोहरा, राजनांदगांव में 10 अक्टूबर 1935 को पिता गैंदलाल व माता बूंदा बाई के घर में जन्मे गोविन्दराम के मन में नाचा देखकर ऐसी लगन जागी कि युवा होते ही मात्र बीसवें साल में ‘नाचा’ के ख्यातिनाम कलाकार बन गये। नाचा के वरिष्ठ कलासाधकों के उत्साहवर्धन और मार्गदर्षन के प्रेरित होकर गोविन्दराम ने अपनी प्रतिभा, लगन और निष्ठा के सहारे नाचा में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया।

गोविन्द राम निर्मलकर के जीवन का संयोग था कि नाचा के कलाकार मदन निशाद उनके ग्राम में  आ बसे। अब गांव में नाचा का आयोजन प्रायः रोज ही होता और गोविन्द राम का मन, नाचा में बस गया। ग्राम्यांचल की की इस नाट्य परम्परा का इतना सम्मान होता उनके मन में गाने-बजाने के भाव प्रस्फुटित होने लगे। वे नाचा के आयोजनों में एक महत्वपूर्ण कला अनुरागी के रूप में अपनी छवि उपस्थिति दिखाने लगे।

अद्भुत पारखी मदन काका की निगाह से गोविन्द की आन्तरिक लगन छिप न पाई और उन्होंने गोविन्द के माता-पिता से गायन-वादन के लिए, मदन निषाद ने अनुमति ले ली। गोविन्द के कला मन को जैसे बहुत बड़ा आकाश मिल गया जिसमें वे अपनी उड़ान भर सकते थे। बहरहाल वे मदन काका की पार्टी में मंजीरिहा हो गये फिर ढोलक और फिर तबला बजाने लगे, साथ-साथ गाने भी लगे। बीच-बीच में कभी किसी कलाकार के न आ पाने जो समस्या होती थी गोविन्द उसकी भूमिका निभाने के लिए मंडली में विशेष हो गये। अब आकस्मिक भूमिकाओं के लिए भी मदन काका, गोविन्द को मंच पर बुला लेते। ऐसी अप्रत्याशित आई भूमिकाओं में निरंतर रच-बस गये और गम्मत के पारंगत अभिनेता बन गये। उन्होंने पूरी शिदद्त के साथ मदन, लालू, ठाकुर राम और भुलवा जैसे कलाकारों की भूमिकाएं निबाही। अब वे गम्मत के सीधे कुशल अभिनेता स्वीकार कर लिए गए, तब से गोविन्दराम की कला यात्रा ने अनेक शिखरों को छुआ और यों कहें तो कुछ नये रंग अर्थों में बहुत आगे तक निकल आयेे।
  
नाचा मंडलियों के ग्राम्य प्रदर्षन और नया थियेटर के बीच भी पारिवारिक कारणों से आते-जाते रहे। इस तरह वे ग्राम्य संवेदना से पूरित नाचा और विकसित हो रहे आधुनिक रंगमंच से लगातार जुडे़ रहने की निरंतरता उन्हें सम्पूर्ण कलाकार के रूप में निखारती ही रही।

हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ की कला प्रतिभा और कलाकारों के सौश्ठव को जाना-पहचाना, उनके चयन से गोविन्दराम निर्मलकर जी 1960 से ‘नया थियेटर’ में काम करने लगे। उस दौरान निर्देषक हबीब तनवीर के नाटक ‘चरणदास चोर’ ने पूरे देश में अभिनय के नये प्रतिमान स्थापित करना आरंभ किया ही था कि अभिनय को अपना धर्म-कर्म मानने वाले गोविन्दराम निर्मलकर ने ‘नया थियेटर’ में नायक की भूमिकाएं की। मदनलाल और द्वारका के बाद आप ऐसे कलाकार थे जिन्होंने इस प्रसिद्ध नाटक के नायक की भूमिका कर अपनी कला का लोहा मनवाया। छत्तीसगढ़ की धरा की जीवन शैली षैली में रंगमंचीय उत्स के दर्शन से कला जगत अभिभूत हुआ और छत्तीसगढ़ी बोली की लयात्मकता और भावों को व्यक्त करने की शक्ति से वैष्विक रंगमंच का भी मान बढ़ा।
दिल्ली थियेटर की पहली प्रस्तुति आगरा बाजार (1954) में सषक्त अभिनय किया। अब आप नाटकों के स्थायी कलाकार बन गये थे। लोकतत्वों से भरपूर मिर्जा शोहरत बेग (1960), बहादुर कलारिन (1978), चारूदत्त और गणिका वसंतसेना की प्रेम गाथा मृच्छकटिकम मिट्टी की गाडी (1978), पोंगा पंडित, ब्रेख्त के नाटक गुड वूमेन आफ शेत्जुवान पर आधारित शाजापुर की शांतिबाई (1978), गांव के नाम ससुरार मोर नाव दमाद (1973), छत्तीसगढ के पारंपरिक प्रेम गाथा ‘लोरिक चंदा’ पर आधारित ‘सोन सरार’ (1983), असगर वजाहत के नाटक ‘जिन लाहौर नई देख्या वो जन्मई नई’ (1990), शेक्सपियर के नाटक ‘मिड समर्स नाइट ड्रीम’ पर आधारित ‘कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना’ (1994) में गोविन्दराम के अभिनय को सराहा गया।
गोविन्दराम जी के अभिनय से नाटकों के पात्र अब अविस्मरणीयता को प्राप्त होने लगे। इस तरह चरणदास चोर के अभिनय की भूमिका के साथ ही खासकर आगरा बाजार में ककडी वाला, बहादुर कलारिन में गांव का गौंटिया, मिट्टी की गाडी में मैतरेय, हास्य नाटकों के लिए प्रसिद्ध मोलियर के नाटक बुर्जुआ जेन्टलमेन का छत्तीसगढी अनुवाद लाला शोहरत बेग (1960) में शोहरत बेग जैसी केन्द्रीय व महत्वपूर्ण भूमिकायें यादगार रही। इन्होंने बावन कोठी के रूप में सोन सागर में सर्वाधिक विस्मयकारी और प्रभावशाली अभिनय किया था।
आप अब रससिद्ध कलाकार होना सिद्ध करने लगे थे। आंखों में उतर जाने वाले यम रूपी क्रोध को, वहशीपन को अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय देने लगे साथ ही शुद्ध उच्चारण और मंच के लिये अपेक्षित लोचदार आवाज से वे पात्रगुण से एकाकार होने और संवेदनाओं को सहज उकेरने की कला में निश्णात् दीखने लगे।
मृच्छकटिकम मिट्टी की गाडी (1978) में नटी और मैत्रेय की भूमिका में चुटीले संवादों से हास्य व्यंग को एक नई ऊंचाई दी और पोंगा पंडित में व्यंग्य की दृष्य कला विधा से प्रदर्षनकारी कला तत्व को नये आयाम दिए।
‘मुद्राराक्षस’: जीव सिद्धि, स्टीफन ज्वाईग की कहानी ‘देख रहे हैं नैन’: दीवान, ‘कामदेव का सपना’ : वसंत ऋतु में परियों से संवाद करने वाला बाटम, ‘गांव के नाम ससुरार मोर नाव दामाद’ (1973) में दामाद की भूमिका, ‘जिन लाहौर नई देख्या वो जन्मई नई’ (1990) में अलीमा चायवाला, ‘वेणीसंघारम’ में युधिष्ठिर, ‘पोंगवा पंडित’ में पंडित की जोरदार भूमिका गोविन्दराम निर्मलकर की कला साधना की सार्थकता की कहानी है।
अंतर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह, एडिनबरा लंदन में ‘चरणदास चोर’ का प्रदर्शन विश्व के बावन देशों से आमंत्रित थियेटर समूहों के बीच हुआ और ‘चरणदास चोर’ नाटक को विश्व रंगमंच का सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया। इस सफलता के बाद इसी नाटक का मंचन विश्व के अन्य सत्रह देशों में हुआ। श्याम बेनेगल ने फिल्म ‘चरणदास चोर’ बनायी जिसमें गोविन्दराम जी ने अभिनय किया।
श्री गोविन्दराम ने रंगकर्मी हबीब तनवीर के निर्देशन में कई सफल नाटकों में मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं। उनमें रूस्तम सोहराब, लाला सोहरतराय, चरणदास 
  
एक समय श्री गोविन्दराम ने अपनी नाचा पार्टी बनाकर चरणामृत, इंग्लैंड वाला और इंग्लैंड वाली गम्मतों की सर्जना की और उनका मंचन भी किया। बीच-बीच में जब रवेली-रिंगली पार्टी सक्रिय थी, तब गोविन्दराम ने उसमें काम किया, फिर मटेवा साज जैसी उभरती नाचा मंडली में भी गोविन्दराम ने काम किया। गोविन्दराम के गंभीर प्रयासों से भी वे छत्तीसगढ़ में अपनी नाचा मंडली नहीं बना पाये और न किसी नाचा पार्टी में अपने आपको अन्तर्निहित कर पाये। इसका कारण वे अपने उच्च स्तरीय अभिनय क्षमता को देते हैं। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ की नाचा मंडलियों में काम करने से मेरा अभिनय सबसे अलग-थलग दिखाई देता है, स्थानीय कलाकार इतनी कसावट के  सामने टिक नहीं पाते हैं अथवा जिस तरह का काम चाहते हैं, उस तरह नये नाचा कलाकार खरे नहीं उतरते हैं। इसलिए गोविन्दराम फिर एक बार हबीब तनवीर के नया थियेटर में शामिल हो गये।

श्री गोविन्दराम निर्मलकर जी छत्तीसगढ़ की नाट्य कला ‘नाचा’ के सशक्त अभिनेता थे। नाचा में विभिन्न चरित्रों को निभाने के कारण गोविन्दराम के अभिनय में कला तत्व से भरपूर आत्मविश्वास सदैव मौजूद होता था। वे नाचा विधा के उन्मुक्त रंग तत्वों को सन्तुलित रूप से प्रदर्षित करते थे। साफ दीखता भी था कि उनके अभिनय का मूलाधार नाचा ही था। नाचा के मूल में अपने परिवेष के ही हास्य और व्यंग की जमीन होती है। इस गुण की साधना से वे कभी विलग नहीं हुए।  गोविन्दराम ने अपने मार्गदर्षक श्री मदन निषाद की रचनाशीलता, श्री लालू की अभिनेयता और श्री ठाकुर राम से चपलता के गुण सीखे और अपनी मौलिक पहचान बनाई। वे पात्र के गुण-धर्म को इस तरह व्यक्त करते कि कलाकार और पात्र का व्यक्त्वि एक दूसरे में घुल-मिल एक हो जाते। राजा- रंक, किसान-नेता, साधु-चोर, सिपाही-सेठ, ग्राहक-नौकर, साहब, गुरू-चेला, उनका अभिनय पात्र को प्रमाणिक हो जी लेता था। वे अपनी शारीरिक भाशा का इस तरह इस्तेमाल में महारत हासिल कर चुके थी कि षरीर-मन-भाव लगभग एक समय में नियंत्रित कर सकते थे। वे हाथ, आँख और चेहरे की स्वाभाविक भंगिमाआंे का भरपूर प्रभावकारी उपयोग करते और उनकी भरावदार आवाज का उतार-चढ़ाव दर्शक श्रोताओं पर अभूतपूर्व असर करता। प्रायः आंगिक चेष्टाएँ और चेहरे की विकृतियाँ, गूढ़ भावों का विस्तर कर, हास्य और विद्रूपता पैदा करती हंै।
  
श्री गोविन्द राम ने निष्चित ही अपनी कला साधना से छत्तीसगढ़ की कला परम्परा के आकाश को वृहत किया है। नाचा-गम्मत के अभिनय संसार को व्यापकता के साथ नई अर्थवत्ता दी है। उन्होंने नाचा के प्रत्येक अंग को स्वमेधा से सौश्ठव प्रदान किया है। वे नई पीढ़ी के कलाकारों में सबसे प्रतिभावान माने जाते गये। उनमें नाचा को नये सिरे से संगठित करने और लोक नाट्य की वर्तमान अवधारणाओं के अनुरूप उसे प्रतिष्ठित करने की क्षमता निर्विवाद रूप से रही।

श्री गोविन्दराम निर्मलकर की उत्कृश्ट कला साधना के लिए अविभाजित मध्यप्रदेश राज्य में अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किया गया है। जिसमें मध्यप्रदेश शासन का लोक कलाओं का सबसे बड़ा तुलसी सम्मान भी शामिल है। नाचा परम्परा के अनुरक्षण और उसे आगे बढ़ाने के लिए श्री गोविन्दराम निर्मलकर ने जो अथक प्रयास किये। उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। छत्तीसगढ़ के नये राज्य के रूप में उदित होने के बाद दाऊ मंदराजी सम्मान से भी विभूशित किया गया। इसके अलावा अनेक सम्मानों से उन्हें नवाजा गया। 2005 से लकवाग्रस्त गोविन्दराम जी को विगत दिनों बहुमत सम्मान मिला तब...

आप प्रतिभा के धनी महान कलाकार थे कि उनका सम्मान करना जैसे खुद को सम्मानित करने जैसा लगता था। छत्तीसगढ़ के कला संसार को समृद्ध करने वाले इस सच्चे छत्तीसगढि़या कलाकार के रूप में तो उन्हें कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने पूरे विश्व में छत्तीसगढ़ की धरती की जीवन संवेदनाओं की, लोक के हृदय स्पंदन की और अपनी लोक परम्पराओं की षक्ति से ग्राम्य जीवन और उसके परिवेश की सहजता को अपनी उच्च अभिनय क्षमता से प्रदर्षित किया साथ ही विश्व को भी परिचित कराया ऐसी इस धरती की सेवा करने वाला अनन्य नहीं दीखता। धरा के सच्चे प्रतिनिधि थे।

वे नाचा का भविश्य थे और उनके मन में नाचा के भविश्य की चिन्ता भी रही पर जैसा वे सुदूर  देशों में कला और कलाकार को दिये जाने वाले परिवेश शा का अवलोकन करते रहे। वैसे ही अपनी धरती के कलाकारों को उपलब्ध कराने की चेश्ठा का मनन करते ही उनका समय बीता। एक कलाकार मन को जिम्मेदारों ने सदा निराश ही किया।

जब जीवन के अंतिम साल को बीतते देख रहे थे तब दर्षकों के बीच तालियां बजाते खुद बच्चे से अधेड़ होते दीखते जाते, संस्कृति के गौरव की थांती सज़ाने वाले लोगों के पास एक मौका था कि इस कलाकार के प्रति कुछ तो अपनी जिम्मेदारी निबाह लें। गोविन्दराम जी का शरीर जवाब दे रहा था। परिवार का बोझ और धनाभाव की पीड़ा भी कम न थी ऐसे कमजोर क्षणों में उन्होंने मानवीय संवेदनाओं की आकांक्षा भी की थी पर जीवन के अंतिम माह में राज्य शक्ति धारित किया हुआ अल्पावधि का पात्र उनसे ही आंखों चुरा रहा था या आखें दिखा गुर्रा रहा था। वे समय को पढ़ पा रहे थे। समय का खर्च होना देख रहे थेे। वह तो हो ही रहा था... ऐसे में वे लोग जो उनके कामों को सहेजने की बात करते रहे वे ही उन्हें व्यर्थ हाथ पसारने विवश करते रहे।
वे जाते-जाते दुखी थे शायद बहुत ही दुखी थे...
उनकी अपनी मृत्यु की खबर अखबार इस तरह देगा उन्हें पता ही नही चला...
पर कला आंसू भर-भर रोई होगी...

इस आलेख में श्री संजीव तिवारी जी के लेख से भी मदद ली गई है। उनका आभार है।

बुधवार, 26 नवंबर 2014

जयदेव बघेल

डाॅ. जयदेव बघेल
बस्तर पर आगत की दृश्टि...

जीवन भर सूर्य की रष्मियों को अपनी भट्टी में उगाकर पीतल को सोने सा चमकाकर उसे कला से संवारते-निखारते जयदेव बघेल,  शिल्प गुरू  64 वर्ष यहां रहने के बाद 9 नवम्बर 2014 को ब्रम्ह महूर्त में सुबह 4.00 बजे सूर्यवार (रविवार) के दिन अपने लोक को लौट गये। तो खबर छप ही गई कि ‘पूरी दुनिया को बेलमेटल आर्ट (बस्तर की घड़वा कला ) से रूबरू कराने वाले शिल्प गुरु जयदेव बघेल नहीं रहे,

जयदेव बघेल
खबर सारांश  यह है कि कोंडागांव। सिंधुघाटी-हडप्पाकालीन शिल्पकला के प्रतिबिंब के रूप में प्रसिद्ध बस्तर की घ़ड़वा अथवा बेलमेटल शिल्पकला के सशक्त हस्ताक्षर शिल्पगुरू के नाम से ख्यात कोंडागांव निवासी डॉ. जयदेव बघेल ने इस घड़वा कला को दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाया था। कला का यह सिपाही धीरे-धीरे व्याधियों और समय के हाथों बाध्य हो गया. मधुमेह की बीमारी के कारण उनका एक पैर अलग हुआ था. इन दिनों भी वे लम्बे समय से अस्वस्थ चल रहे थे तथा डायलिसिस पर थे। रायपुर के रामकृषण केयर हास्पिटल में उन्होंने अंतिम सांस ली। रविवार सुबह उनके निधन की खबर मिलते ही पूरे बस्तर में शोक की लहर दौड़ गई। उनका पार्थिव शरीर दोपहर को सड़क मार्ग से रायपुर से कोंडागांव वापस लाया गया। दोपहर बाद स्थानीय मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार हुआ । उनकी अंतिम यात्रा में काफी संख्या में स्थानीय मित्रगण, संगी, शिष्य, जन प्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक व शिल्पकार शामिल हुए और प्रदेश के मुख्यमंत्री  ने शोक संदेश में कहा कि डॉ. जयदेव बघेल के देहावसान से छत्तीसगढ. में पारम्परिक शिल्प जगत के एक तेजस्वी सितारे का हमेशा के लिए अन्त हो गया है लेकिन उनकी दिखाई रौशनी से राज्य और देश में हस्त शिल्प की गौरवशाली परम्परा हमेशा आलोकित होती रहेगी।

जयदेव बघेल
जहां तक मुझे याद है कि 1990 आदिवासी लोक कला परिषद् की नौकरी में आते-आते ‘मध्यप्रदेश  के घातु शिल्प’ मोनोग्राफ आया था इसे श्री नवल शुक्ल  ने पूरे प्रदेश  में सर्वे कर पूरे मनोयोग से लिखा था। उसमें जयदेव बघेेल का नाम पढ़ा था। उसी दौरान जयदेव बघेेल ने साहिबगिरी की समवेत शक्ति के सामने झुकने को मना किया था। वे अपने कलाकार मन की सुन रहे थे और व्यवस्था उन पर दबाव बना रही थी कि वे बस आदेश  का पालन कर दुम हिलाये। पर बघेल जी ने अपने स्वाभिमान को झुकने नहीं दिया। यदा-कदा रिसकर आती बातों से यह जानकारी तो होने लगी कि बस्तर के लोग बिकते नहीं और झुकते भी नहीं। तब बस्तर को जानने की उत्कंटा मन में बैठ गई।

1990 में काश्ठ शिल्प सर्वेक्षण, धनकुल सर्वेक्षण और मालवा उत्सव, इंदौर के आयोजन के सिलसिले में बस से रायपुर से जगदलपुर जाते-जाते रास्ते के गांव और बड़े वृक्षों से आच्छादित जंगल से अबूझमाढ़ के जंगलों की गहनता का अनुमान लगाता। कोण्डागांव का मतलब कोण्डागांव के जयदेव का घर 'भेलवापारा' ही था हमारे लिए। परिशद् के अन्य अधिकारी भी आरंभ में बघेेलल जी के माध्यम से शिल्पियों से परिचित हो पाये थे। बघेल जी के बारे में सुना था कि वे बस्तर की कला परम्परा को बाहरी दुनिया के लिए सबसे बेहतर पथप्रदर्षक बने रहे थे। विगत तीन-पैतीस सालों के सैलानियों, अध्येताओं के लिए बघेल से मिलना बस्तर से मिल लेना जैसा था। फिर हिन्दी साहित्य विधा के नये नवेले अधिकारियों को बघेल जी के कलाकार मन की स्वतंत्रता और उनका आत्मसम्मान जैसे चुभने लगा। वे लोग उनसे बड़े कहलाना चाहते थे। सो उन्होंने अन्यों को विशषेश कहना आरंभ किया और बात दूसरी दिषा में जाने लगी बस्तर के मूल कलाकारों की उपेक्षा का आरंभ इसी समय से आरंभ हो गया। लोग रायपुर के तथाकथित जनजातीय विषेशज्ञों से आलेख तथा प्रकाशन की पैगे बढ़ाने लगे और कोण्डागांव और जगदलपुर के मूल लोक और जनजातीय साहित्यकार हाॅसिये पर डाल दिये गये।
जयदेव बघेल घर पर शिल्प

घड़वा शिल्पियों में मानिक घड़वा और जयदेव बघेेल बहुत बड़े कलाकार रहे है पर अबके विगत 25 सालों से कोई इनका नाम लेवाल नहीं दीखता था। 80-90 के दशक में धीरे-धीरे श्री जयदेव बघेेल बस्तर के सांस्कृतिक उन्नयन की एक मिसाल बनने लगे थे। उन्हांेने देश के सामने अपनी कला के नये आयाम प्रदर्षित किये। उनके अपने दम पर विविध घड़वा कला प्रदर्शनियाँ आयोजित होने लगी। देश और विदेश में पहिले-पहल जाने का सिलसिला उनके समय ही आरंभ हुआ था।

लोग उनके नाम से उस बस्तर को जानने के लिए आने लगे जो बाहरी दुनिया का आबूझा और पुरातन का अज्ञात लोक था। विदेशी  यायावर, कलाकारों, लेखकों  को जयदेव बघेल की उस चेतना पर पूरा भरोसा था जो अंततः कला के माध्यम से व्यक्ति को संत भी बनाती और हृदय की अंतरंगता से भी जोड़ती। विदेश की भाषाई दूरियों के कायम रहते हुए भी उनके पास अनेक विदेशी शिल्पकार आये उनके पास महिनों रहे, सुरक्षित रहे। उनसे कला दान लिया, उन्हें गुरू बनाया और विदेषी शिष्य बस्तर की घड़वा कला गुणगान करते हुए आभार व्यक्त करते रहेै। यह सब किताबों में पहिले ही लिखा गया है। विदेश में भारत की, बस्तर की, छत्तीसगढ़ की कलात्मक छवि निर्मित हुई।

तो उस दौरान के राज्याश्रृय से मुक्त और त्यक्त हो बधेल जी ने अपने घर के पिछवा़डे ही एक कार्यशाला आरंभ कर ली यह एक आश्रम की तरह काम कर रही थी। देश -विदेश से लोग यहां आ कर पूरे समय रहते हुए पूरे कला परिवेश में निमग्न हो कला साधना करते बस्तर के कलाकारों की तरह ही दक्ष होने लगे। ग्राम के अन्य इस अनूठे प्रयोग से हैरान थे। जब लोगों ने सुना कि बघेल जी को प्रशिक्षण से अधिक आय हुई है तब उनका विरोध होने लगा कि लोग प्रचारित करने लगे कि ’वे कलाकारों का शोशण कर रहे हैं।’ इस बात को बहुत उछाला गया। पर बघेल जी अपनी कला साधना और उसके उच्चादर्ष के प्रति सदैव समर्पित रहे। आखिर उनकी अंतिम इच्छा घड़वा  शिल्प सृजन करते हुए अपने लोक को जाते समय तक जीवन की सार्थकता प्राप्त करने की थी और उन्होंने वह प्राप्त की भी। अब उनमें विश्र्व व्यापने लगा था।

बधेल जी के पास जन्म से ही उनकी अपनी पारिवारिक कला परम्परा का इतिहास था। 1950 में जब भारत में बस्तर की अपनी प्राचीन गणप्रथा इस पूरे देश और उसके संविधान को आधार दे रही थी। तब जयदेव का जन्म कोण्डागांव के तालाब के पार के ग्राम भेलवापारा में हुआ था। पिता सिरमनराम जो स्वयं एक विशिष्ट  शिल्पी थे उनके षिल्प गुरू हुए। बधेल जी ने आठ साल की उम्र से ही घड़वा शिल्प सृजन करना आरंभ कर दिया। ओर उनको विरासत में यह स्थान, परिवेश  और कला सौष्ठव प्राप्त हुआ। इस तरह पुरखों की परम्परा के निर्वाह का गर्व, उसकी रक्षा उनकी अपनी आत्मशक्ति का आधार बन गया था।  

वे बस्तर की कला परम्परा को देखने-समझने और व्यक्त कर सकने की और उसका उन्नयन करने की क्षमता से लैस थे। उनकी आंख कला के वैष्विक विस्तार को देख रही थी। वे कला और कलाकार के सम्मान के लिए बहुत संवेदनशील थे। बस्तर की आदिम कलाओं को जानने और अन्वेषण करने की प्रृवित्ति उनमें सहज थी। आदमी के कलामन को समझने और उसे पैना करने की महारथ उन्होनं शायद बहुत पहिले ही प्राप्त कर ली थी। इसीलिए सबसे कम उम्र के घड़वा शिल्पी होने पर भी वे पुरस्कार के अधिकारी मान लिए गये थे।

2006 को जब मैं छत्तीसगढ़ पर्यटन मण्डल के प्रोजेक्ट के यू.एन.डी.पी. की ग्रामीण पर्यटन योजना के लिए जगदलपुर जिले के मिट्टी शिल्प ग्राम नगरनार, चोकावा़ड़ा के शिल्प ग्राम के आकल्पन और निर्माण के लिए काम कर रहा था और चित्रकोट के भी दण्डामी माडिया परिवेष पर केन्द्रित टूरिस्ट इनफरमेषन सेन्टर के लिए काम कर रहा था। तब रायपुर से आते-जाते श्री जयदेव बघेल से और राम सिंह से जरूर मिलता। तब बघेल जी ने कहा था कि उनके ग्राम के कलाकारों के हिसाब से योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हो रहा था। अनुपयोगी योजनायें ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के उदद्ेष्य से चलायी जा रही थी। कलाकारों की उपेक्षा हो रही है। कोई सरकारी मोटल दूर कही बनाया गया है जिससे उसका लाभ भेलवापारा के शिल्पियों को हो नहीं सकता था। वे दुखी थे।

वे अपने पिता की निर्मित की हुई गुड़ी मंे बैठ अपने पिता के बारे में बताने लगते हैं। वहां लकड़ी की एक बहुत आदिम चेहरे की महिला मूर्ति की संरचना का वर्णन करते हैं कि पहिले इस तरह का काम पुराने समय के बस्तर में होता था। वे बताते हैं कि एक बार तो मैं अकेले ही बस्तर की कला के बारे में जानने के लिए साईकल से निकल पड़ा था। बस्तर के नारायणपुर, कांेटा, सुकमा और सुदूर उनके रिष्तेदार भी थे सो उस बहाने महिनों के उस जंगल-जंगल घूमने के अनेक संस्मरणों को वे बताने लगते बीच-बीच में चुप भी हो कहीं खो जाने...। मैं समझ जाता कि कहने को बहुत बड़े आख्यान मन में है पर दृष्यों के लिए शब्द और समय कम है।
जयदेव बघेल
बधेल जी ने बस्तर के अनेक अन्य कलाओं के कलाकारों को भी आश्रय दिया, सहयोग दिया। पाषाण शिल्प की समाप्त होती परम्परा को बचाने के लिए उन्होंने शिल्पियों को अपने पास रखकर मूर्तिया बनवाई और उसे अपने घर की मुंडेरों, दीवारों पर जड़ सुरक्षित किया। उनका पूरा घर प्रयोगशाला, निर्माणशाला, आश्रम, संग्रहालय, पथप्रदशक और जीवंत संग्रहालय बना रहा। अपने परिवार की कला विरासत की परम्परा बनाये रखने के लिए पूरे घर के सदस्यों की कला यात्रा को उन्होंने एक दिशा दी और अन्य कलाकारों के लिए एक ध्येय प्रदान किया।

बस्तर की जनजातीय कथाओं, संस्मरणों, विविध समयों की समझ के घनी थे। बस्तर पर आ रहे परिवर्तन के नित नये-नये रूपों को समझ रहे थे। आज के 20 वर्शो के बाद के समय की जैसे उन्हें भनक लग गई थी। इसीलिए वे अपनी दुनिया में सिमट गये और अपने कार्य को बाहरी दुनिया से अक्षुण्ण रखने का प्रयास करने लगे। वे कहते थे कि ये नौकरशाह बस्तर की कला परम्परा को एक दिन धन केन्द्रित बना कर नष्ट कर ही देंगे।

उस दौरान अविभाजित राज्य के हस्त षिल्प विकास निगम ने घडवा शिल्पकारों के लिए शिल्प क्रय योजना की क्रियान्विती की जिसके अनुसार षिल्पकारों के शिल्प तराजू पर तौलकर लिये जा सकने की नीति बनी और कुछ कमीषन भी तय हुआ। इससे कला परम्परा एक दूसरी दिशा में मुड़ गई। घड़वा शिल्पी वजन बढ़ाने के लिए अधिक मिट्टी का उपयोग करने लगे, भारी मूर्तियों को बनाया जाने लगा। कलात्मक बारीक मोटिव्ह ने अपने आकारों को बदला और खोया। जल्दी बन सकने वाले शिल्प तैयार होने लगे, कला मूल्य किनारे कर दिए गये। शिल्पों में जनजातीय मान्यता के प्रतीकों का सम्मान नष्ट हुआ। व्यवसायिक संस्थाओं के डिग्रीधारी कला डिजाईनरों ने आकर दूसरे राज्यों के प्रतीकों और आकारों को लाकर शिल्पों को बाजार की आवष्यक्तानुसार बदला।

बस्तर का सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक परिवेष तेजी से बदल रहा था। गाथाओं के जानने वाले और गाने वाले खांसते हुए थकने लगे थे और लगभग चुप हो गये थे। अब वे उस सम्पदा को लेकर जाने वाले थे। मुरियों के घोटुल जो जंगल के भीतर कभी जीवंत थे। विविध दबावों के चलते नष्ट होने लगे या बन्द होने लगे थे। अक्सर ही मंद बनाते हुए लोगों को पकड़ने रोज ही ग्रामों के घरों की तलाशी होने लगी थी। बेरोजगार बढ़ रहे थे। दूर का कभी-कभार का सिनेमा छोटै बाक्स की शक्ल में गांव के समर्थ के आंगन में पूरे गांव की भीड़ से छोटा पड़ता नजर आने लगा था। बाजार बढ़ रहा था। नकली सामान यहां खूब उंचे दामों पर बिक रहा था। देखने-सुनने में आता था कि बाजारों में, ग्रामों में वर्शों से जमे समृद्ध व्यापारियों की सूदखोरी का जाल इस दौरान सबसे मजबूत था। जिसे तोड़ पाना ग्रामों के गरीबी से जूझ रहे मुरियों-माडि़यों के बस का नहीं था।

इस दौरान जयदेव बघेल ने घड़वा सृजन के अलावा वाचिक परम्परा के सरंक्षण का महती कार्य किया। वे अब एक बस्तर के आदिम संसार के प्रस्तोता बन गये थे। विविध संस्थायें और अच्छे लोग उनके कामों से आकृश्ट हुए। जयदेव बघेल ने बेलमेटल की शिल्पकारी बचपन में ही शुरू कर दी थी। अपने हुनर के दम पर शीघ्र ही राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना लेने वाले स्वर्गीय डॉ जयदेव बघेल को उनके शिल्पकारी के लिए देश-विदेश में कई अवार्ड मिल चुके थे।

वर्ष 1977 में उन्हें कला की साधना के लिये शिल्पकला के क्षेत्र में देश का प्रतिष्ठित नेशनल क्राफ्ट अवार्ड मिला था। तब उम्र 24 साल थी। वर्ष 1976 में उन्हें मध्यप्रदेश राज्य से सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 1978 मे जयदेव बघेल के अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी मास्को मे आयोजित की उन्हें अंतर्राष्ट्रीय शिल्पकार माना गया। भोपाल में भारत भवन के उद्घाटन अवसर पर वर्ष 1982 में उन्हें प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी के हाथो शिखर सम्मान प्राप्त हुआ. 1982 में लंदन में आयोजित हुए भारत उत्सव में उन्हे सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ। डॉ बघेल को हाल ही में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से डी.लिट की मानद उपाधि प्रदान की गई थी। रायपुर में नवम्बर 2012 में षिल्पगुरू सम्मान मिला। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय में आप एक बार कला एवं संस्कृति विभाग के सलाहकार पद पर भी रहे हैं।

जयदेव बघेल अन्र्तराश्ट्रीय स्तर के शिल्पी 80-90 के दशक में बन चुके थे। उन्होंने स्कॉटलैण्ड, इटली, जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, हॉगकॉग, सिंगापुर, बैंकाक आदि में घडवा शिल्प की अनेक सफल प्रदर्शनियाँ लगायीं. जो लगभग 35 शहरों में लगी मुख्यतः ये प्रदर्शनियां मास्को, टोकियो, सिंगापुर, रोम, पेरिस, लंदन, आक्सफोर्ड, हांगकांग में लगी। मुंबई के प्रतिष्ठित जहांगीर आर्ट गैलरी में छत्तीसढ़ प्रदेश से सबसे अधिक मौकों पर शिल्प कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाने का श्रेय डॉ जयदेव बघेल को ही प्राप्त है। 22-28 जुलाई 1996 को यहां उनकी एकल प्रदशिनी लगी रही। विष्व प्रसिद्ध मूर्तिकार हेनरी मर विशालकाय धातु प्रतिमायें बनाते थे. उनकी एक राजा-रानी की प्रतिमा जयदेव बघेल को प्रदर्शनी मे देखने को मिली जो बिलकुल बस्तर शैली की थी.
अविभाजित मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद सात बार जिला प्रशासन ने पद्मश्री अवार्ड के लिए उनके नाम की सिफारिश की लेकिन उन्हें यह सम्मान नहीं मिल पाया। पिछले दो साल से उनका नाम लगातार प्रदेश सरकार को इस अवार्ड के लिए कोंडागांव जिला प्रशासन द्वारा भेजा जा रहा था। पर आष्चर्य किन्तु सत्य है कि जितने समय जयदेव बघेल आग की भट्टी के सामने तपते और पसीना बहाते काम करते रहे उतनी ही उम्र (समय) के लोगों को इसी प्रदेश के भेजे नाम से पद्म श्री मिल जाती रही है और तब भी शिल्प गुरू डाॅ. जयदेव बघेल प्रतीक्षारत ही होते हैं।

उनकी घड़वा कला के कद्रदान पूरे विश्व में हैं। वे राज्य की मषीनरी पर आश्रित नहीं रहे। उनके पिता का बहुत सारा शिल्प विदेषों की संग्रहालयो में संरक्षित हुआ है। उनका पूरा परिवार शिल्पकारी के क्षेत्र में सक्रिय है। अब पुत्र और नाती इस कला परम्परा को अपनाये हुए हैं। उन्होंने मृत्यु पर्यंत अनेक लोगों को इस विधा में पारंगत किया। कोंडागांव की एक पूरी बस्ती भेलवापारा आज बेलमेटल कलाकारों की बसाहट है। 1992 में माधवराज सिंधिया ने कोण्डागावं आकर षिल्पग्राम का उदघाटन किया था। बघेल ने अपनी कोशिशों के चलते कोंडागांव को शिल्पग्राम के रूप में पहचान दिलाई। यहां लकड़ी, टेराकोटा, मैटल, पत्थर, बुनकरी, पेंटिंग, बांस शिल्प आदि नौ-दस शिल्पों का प्रषिक्षण दिया जाता रहा। यह उनके अपने पूरे जीवन भर की सार्थक पूंजी है। जयदेव बघेल लगातार काम करते रहे और लगभग पांच दशक तक वे बस्तर की ढोकरा कला का एकमेव चेहरा बने रहे. वे निरंतर प्रदर्शनियाँ आयोजित करते रहे, नयी पीढी के लिये प्रशिक्षण शिविर लगाते रहे और देश विदेश के नियमित अंतराल पर दौरे भी करते रहे। बघेल जी एक तरह से बस्तर के पचास साल के ‘समग्र दस्तावेज’ की तरह हैं।

1982 में उनका आलेख ढ़ोकरा शिल्प विघा पर आया था और टाटा पब्लिकेशन ने भी परम्परागत शिल्पकार किताब पर उनका महत्वपूर्ण विवरण चित्र सहित प्रकाशित किया है। उन पर अनेक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लेख छपते रहे और अभी हाल में घडवा शिल्प पर उनकी पुस्तक का विमोचन श्री रमन सिंह ने राज्योत्सव 2014 के मंच से किया था और तब से नौ दिन बाद उनके चल पढ़ने की बेरा आ गई। श्री राजीव रंजन प्रसाद का कहना ठीक लगता है। ‘ कला कभी कोई युग अस्त नहीं होने देती, और कलाकार कभी मरते नहीं।’ और जयदेव बधेल तो सदा जीवंत ही रहेंगे अपनी कलाकर्म के दम पर...

इस आलेख को लिखने के पहिले मैंने श्री ललित शर्मा ज़ी का ब्लाग ‘शिल्पगुरू डाॅ. जयदेव बघेल नाम ही काफी है’। बस्तर के श्री राजीव रंजन प्रसाद, का आलेख‘ जयदेव बघेल कभी मरते नहीें। नई दुनिया, भास्कर और पत्रिका के लिखे को पढ़ा था। कोण्डागांव के श्री खैम वैष्णव के संस्मरण भी याद आये। इन लेखों से संदर्भ और गति मिली। इन सभी महानुभावों से इस वैचारिक श्रेय को बांटना चाहता हूं।

आगत शुक्ल
16 नवम्बर 2014 रायपुर, छत्तीसगढ़



शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

बैगा अचानकमार के

बैगा अचानकमार के
बैगा
 बैगाओं की सांस्कृतिक धनीभूत भूमि बैगाचक कहलाती है। संयोग से वह नये राज्य बनने के साथ राजनैतिक व्यवस्था के तहत दूर हो गयी हैं। बैगाचक से सांस्कृतिक कला और संस्कृति की लहरें अब भी इस क्षेत्र को झंकृत करती रही हैं। पर लमनी, मुंगेली जिला,छत्तीसगढ़ के बैगा जनजाति के लोगों के लिए वहां की याद अब भी जेहन में बसती है। वे वहां की याद करके बार-बार सिहर उठते हैं कि जनजाति का सांस्कृतिक कालक्रम का परिदृष्य ऐसा था वैसा था।

जनजाति का सांस्कृतिक बैगा जनजाति के कला कौशल को तथा प्रदर्षनकारी रूपों को अन्य जातियों के प्रभावों ने भी प्रभावित किया हैं जो साफ देखा जा सकता है। अत्यन्त संदेवदनषील और एककांतिकता में रमने वाली जाति बहुत सारे मनोवेगों में उलझी सी लगती है। हांलाकि कला और नृत्यों के प्रति उसके आकशर्ण में वृद्धि ही हुई है पर वह इस तरह से है कि जहां कभी पूरा ग्राम ही व्यक्ति से नर्तक और नृत्य में बदल जाता था और आंतरिक शक्ति आवेग इन कलाओं के माध्यम से निकलता था इससे कला भी निखरती थी और जीवन भी कला सौन्दर्य से भर जाता था जनजाति के हिंसक मनोभावों का स्वतः निरोध हो जाता था। 
बैगा नृत्य के लिए
अब धीरे-धीरे बैगा समाज दर्षक के रूप में दीखने लगा है। बैगा ग्रामों में बम्बईया गीतों, या रायपुर के बैगानी करमा गीत इस तरह की स्वर लहरियों में सीडी पर बजाये जा रहे हैं। अन्य भाषा -भाषी गायक अपना फूहड़ संगीत ग्रामों में गुजा रहे हैं। दो अर्थी गीतों की का आक्रमण तो पहिले ही हो चुका है। इन आधुनिक संसाधनों से निर्मित और प्रसारित गीतों का साम्राजय वनांचलों मंे सर्वप्राय‘ गुंजित है। इसका दुश्परिणाम यह हो रहा है कि एक बैगा युवती-युवक अब अपने परम्परागत गीतों को बेझिझक और उन्मुक्ता से नहीं गा पाते।  यह प्रभाव महिलाओं में सियानिनों के कारण कम हो पा रहा है लेकिन बच्चों में जनजातीय परम्पराओं के ज्ञान के प्रति जिम्मेदारी का अहसास कम से कमतर होता चला जा रहा है। बैगाओं की अपनी सामाजिक मूल प्रवत्ति जो ग्राम्य संस्कृति को व्यक्त करती थी। उसके प्रतीक में अनुषासित रखती और एक तरह का जीवन दर्षन भी विकसित करती थी। समाप्त हो रही है।
बैगा साप्ताहिक बाजार
बैगाओं ने साप्ताहिक बाजार मेें आने वाले ऐसे व्यापारी जो विनिमय में सामग्री लेते-देते हैं। उन्होंने बैगाओं के पारंपरिक आभूषणों का विनिमय किया। आज हालात यह है कि बैगाओं के पास नृत्य के लिए सजनें-संवरने के लिए अपने पारंपरिक आभूशणों का अभाव है।
अंगराग की कहें तो बैगा जनजाति जो अपने गुदनों के चमत्कारिक प्रतीकों और ज्यामितिक संरचनाओं के लिए पूरी दुनियां में मषहूर थे। अब वे गुदना गुदवाने से परहेज भी करने लगे हैं। वे अब गोंडी गुदना हाथ पर या पांवों में अंकित करवाने लगे हैं अंगराग की यह अप्रतिम कला शरीर के कैनवास को छोड़ अब किताबों और चित्र या पेंटिग्स के रूप में हमारे घरों या संग्रहालयों की शोभा ब़ड़ाने की सीमा पर आ गयी है।
बैगाओं के पारंपरिक आभूशणों को पारंपरिक हाट बाजार के व्यापारी नहीं बेचने आते, वे दिल्ली के सस्ते, खराब पालिश  के बने जो दो तीन माह में उतर जाते हैं ऐसे आभूषण विक्रय करने आते हैं। इस तरह दिल्ली के बाजारों में जो सामग्री व्यर्थ, चलन से बाहर और पहिनने से शरीर के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालती है। यह सामग्री महिलाओं द्वारा पहिनी जाती है। जिससे उन्हें विविध डिसीज और केन्सर जैसे रोग होने की महती संभावना है।
बैगाओं की परम्परागत पोशाकें जो शादी व्याह में दी-ली जाती हैं। उन्हें पनिकाओं के द्वारा हस्तशिल्प के माध्यम से करघे पर बनाया जाता रहा है। कच्चे माल का मंहगा होना और बढ़ती हुई मजदूरी और पनिकाओं की अपनी जरूरतों ने बैगाओं के पहिने जाने वाले वस्त्रों को अत्यन्त मंहगा कर दिया है। अब बैगा बाजार की सस्ती, चमकदार रंगों से बनी कपड़े का उपयोग करने लगे हैं। इस तरह वस्त्र परिवेश छिन्न-भिन्न हुआ है।
बैगा स्त्री
बैगाओं ने हजारों वषो से एक सहृदयी और शांत जनजाति होने का परिचय दिया है। न तो उन्होंने सेनायें बनायी न युद्ध लड़े बस वे प्रकृति के संग-संग अपने अस्तित्व को सम्हाले रहे। वे शेर की पूजा करते है। अपने को जंगल का पुत्र मानते हैं। वन को समझने की समझ और वनों के बारे में उनकी परम्परागत जानकारी का उपयोग जंगल को बचाने के लिए उपयोग करने का अब अवसर दीखने लगा है।
राज्य वनों में जिन्हे दायित्व सोंपता है वे उस दायित्व के निर्वाहन के लिए वहां मुस्तेैद रहते हैं लेकिन अपनी नौकरी रहते ही उन दायित्वों की प्रतिपूर्ति करते हैं। दायित्य से मुक्त होते ही वनों के प्रति कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। जबकि बैगा अपनी हजारों पीढि़यों से जंगल में रहते जंगल के प्रति अपनी दायित्वों को जीवन रहते पूरा करता है और जाते-जाते अपनी इन पीढि़यों को अलिखित अपेक्षाहीन कर्तव्यबोध कराता जाता हैं। इस तरह बैगा ही वनों के सच्चे सेवक और हितैशी है।
राजधर्म यह है कि वह जनजातियों के परम्परागत काम-धन्धों को समाप्त  न करे। परम्परागत काम धन्धे में लगे लोग बाहरी दुनिया के छल-छन्दों और उसकी रीति-नीति को नहीं समझते। बस वे अपना काम करते हैं उनके ज्ञान का विकास अथवा परिवर्धन, उन्नयन नहीं होता। व्यवस्था सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को पहिले तो बेरोजगार करती है फिर उनके संस्कारों को धूमिल करती है। व्यक्ति इस दौड़ में शामिल हो आवशयक आवष्यक्ताओं के लिए दौड़ता है वह सब भूल जाता है। एकमात्र वस्तुओं के साम्राज्य में उसकी आत्मा खो जाती है। विकास के आंकडों के खेल में हजारों वर्शों की विरासत से बना एक परिवेश दम तोड़ता हैं अंत में जहां जिस खुशी  के लिए आदमी दौड़ता हुआ शायद अपने अंत के समय शांत हो जाता था अब मरते समय भी अत्यन्त व्यग्र और अशांत तरंगों का विस्तार करता इस संसांर में अपनी उदासी और असफलता की तरंगे छोड़ता है। ऐसे में प्रत्येक मानव मन जो इससे तरंगायित होता है। उसके स्मृतिकोश में जा बैठी तरंग उसे किस तरह प्रभावित करती है यह अभी जाना और परखा नहीं जा सकता।
बैगा ग्राम में आगत शुक्ल

समाज विकास के ऐसे पायदान पर खड़ा हो गया है। जहां विकास का मतलब बैकों संख्यात्मक धन शक्ति और औद्योगिक प्रतिभूतियों का संग्रह मात्र रह गया है। सारा विकास आंकड़ों में रच-बस गया है। आंकड़े मानव की सुख और शाति के पैमाने कभी नहीं रहे।
अमेरिका में 90 प्रतिशत नींद की गोलियां खाते हैं तब उन्हें नींद आती है आज भौतिक उन्नित में व्यस्त और मस्त, पूरा संसार अपने गुजरे हुुए कल की टीसें भुलाने के लिए न जाने किस-किस तरह की चीजों का सहारा लेते हैं। पर प्रेमी, नर्तक या कवि होने के लिए उनका सारा प्रयत्न अधूरा ही होता चला जाता है।

बैगा प्रकृति के पास हैं...दुनिया एक दिन उनसे सीखने के लिए उनके पास आ ही बैठेगी तब तक हम इन बैगाओं के परिवेश समाप्त न होने दें।   

आगत शुक्ल

मिट्टी बाई-छत्तीसगढ़ी पौराणिक भित्ति उद्रेखण कला

छत्तीसगढ़ की पौराणिक भित्ति उद्रेखण कला

मिट्टी  बाई-जिनके हाथों से पौराणिक मांगलिक सौंदर्य झरता रहा...
 
मिट्टी बाई, छत्तीसगढ़,भित्ति उद्रेखण
मिठ्ठी बाई छत्तीसगढ़ अंचल की भित्ति कला की विलक्षण कलाकार रहीं हैं। मिट्टी बाई गढ़ उपरोढ़ा, कठघोरा, बिलासपुर को उनके विशिष्ट कलाकर्म के लिए उन्हें लोक रूपांकर कलाओं के लिए वर्ष 1989-90 का मध्याप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के शिखर सम्मान से विभूषित किया गया। उनकी भित्ति कला भारत-भवन, मानव संग्रहालय और देश की राजधानी के अनेकों कला संस्थानों में संरक्षित की गई है। मिट्टी बाई छत्तीसगढ़ की गौरव हैं।

कला, जीवन को अपनी कसौटी पर परख चलती है। रंगों की एक नदी के जैसी बहती है हृदय में। सराबोर हो तो आप संसार को ऐसे देखने लगते हैं जैसे वह एक कैनवास हो। रंगों की यह नदी प्रकृति के विविध किनारों पर सौन्दर्य बिखेरती उस विराट की याद में बहते-बहते उस समुंदर में जा मिलती है। जहां जीवन की पूर्णता है और शायद मोक्ष का सबसे निकट तीर्थ भी।

कहते हैं घर में बेटी पैदा हो तो घर जैसे एक झींनी चदरिया ओढ़ लेता है, प्रकृति जैसे एक भविष्य को गढ़ने उतावली हो उठती है, लगता है कि संगीत कोई अपना प्रिय छन्द गा रहा हो। बेटी कभी फूल तो कभी सुगन्ध जान पढ़ती है और हां बेटी जब भी आती है कुछ न कुछ तो अज्ञात लोक से ऐसा कुछ तो ले आती है जो इस पुरातन संसार में सबसे नया होता है।

छत्तीसगढ़ अंचल की एक ऐसी बेटी की याद करता हूं तो बरबस मिट्टी बाई की याद हो आती है। मिट्टी बाई ने छत्तीसगढ़ अंचल में प्रचलित परम्परागत व पुरातन, मिट्टी से उद्रेखण की कला को नया आयाम दिया है। मिट्टी बाई के परिवार में उनकी अपनी बुआ घर में और आसपास के गांवों में जाकर भित्ति अलंकरण बनाती थी। इस पारिवारिक वातावरण ने मिट्टी बाई को बचपन से ही कला की ओर प्रेरित किया। जब वे सात-आठ बरस की थी तभी से वे इस कला परिवेश से मन में कला के अंकुर विकसित होने लगे थे।

मिट्टी बाई
बिलासपुर जिले की कठघोरा तहसील के घरी-पखना ग्राम के त्यौहार परिवार में मिट्टी बाई का जन्म हुआ और बारह साल की इस छोटी उमर में ही गढ़उपरोढ़ा के विश्वकर्मा परिवार में ब्याह हो गया। ससुराल में मिट्टी से जुड़ाव सतत् रहा। जब तीन बेटियां हुई और जब छोटी बेटी सात बरस की हुई तभी पति चल बसे।

तीन बेटियों का पालन-पोषण, शादी-विवाह की चिन्ता में वे घर-घर जाकर भित्ति अलंकरणों को बनाती इससे उनका शौक भी पूरा होता और परिवार भी चलता लेकिन केवल भित्ती अंलकरण बनाकर अपने परिवार का खर्चा पूरा नहीं हुआ तब मजबूरन उन्हें भिक्षावृत्ति को अपनाया। मिट्टी बाई के हाथों से बने देवता प्रतीक्षा करते रहे मिठ्ठी बाई की चाहना की। लेकिन मिठ्ठी बाई ने उन्हें भी यह मौका नहीं दिया, बस सृजन का ईश्वरी भाव और स्वभाव उनमें सदैव सदा व्यक्त रहा। जीवन के कर्म और धर्म में जिस कर्मठता से उन्होंने अपनी जीवटता का प्रदर्शन किया वह छत्तीसगढ़ अंचल की नारियों के लिए एक आदर्श हो सकता है।

बिलासपुर और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में भित्ति अलंकरण बनाने वाले कलाकारों को ‘बढ़ई’ कहा जाता है। नये गृह का निर्माण हो, शादी व्याह हो, पर्व त्यौहार हो घर की सजावट के लिए ‘बढ़ई’ को आमंत्रित किया जाता है और उस दौरान पारिश्रमिक स्वरूप घान और राशि भी दी जाती थी।

भित्ति उद्रेखण , मिट्टी बाई छत्तीसगढ़
बिलासपुर जिले के ग्रामीण अंचलों में लोक और जनजातियों के घरों की दीवारों पर मिट्टी से कलात्मक आकृतियों के उद्रेखण की पुरानी परंपरा रही है। घर की दीवारों, खिड़कियों और दरवाजा के आसपास बनये जाने वाले रूपांकनों में हनुमान, शकर, कृष्ण, गणपति की मूर्तियां विशेष उल्लेखनीय है। जो मंगल-कामना के लिए बनायी जाती हैं। पशु-मूर्तियों में हाथी, सिंह, घोड़ा, नन्दी, हिरण बंदर आदि। सिंह ओर बाघ शक्ति के प्रतीक हैं, वे शक्ति की देवी के वाहन के रूप में पूज्य हैं। घोड़े, गति एवं शोर्य  के प्रतीक हैं, अतः वे वीर योद्धाओं के वाहन के रूप में मान्य हैं। पक्षियों में तोता, मैना, मयूर, मुर्गा, चिड़िया का उद्रेखण घर में सुख समृद्धि की कामना का प्रतीक है। इनके अलावा खजूर, कदम्ब, लताएं, बेल, कमल, केला और नारियल के वृक्ष तथा भांति-भाति के मांगलिक चैक बनाये जाते हैं। नये घर का निर्माण अथवा किसी पर्व-त्यौहार पर भित्ति अलंकरण बनाना शुभ माना जाता है।

मिट्टी  बाई बताने लगती हैं कि कन्हारी मिट्टी में धान का भूसा मिलाकर रात भर उसे पानी में भिंगोकर आकृति बनाने लायक गारा तैयार किया जाता है। सबसे पहिले भित्ति को गोबर से लीपा जाता है। गारे से त्रिकोणात्मक ज्यामिती आकर से बार्डर तैयार की जाती है। पश्चात् गृह स्वामी द्वारा बताये गये देवी-देवता की आकृति बनाकर उसका पूजन किया जाा है। आकृतियों के सूखने के बाद उन पर गेरू, पीली मिट्टी, काली मिट्टी या नील से रंग भरे जाते हैं। कभी-कभी खडिया मिट्टी से ही आकृति को रंगा जाता है। एक कपड़े के टुकडे को ब्रश की तरह बनाकर रंग रंगा जाता है।

मिट्टी  बाई के उद्रेखण कार्य को देखने से लगता है कि धार्मिक विश्वासों और सामाजिक मान्यताओं के प्रति निष्ठा ओर प्रतिबद्धता से ही उनकी कला को नये आयाम मिले हैं। उनकी आस्था का बोध उनकी कला में व्यक्त होता है। लगता है सारा देवलोक मनुष्य की कल्पना सृष्टि का ही हिस्सा है जिसमें आदमी ने अपने अनुभवजन्य, परिकल्पित सौंदर्य, जीवन मूल्य और आस्था को प्रक्षेपित किया है। मिठ्ठी बाई के उद्रेखणों में हमारा सनातन पौराणिक समय, दीवारों पर मिट्टी के विविध उभारों से बार-बार कथा और आख्यानों को नए तरह से दिखाता-सुनाता है। उनकी सृजन शक्ति कल्पनाशीलता, तकनीकी दक्षता और रूप बोध से छत्तीसगढ़ की इस परम्परागत कला को नया अर्थ और विलक्षण सौंदर्य बोध मिला है।

परिषद् से जो व्यक्ति मिट्टी बाई से संपर्क और उन्हें लेने जाने के लिए गया था उसके लिए वह दुरूह यात्रा साबित हुई थी उसकी सुनाई कहानियों को हमलोग मजे लेकर सुनते थे। वह शार्टकट के चक्कर में पहाड़ के रास्ते गया तो वहां रीछ बैठे मिले फिर लौटा और फिर सुबह गया और जाने कितने सांप और बिच्छुओं से भी सामना हआ। जब मिट्टी बाई शिखर सम्मान लेने भोपाल आई तो पहले परिषद्, भोपाल में उनका आना हुआ था। उनके अत्यंत विनम्र सहज-स्वभाव-सरलता और आत्मीयता ने हम सभी को अपने अर्तमन में झांकने के लिए विवश किया था। वह समय और भाव अब भी मुझे याद है। 


सोमवार, 30 जून 2014

सोनाबाई रजवार


सोनाबाई रजवार, छत्तीसगढ़
सोनाबाई, जी हां भारत की बेटी के तौर सोनाबाई की कला का जादू पूरे विश्व में अपने शीर्ष पर आया है। दरअसल सोनाबाई ने अपने घर के आंगन और गांव के चबूतरे पर बैठ अपने चिंतन से उस चित्रांकन को आकार दिया जो शून्य की समाधि से उतर कर आया ऋषि का मन व्यक्त करता है। अभिव्यिक्ति और चेतना के जाने किस पटल पर देखे चित्रों को सोनाबाई ने भौतिक दुनिया पर उतारा, यह देखना जो है और उस देखे हुए को दिखाने की कला में सोनाबाई ने जो महारथ हासिल की है उसके चलते वे भारत की सच्ची बेटी के रूप में आज प्रतिष्ठित हुई हैं।
आगत agat

सोनाबाई के मेरा संबंध दृश्य और दृष्टा का है। 2003 में सरगुजा के इन कलाग्रामों में चला आया था। पहिले कभी 1992 में भी आदिवासी लोक कला परिषद् के काम से पुहपुटरा आना हुआ था पर वह यात्रा सरकारी थी। परिषद् कभी किसी प्रदर्शनी या स्टेज के सौन्दर्य के लिए उन्हें आमंत्रित करती। तो 2003 में ग्राम मेन्ड्रा के पास उतर में सुन्दरी बाई के घर की ओर पैदल ही चल पढ़ा, रास्ते में मिट्टी के अलग अलग रंग देखे तभी लगने लगा कि सोनाबाई के रंग संसार में आ गया हूं। सुन्दरी बाई के घर पर श्री बजरंग बहादुर जी आ गये वे मुझे अपनी मोटरसाईकिल पर बिठाकर सोनाबाई जी के घर ले गये, कैमरे से मैं फोटोग्राफ खीचता तो वे जैसे सुरमयी दीखती। वहां से आत्माराम, भगत और फिर दिलबसिया और दिलभरन से मिला। वह यात्रा मेरे जीवन की एक अविस्मरणीय यात्रा बनी।

सोनाबाई भारत की उन महिलाओं में से एक हैं जिनका संसार दूसरों से कुछ अलग नहीं रहा था। सरगुजा अंचल में अंबिकापुर के समीप के केनरापारा गाँव में सात बहन-भाईयों के बीच एक भरे पूरे रजवार कृषक परिवार में जन्मी, पली-बढ़ी और १४ साल की उम्र मे ही सात किमी दूर के गांव पुहपुटरा में ब्याही गईं। बिना सास का ससुराल मिला। ससुराल में आते ही एक अनुशासित स्त्री का चरित निबाहना पढ़ा। पति होतीराम की खेती-बाड़ी में संलग्नता ने सोनाबाई को एकांतिकता और अतःकरण के विचारों के प्रकटीकरण के लिए गहन दृष्टि विकसित की। ऐसे समय उन्हें अपनी मां के वे बहुत सारे जीवन कर्म और धर्म के विविध पक्षों की याद आती और इस सतत् याद ने उनके कलामन में प्रकृति के विविध दृश्यांकन का विविध संसार व्यक्त होने की कोशिश करने लगा।

जातिगत परिवेश ने रजवार घर को एक नये नजरिये से देखा है और अंचल की स्त्रियां अपने दैनिक कर्म में आवास को स्वच्छ रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह उनका बचपन से देखा हुआ संसार और उसका अपना दैनिक कर्म है। लेकिन यह केवल जरूरत की आवासीय व्यवस्था तक सीमित है इसमें दीवारों को सुन्दर तरीकों से सजाना, भूमि को ज्यामितिक आकार देते हुए रेखांकित करना। और अधिकतम द्वार पर बंदनवार जैसी व्यवस्था कर सकना है।

सोनाबाई ने दीवारों की प्रकृति को बदला और उसकी जगह सुन्दर कलात्मक जालियों की परिकल्पना की उन्हें अपने बचपन से देखे हुए प्रकृति के विविध विस्तार वृक्ष, बेल, पत्ती बंदर, चिडिया, हिरण, और न जाने कितने अपने देखे दृश्यों से चित्रित किया। घर के हर कोने में किसी प्राणी या पक्षी को उसके हेतु स्थान बांटने में सोनाबाई के हृदय की विशालता को देखा जा सकता है। सोनाबाई ने बाहर की बहुत बड़ी दुनिया में ऐसा जो जो बचाये रखने के लायक है अपने इस घर के संसार में जैसे बचाकर रख लिया है। शायद वह भावना कुछ वैसी ही रही हो कि यह पृथ्वी वैसी ही बनी रहे जैसे हमें मिली थी और वैसी ही हमारी पीढ़ियों को उपलब्ध हो। यह तो वैदिक ऋषियों का विचार है।
सोनाबाई और  दरोगा रजवार , रजवार वाल पैन्टिन्ग 

तो अब सोनाबाई लगभग 52 साल की हो गई। गांव के लोग उन्हें स्थितप्रज्ञता में केन्द्रित देखते। उनके हाथों के शिल्पों का नर्तन, चेहरे की भाव-भंगिमा बरसस मोहती। ऐसे शिल्पों को जब उन्हें नाचते गाते झूमते पुतले बनाते और अपने घर में सजाते देखते तो कहते इससे घर मेें भूत-प्रेतों का वास हो जायेगा। इस भावना ने सोनाबाई की कला को पड़ोस की यात्रा भी नहीं करने दी। पर सोनाबाई अपने में रत रहीं।

भारत भवन बन रहा था 1982 का समय मध्यप्रदेश की कलाओं के लिए नई उम्मीद और विस्तार लेकर आया था भारत भवन में कलाओं का घर बनाया गया और इस घर के लिए सरगुजा की कला सामग्री के एकत्रीकरण दल ने पिल्खा पहाड़ की तराई में बसे पुहपुटरा  ग्राम की गलियों से गुजरते हुए सोनाबाई के घर का दरवाजा खटखटाया। घर के आंगन में घुसते ही कला विशेषज्ञों की आंखों चैधिया गई। इस क्षण से सोनाबाई के कला संसार की ख्याति पूरे देश और दुनिया को जाने वाली थी। गांव में हलचल हुई। सोनाबाई के हाथों के शिल्प दीवारों निकाले और भारत भवन की कलादीर्धा तक पहुंच देश के सामने आये। उन्हें सम्मान मिला, राष्ट्रीय सम्मान भी मिला।
सोनाबाई का घर, puhputra
सोनाबाई घर लौट आई फिर वही समय लौट आया। घर का कैनवास फिर सफेद हो गया था अपने शिल्पों की फिर-फिर याद जाने कब तक उन्हें उदास करती रही। सम्मान से मिला उत्साह जरूर मिला पर और शिल्पों के संसार का यों च्युत हो जाना उन्हें अखरता। वे फिर शिल्पों के निर्माण में जुट गई। अब उन्हें विदेशों से बुलावा आने लगा। देसी लोग आते भोपाल से दिल्ली से और विदेशी लोग आते देश के बाहर से। उन्होंने फिर अपना कला संसार रच लिया उसे रंग लिया।

गांव के लोग अब उन्हें बहुत सम्मान देने लगे। गांव के लोग देखते कि देश और विदेश से आये लोग कैसी-कैसी मीठी मीठी बातें करते, कैसे-कैसे वादे करते, और जाने कैसे कैसे प्रलोभन भी देते। अकसर सभी उन्हें देने के नाम से आते पर उनकी आखों में लेने का भाव किन्हीं कोने में छिपा अक्सर दिखता। इस तरह सोनाबाई अपना संसार और अपना समय सभी को बांटती रहीं। उन्हें किसी से कुछ ज्यादा चाहिए भी नहीं था। उसके पास अपना रचा जैसे सब कुछ था।

1983 में सोनाबाई को पहिले राष्ट्रीय सम्मान मिला और में प्रशस्तियां लिखी गई पढ़ी गई, सम्मान फलक और राशि दी गई। तीन साल पश्चात 1986 में मध्यप्रदेश शासन का तुलसी सम्मान मिला। सोनाबाई के सम्मान में प्रशस्तियां लिखी गईं और पढ़ी गई। चैमासा में डेढ़ दो पेज के आलेख लिखे गये और मध्यप्रदेश शासन ने सम्मान फलक दे राशि दी। अब वे शासकीय समारोहों की शोभा बन गई। उनके चेहरे की झुरियां उनके मर्म को दिखाती और कांपते हाथों का स्पर्श एक संदेश देता लगता। उन्हें शिल्प गुरू सम्मान और ने छत्तीसगढ़ राज्य में दाऊ मंदराजी सम्मान मिला। सोनाबाई अब भी शासकीय बुलावे पर वैसे ही शिल्प बनाने जातीं, वैसे ही काम करती, कभी धूप में, तो कभी गर्म हवा के थपेड़ों के बीच भी। बड़ा कलाकार होने के रंग-ढंग के प्रदर्शन से कोसों दूर थी। अब वे सरगुजा की कला की एक जरूरी कलाकार बन गईं थी। पर...
आत्माराम मानिकपुरी, रजवार चित्रांकक ,सरगुजा, छत्तीसगढ़ 

उनकी इस परम्परा को उनके अपने बेटे दरोगाराम रजवार और पुत्रवधु राजनबाई ने भी अपनाया। गांव के बुधराम कलाकर्म में सदैव उनके सतत् संगी रहे। पड़ौस पुहपुटरा में ही बचपन बिताने वाली सुन्दरीबाई जो सोनाबाई के शिल्पों को देख कलानवअंकुर जगाती रहीं। वे भी विवाहोपरान्त सोनाबाई के व्यक्त संसार और उनकी प्रसिद्ध से अभिभूत हो इस कला की दुनिया में आई और अपने मनमोहक काम से अपना नाम स्थापित किया उनके पुत्र-मानीलाल और पुत्रवधु बीवी बाई इसको परंपरा में दीक्षित किया। पास ही के ग्राम रनपुर कला की दिलबसिया यादव और उनके पति दिलभरन, पुत्र संतोष ने भी उनकी कला से नये प्रतिमान गढ़ना आरंभ किया। आसपास के ग्रामों के विविध घर इस कला वैविध्य से अपने घर को भी इस कला से सजाने लगे। ग्राम मेन्ड्रा के पास के उदयपुर ढ़ाब ग्राम के आत्माराम जो कभी बचपन में सोनाबाई से उनसे रूबरू हुए थे और तभी से इस कलाकर्म को अपनाया था आज रजवार कलात्मकता के विशिष्ट सृजनकर्मी हैं।  घसिया जाति की पार्वती बाई ने शिल्पों में महारत हासिल की ओर भगत ने जाली शिल्प को दीवारों पर अंकन करने में नाम कमाया है।

देश में सोनाबाई के नाम पर पहला सम्मान सुदूर समुद्र तक के किनारे पर स्थित केरल ललित कला अकादमी, केरल द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य के सरगुजा जिले की प्रसिध्द भित्ती चित्रकार स्वर्गीय श्रीमती सोना बाई रजवार के नाम पर सम्मान स्थापित किया है।  सरगुजा के कला विशेषज्ञ श्री बजरंग बहादुर सिंह ने इस कला को बनाये रखने के अनेक प्रयत्न किए थे। कलाकारों का उत्साहवर्धन और इस कला के बारे में सर्वेक्षण उनके जीवन का सार्थक कार्य था।

सोनाबाई के साथ श्री स्टीफन पी. ह्यूलर Stephen p.Huyler,

प्रसिद्ध अमेरिकी समाजशास्त्री और मानवविज्ञानी, फोटोग्राफर श्री स्टीफन पी. ह्यूलर (Stephen p.Huyler)जो पर्यटक के रूप में विविध कला सर्वेक्षण करते हैं। ह्यूलर ने एक किताब के लिए रिसर्च के दौरान भित्ति चित्र कला की प्रतिनिधि कलाकार और शिल्प गुरु सम्मान पा चुकी सोनाबाई की कला को पहचाना। वे 37 सालों से देशभर में यात्राएं कर रहे हैं। ने सोनाबाई के बारे में सुना तब वे 2007 के आसपास सरगुजा के इस छोटे से ग्राम पुहपुटरा चले आये। उन्होंने यहां कलाकारों के बीच रहकर सोनाबाई के जीवन पर विविध संकलन करना आरंभ किया। हजारों फोटो खींचते, अलग-अलग मौसमों के छायाकन, रजवार कला की विविध कलाकृतियों को निर्मित करवाकर उन्हें खरीदा और अब वे अमेरिका और अन्य यूरोप के देशों में रजवार कला कला प्रदशिर्नी के रूप में परिचित करा रहे हैं। उनकी बनाई डॉक्यूमेंट्री फिल्म डीवीडी में उपलब्ध है। 'सोनाबाई' शीर्षक के नाम से प्रकाशित किताब पूरे संसार को उपलब्ध है।
सोनाबाई पर किताब


(Stephen p.Huyler,) स्टीफन पी. ह्यूलर की पहल पर कैलीफोर्निया के सेन डियागो स्थित त्रिगेई इंटरनेशनल म्यूजियम में जुलाई 2009 से फरवरी 2010 तक छत्तीसगढ़ के रजवार भित्ति चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। यह प्रदर्शनी न्यूयार्क के दुग्गल विजुअल साल्यूशन के साथ मिलकर लगाई गई और वहां सोनाबाई के गांव से एकत्र तस्वीरों के अलावा इस कला पर बनी फिल्में भी प्रदर्शित की गईं। बताते हैं, इनकी लोकप्रियता को देखते हुए अमेरिका की अन्य जगहों पर भी प्रदर्शनी लगाई जाती रहेगी।

शंपा शाह लिखती हैं कि अभी चार-छः माह हुए पता चला कि सोनाबाई नहीं रही. दो वर्ष पूर्व जब मैं सरगुजा, उनके घर गई थी तो वे मुझे अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठी मिलीं थीं. बरसात के दिन थे, घर के बेटे-बहु बल्कि आसपास के सारे स्त्री-पुरुष खेतों में रोपा लगाने गए हुए थे. सोनाबाई, सामने फैले खेतों के विस्तार को देखती हुई चबूतरे पर प्रकृतिस्थ बैठी थीं- वैसे ही जैसे खेतों के उस पार पिल्खा पहाढ़ बैठा था.













शुक्रवार, 13 जून 2014

बसदेवा छत्तीसगढ़

बसदेवा कथा गायकों की सबसे बड़ी बस्ती चिरहुलडीह, रायपुर में हैं जहां लगभग 800 बसदेवा परिवारों का निवास हैं इनमें से लगभग 200 कथा गायकों ने अपनी कला परम्परा का निर्वाह करते हुए छत्तीसगढ़ को कथा, आख्यानों से लगातार गुंजित किया है।
छत्तीसगढ़ के निरगुनिया कबीर पदों के संकलन के लिए 1984 में रायपुर के आमापारा चैक पर चिरहुलडीह के निकट रहने वाले गायकों ने बताया था कि पास ही बसदेवा समुदाय के लोग रहते हैं। जो किसी समय कर्वधा से स्थानांतरित हुए थे और छत्तीसगढ़ अंचल में उनकी सबसे अधिक संख्या इसी चिरहुलडीह बस्ती में

है.. तब बात आई-गई हो गई थी।

बसदेवा कथा गायक
रायपुर में कला विमर्श 2014 के दौरान संस्कृति विभाग में प्रदेश के कलाकारों के अधिकारों की चर्चा के बीच मुझे चिरहुलडीह के असली कथा गायकों की याद आने लगी और एक ''मैं चिरहुलडीह में रह रहे बसदेवाओं के घरों की ओर चल पड़ा।

विजय चैक से दुर्ग की ओर जाने वाली सड़क पर जाते हुए आमापारा के आगे सब्जी बाजार से लगा हुआ रामकुंड मोहल्ला है। इसके आगे जाने पर चिरहुलडीह मोहल्ला दीखने लगता है। नये नवेले लोग इस नाम को लगभग नहीं जानते हैं पर कभी इसे बसदेवा पारा भी कहा जाता था। पुराने रिक्शे वाले ही इस मोहल्ले की स्थिति परिस्थिति को बता पाते हैं। सो उनसे ही पूछकर ही में वहां तक पहुंच पाया।

हीरोहांडा की ऐजेन्सी की बाजू की गली से जायें तो एक दूसरी ही दुनिया दीखने लगती है। गली के दायें तरफ की सपाट दीवार और बायें तरफ सांस लेता जीवन, छोटे-छोटे डिब्बेनुमा मकानों की तंग गलियां, गलियों के पतलेपन के आकारों में सिमटे दुबले-पतले बच्चों के खेलते-कूंदते नगें पावों की आहट और किलकारियों से गूंजता मोहल्ला लेकिन, आदमी के पसीने और सघन बसाहट से उपजी गंध शहर को इससे अलग करती महसूस होती है।

आगे जाने पर पीपल के विशाल वृक्ष के नीचे नये निर्मित  शीतला मंदिर दीखता है और उसके दूसरे बाजू पान की दुकान पर पूछने पर कि क्या यही बसदेवाओं की बस्ती है। वह कहता है कि हां ये जो सीमेन्ट गेट देख रहे हो यही है से है बसुदेव की बस्ती,

बसुदेव की बस्ती का द्वार अभी कुछ दस-पन्द्रह साल पुराना है सीमेंन्ट से निर्मित है। उस पर लिखा है "'जय मां काली मंदिर बसदेव पारा' मंदिर का पत्थर बताता है कि यह मंदिर 13 नवम्बर 1879 विक्रम संवत् 1936 माघ कार्तिक कृष्णपक्ष तिथि चतुर्दशी दिन गुरूवार को सिपाही लाल वासुदेव द्वारा प्रतिष्ठित किया गया था। बाद में 1997 में इसका जीर्णोद्वार किया गया। मंदिर में काली माता विराजित हैं। मंदिर में ही पीपल का पेड़ उगा है और शिव की पिंडी पूजित है।

बसदेवा स्थायी आवास वाले किन्तु भ्रमणशील चरित गायक हैं। भारतीय संस्कृति के आदर्श-उदात्त और नैतिक चरित्र बसदेव गायकी के आधार हैं। अत्यंत पिछडी दशा और अभावों में जीवने के बावजूद ये सदियों से अपनी गायकी के माध्यम से जनमानस को शिक्षित और संस्कारित करते रहे हैं। जीवन के उदात्त मूल्यों की रक्षा के साथ उनका पोषण और संर्वधन करते रहे हैं। आज बदली हुई परिस्थिति में भी ये ऋतु चक्र के साथ अपने निश्चित पारंपरिक जीवन कर्म में रत हैं। अपने एकमात्र गायन कम्र के प्रति ये शंका और पुनरावलोकन के दौर से गुजर रहे हैं बावजूद इसके अधिसंख्य बसदेव स्वयं के काम के प्रति अटूट विश्वास और गहन आस्था के कारण सामाजिक सरोकार का निर्वाह कर रहे हैं।

'हरबोले' और 'जय गंगान' बसदेवा गायकी की टेक से लिए गये शब्द हैं इन टेकों को गायकी में इस्तेमाल के कारण बसदेवों को हरबोले ओर जय गंगान के नाम से अभिहित किया जाता है। भटरी, भाटगिरी से बना है और बाभन कर्मगत विशेषण हैं। बसुदेव के भजन कीर्तन करने वाले लोग बसदेवा कहलाये किन्तु वे बसदेवा जो श्रवण कुमार की गाथायें गाते हैं। वे बसदेवा के अंतर्गत श्रावणी ब्राम्हण कहलाते हैं।
रामकुंड तालाब

बसदेवा गंगा नदी के किनारों के पुरातन निवासी रहे हैं। वैदिक काल में यज्ञ में के विविध अनुष्ठानों के बीच बीच आख्यानों की परम्परा थी। लगभग 36 आख्यान तो गाये ही जाते थे। इस तरह राजस्थान से चली लोककथाओं, गाथाओं की धारा पूरे गंगा क्षेत्र में फैली। प्रदेश में फैली महामारी के भंयकर रूप से प्रत्येक जाति के लोगों ने पलायन किया और इसीलिए बसदेवा बधेलखण्ड की भूमि पर प्रवेश करते हुए गोंडवाना की धरती पर अपनी गाथाओं को गंुजाने लगे। पश्चात भौरमदेव की छाया में लम्बे समय तक पीढ़ियों का सरंक्षण हुआ। रायपुर के क्षेत्र की धार्मिक भाव प्रवण जनता के आदरभाव से प्रभावित होकर कर्वधा से बसदेवाओं के समूह रायपुर के रामकुंड तालाब के पास एकत्र हुए और यहीं का आवास उन्हें भाया आखिर रामकुंड तालाब के पास के विविध धार्मिक स्थल में पंचेश्वर महादेव मंदिर, गोरखनाथ महादेव, औघड़नाथ महादेव तथा भूतनाथ महादेव मंदिर के मंदिरों में गूंजती भक्ति धारा ने बसदेवाओं के लिए एक आदर्श स्थान सिद्ध किया और वे स्थायी रूप से यही बस कर छत्तीसगढ़ के सुदूर ग्रामों तक अपने यजमान खोजने लगे और परिवेश को संगीत और आख्यानों से सत्यालोक से परिचित कराने लगे।

पंचेश्वर महादेव, रामकुंड
पान की दुकान पर ही बजरंग से मुलाकात होती है वे मंदिर तक मुझे ले आते हैं। मैं कैमरा से चित्र लेता हूं तब तक बस्ती के कुछ लोग आ मदिर के पटिये पर जमा हो जाते हैं। मजमा लग जाता है मैं बैग से कापी-पेन निकाल उनसे चर्चा करने लगता हूं।

बजरंग प्रसाद वासुदेव बताते हैं कि हम लगभग 200 साल से इस बस्ती में रहते हैं हमारे पूर्वज भी कर्वधा  से यहां स्थानातरित हो यहां पहुंचे थे। तब यहां बस रामकुंड तालाब था जिसके चारों ओर आम के विशाल वृक्ष थे वह आमापारा भी कहलाने लगा था। तब यहां से रेल्वे की लाईन देखी जा सकती थी। अब यहां लगभग 800 परिवार रहते हैं। हर घर में लोग अधिक हो गये। जगह की कमी हो गई है। कुछ परिवार चंगोरा भाट रहने चले गये। छत्तीसगढ़ में उनकी जानकारी में पिथौरा, चैरेंगा, मुसुआ में, बछेरा, नवागांव, अकलतरा, धमतरी, कांकेर में कुछ अशतः सरगुजा के अंबिकापुर में में केदारपुर के पास इनकी बस्ती है। कुछ बसदेवा बस्तर में भी हैं। मलाजखंड के पौनी, महाराष्ट्र के वर्धा में भी वासुदेवाओं की बस्ती बसी है।

बसदेवाओं का मुख्य कर्म गायकी है और अशतः व्यवसाय । गायकी के सिलसिल में वे अपने स्थायी आवासों से चार मास के लिए बाहर निकलते हैं और दूर-दूर के नगर ग्रामों की यात्रा करते हैं। अपने जाने पहचाने जजमानों को भूलते नहीं ओर दान की अनूठी परम्परा के सम्बंध को पुनः पुनः दोहरा कर उस सत्य की प्रतीति के बदले अपने दान की महिमा का भी बखान करते हैं। आख्यान की परम्परा व्यक्ति को जीवन के मोक्ष के उन प्रतिमानों की बारंबार याद दिलाती और उस वैराग्य तक ले जाती जब उसके सामने धन-सम्पदा की व्यर्थता का बोध होता। उपजी भावना धर्म और दान के कर्म की ओर उत्साह भरती आकृष्ट करती।
छत्तीसगढ़ की धरती पर स्थायी रूप से बसने का कारण यह था कि मान-सम्मान और दान अन्य जगहों के बनिस्पत अधिक प्राप्त होता है। बसदेवाओं को अधिक सम्मान प्राप्त हआ। साथ ही दान के रूप बर्तन, गहन, कपडे, अन्न और कभी कभी जमीन भी प्राप्त हुई है। बसदेवाओं के लिए छतीसगढ़ का लोक मानस इतना अनुकूल लगता है कि उन्हें अपने कलाकर्म और धर्मकर्म की सार्थकता पूर्ण होती लगती है।

बल्देव वासुदेव कहने लगते हैं कि हम रामअवतारी, कृष्ण अवतारी, सरमन की कथा, हरिश्चन्द्र की कथा, मोरध्वज की कथा, भरथरी कथा, सती अनुसुईया कथा, शिव विवाह की कथायें गाते है। बीच में याद कर कहते हैं कि 25 साल पहिले रायपुर के किन्हीं द्वारिका नाथ ने भगवान कृष्ण, सरमन और मोरध्वज की कथाओं का उनके गायन से ध्वनि संकलन किया था। और फिर याद करते कहते हैं कि कोई और भी हमारे बारे में जानकारी लेने के लिए आये थे। शायद भोपाल से ही...फिर वे कभी वापस नहीं मिल सके...

वासुदेव कलाकार गाई जाने वाली गाथाओं को उनकी मूल बोली शब्दों में गाते और उसके परिवेश को भी जीते पर छत्तीसगढ़ की जमीन पर रहते हुए यहां के परिवेश की समझ ओर अपने यजमानों के भाषाई व्यवहार को सीख-समझ गये। एक समय जो लोक नाट्य नाचा का था। नाचा जब इस अंचल में जादू विखेर रहा था तो उस के ताने-बाने ने इन बसदेवा कलाकारों के मन को भी आकृष्ट किया। र्फुसत के समय में आत्मप्रेरणा से इस बस्ती में नाचा की गूंज भी गुंजित होने लगी। बस्ती के वासुदेव कलाकारों ने नाचा से प्रभावित होकर एक मंडली भी बनाई थी और नाम रखा था ‘वासुदेव नाच पार्टी, रामकुंड’ उसमें बल्देव वासुदेव, मानसिंग वासुदेव, मुन्ना वसुदेव, रामादीन वासुदेव, भागीरथी वासुदेव, भगतराम वासुदेव, गिरधर वासुदेव, प्रमुख थे। परी की भूमिका मुन्ना वासुदेव निबाहते, नर्तक रामाधीन वासुदेव, पूरी मंडली ने पहली प्रस्तुति आपने ही मोहल्ले के जन्माष्टमी के आयोजन पर की। इसके प्रदर्शन के बाद यूनिवर्सिटी में, महाराष्ट्र मंडल में, रामकुंड के लावारिन में, ईदगाह भाटा में, शताक्षी मंदिर के पास, सेमरिया और टाटीबंध में इसके प्रदर्शन किए।

अब वासुदेव नवयुवक गाथाओं के पारंपरिक गायन-वादन और चर्या से सरोकार स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। विविध दैनिक व्यवसाय में संलग्नाता उन्हें इस परंपरा से एक दूरी पैदा करती है। उनके मन में आदर्श सत्य और ज्ञान के पीछे पाया धन एक भिक्षुक के पाये धन का अहसास कराता है।

1980 के बाद पुराने मध्यप्रदेश में हुई कला गतिविधियों में इस बसदेवा पारा का सर्वेक्षण तो हुआ पर किसी भी कलाकार या समूह का नाम न प्रदीप्त हुआ और न कोई सम्मान, शासन ने इस गायक समुदाय के कला संरक्षण लिए कोई ऐसी योजना बनाने में दिलचस्पी भी नहीं ली कि यह परम्परा, परम्परागत रहे। नये छत्तीसगढ़ के अब तक 14 साल बीतने पर यह दूरी और बसदेवाओं का अज्ञातवास पूर्ववत है।

नवयुवकों ने वासुदेव युवा कल्याण समिति बनाई है उसे 2 साल काम करते हो गया है। गनेश, देव, कुलदीप, उमाशंकर, हरिओम वासुदेव युवा शक्ति हैं वे अपने समाज के लिए कुछ आगे करना चाहते हैं अपने भौतिक विकास और परम्परा की अक्षणुता पर पर लक्ष्य क्या हो इस बारे में प्रयासरत हैं।


बसदेवा छत्तीसगढ़ की कथा गायकी और लोक मानस के धार्मिक भावाभिव्यक्ति के सतत् उत्प्रेरक हैं। प्रदेश इनके परम्परागत कथा गायन से सदैव संस्कारित हुआ है। संस्कृति के दृश्यांकित रहने के आधारभूत कायों में बसदेवाओं की संलग्नता छतीसग़ढ़ को विशेष बनाती है। छतीसगढ़ का लोक मानस इस समुदाय के गायन कर्म के प्रति सम्मान की दृष्टि रखता है।

आगत


छत्तीसगढ़ के निवासी रहे नवल शुक्ल-चैमासा लेख से कुछ मार्गदर्शन तथा सामग्री ली है और हां जब 9 दिसम्बर 2012 का आरंभ-में संजीव तिवारी का लेख देखा तो लिखने का मन भी बना, इन दौनों सज्जनों का हृदय से आभारी हूं।